एमपी हाई कोर्ट का अहम फैसला: माता-पिता की देखभाल करना पत्नी के लिए घर छोड़ने और गुजारा भत्ता मांगने का आधार नहीं
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credits: File Image)

इंदौर: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (Madhya Pradesh High Court) ने पारिवारिक और वैवाहिक विवादों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है. हाई कोर्ट की इंदौर पीठ ने एक मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया है कि ससुराल वालों के साथ सामंजस्य की कमी या पति द्वारा अपने बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल करने को आधार बनाकर कोई भी पत्नी अपना वैवाहिक घर नहीं छोड़ सकती. कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में पत्नी द्वारा पति से अलग रहकर गुजारा भत्ता (मैंटेनेंस) का दावा करना कानूनन सही नहीं है. न्यायमूर्ति जय कुमार पिल्लई की एकल पीठ ने अपने आदेश में कहा कि किसी पुरुष से केवल अपनी पत्नी को खुश करने के लिए अपने माता-पिता से संबंध तोड़ने या उन पर ध्यान न देने की उम्मीद करना पूरी तरह से अनुचित है. यह भी पढ़ें: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का अहम फैसला: पति की आय साबित करने का पूरा जिम्मा पत्नी पर नहीं डाला जा सकता, कोर्ट ने गुजारा भत्ता बढ़ाया

भारतीय संस्कृति और मूल्यों का दिया हवाला

अदालत ने बुधवार, 8 जुलाई 2026 को दिए अपने फैसले में भारतीय पारिवारिक मूल्यों और संस्कृति को रेखांकित किया. न्यायमूर्ति पिल्लई ने कहा, "वैवाहिक न्यायशास्त्र (मैट्रीमोनियल ज्यूरिसप्रूडेंस) के दायरे में, ससुराल वालों के साथ तालमेल की कमी या पति द्वारा अपने माता-पिता और परिवार के सदस्यों को समय व देखभाल देना, किसी भी परिस्थिति में पत्नी के लिए घर छोड़ने और बाद में गुजारा भत्ता मांगने का पर्याप्त या उचित आधार नहीं माना जा सकता है."

कोर्ट ने आगे जोड़ा कि एक बेटे द्वारा अपने माता-पिता का भरण-पोषण और देखभाल करना भारतीय संस्कृति और लोकाचार (Ethos) में बिल्कुल सामान्य बात है. कानून इस तरह की अपेक्षाओं को मान्यता नहीं देता कि एक पति अपनी पत्नी की इच्छा पूरी करने के लिए अपने माता-पिता को अकेला छोड़ दे.

माता-पिता की देखभाल करना पत्नी के लिए घर छोड़ने और गुजारा भत्ता मांगने का आधार नहीं

फैमिली कोर्ट का आदेश हाई कोर्ट में पलटा

यह पूरा मामला एक पति द्वारा दायर की गई पुनरीक्षण याचिका से जुड़ा था, जिसमें उसने फैमिली कोर्ट (पारिवारिक न्यायालय) के एक आदेश को चुनौती दी थी. फैमिली कोर्ट ने पति को अपनी अलग रह रही पत्नी और दो बच्चों को हर महीने 20,000 रुपये का गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया था.

फैमिली कोर्ट ने अपने आदेश में नोट किया था कि पत्नी और उसके ससुराल वालों के बीच सामंजस्य नहीं था और पति अपनी पत्नी की तुलना में अपने परिवार के सदस्यों पर अधिक ध्यान दे रहा था। पत्नी ने अपने पति से अलग रहने के लिए केवल इसी एकमात्र कारण को आधार बनाया था. पति ने इसके खिलाफ हाई कोर्ट का रुख किया और तर्क दिया कि उसकी पत्नी बिना किसी ठोस कारण के स्वेच्छा से घर छोड़कर गई है, इसलिए वह किसी भी तरह का गुजारा भत्ता पाने की हकदार नहीं है.

झूठे आरोपों को कोर्ट ने माना 'मानसिक क्रूरता'

सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि पत्नी ने पूर्व में पति और उसके परिवार के खिलाफ दहेज उत्पीड़न (धारा 498-ए) के तहत आपराधिक मामला दर्ज कराया था, जिसमें पति और उसका परिवार अदालत से बरी (Acquit) हो चुके थे. हाई कोर्ट ने कहा कि आपराधिक मामले में बरी होना यह साबित करता है कि पत्नी के साथ कोई क्रूरता नहीं हुई थी और उसका अलग रहने का दावा आधारहीन है.

इसके साथ ही, सिविल कार्यवाही के दौरान पत्नी ने अपने पति पर उसकी भाभी के साथ अवैध संबंध होने के बेबुनियाद आरोप भी लगाए थे. इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए हाई कोर्ट ने कहा, "इस तरह का चरित्र हनन (कैरेक्टर असैसिनेशन) मानसिक क्रूरता का सबसे गंभीर रूप है."

बच्चों का भत्ता रहेगा जारी, पत्नी का दावा खारिज

हाई कोर्ट ने कानूनी बारीकियों का विश्लेषण करते हुए दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125(4) का उल्लेख किया. इस धारा के अनुसार, यदि कोई पत्नी बिना किसी पर्याप्त या उचित कारण के अपने पति से अलग रह रही है, तो वह गुजारा भत्ता पाने की हकदार नहीं होती है.

अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि पत्नी अलग रहने का कोई भी वैध कारण स्थापित करने में पूरी तरह विफल रही है, इसलिए फैमिली कोर्ट द्वारा पत्नी के पक्ष में दिया गया गुजारा भत्ते का आदेश कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है. हालांकि, हाई कोर्ट ने नाबालिग बच्चों के कल्याण को ध्यान में रखते हुए उनके भरण-पोषण के लिए तय की गई राशि में कोई बदलाव नहीं किया और बच्चों को मिलने वाला वित्तीय सहयोग जारी रखने का आदेश दिया.