लखनऊ विश्वविद्यालय में नमाज और हनुमान चालीसा पर क्यों हुआ विवाद
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में स्थित लखनऊ विश्वविद्यालय की एक जर्जर इमारत इन दिनों दो समुदायों के बीच विवाद की वजह बन गई है.
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में स्थित लखनऊ विश्वविद्यालय की एक जर्जर इमारत इन दिनों दो समुदायों के बीच विवाद की वजह बन गई है. इस परिसर में नमाज और हनुमान चालीसा पढ़ने को लेकर विवाद हो रहा है.उत्तर प्रदेश के लखनऊ विश्वविद्यालय में पिछले चार दिन से इस बात को लेकर विवाद हो रहा है कि परिसर के भीतर स्थित लाल बारादरी नाम की एक पुरानी इमारत में नमाज पढ़ी जाए या फिर हनुमान चालीसा. पिछले कुछ समय से विश्वविद्यालय के कुछ मुस्लिम छात्र यहां नमाज पढ़ते आ रहे थे लेकिन 22 फरवरी को इस इमारत को अचानक बंद कर दिया गया.
विश्वविद्यालय प्रशासन ने इमारत को बंद करने के पीछे उसकी जर्जर हालत को वजह बताया लेकिन मुस्लिम समुदाय का कहना है कि ऐसा जानबूझकर किया गया. इमारत बंद होने के बाद मुस्लिम छात्र लाल बारादरी के बाहर ही नमाज पढ़ने लगे और उनके हिन्दू दोस्तों ने सुरक्षा के लिए एक मानव श्रृंखला बनाकर हिन्दू-मुस्लिम एकता की मिसाल पेश की. लेकिन इमारत बंद होने के बावजूद वहां नमाज पढ़ने की वजह से पुलिस ने कुछ छात्रों के खिलाफ केस दर्ज कर लिया और 13 छात्रों को नोटिस भेज दिया.
वहीं मंगलवार को नमाज पढ़ने के विरोध में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कुछ छात्रों ने परिसर के बाहर बैठकर हनुमान चालीसा का पाठ शुरू कर दिया. पुलिस फिर आई और पाठ कर रहे छात्रों को वहां से भगा दिया. कुछ छात्रों को हिरासत में भी लिया गया.
नमाज के जवाब में हनुमान चालीसा
मंगलवार को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी एबीवीपी से जुड़े छात्रों ने विश्वविद्यालय परिसर में सड़क पर नमाज और इफ्तारी किए जाने के खिलाफ प्रदर्शन किया और परिसर में मौजूद अवैध मजारों की जांच कर उन्हें ध्वस्त करने की मांग की है. एबीवीपी के छात्रों का कहना है कि लाल बारादरी में कोई मस्जिद नहीं है. जबकि दूसरी ओर एनएसयूआई, समाजवादी छात्र सभा और आईसा से जुड़े छात्र लाल बारादरी का ताला खुलवाने की मांग कर रहे हैं. स्थिति की गंभीरता को देखते हुए लाल बारादरी के आस-पास भारी पुलिस बल तैनात किया गया है.
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लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रवक्ता प्रोफेसर मुकुल श्रीवास्तव ने मीडिया से बातचीत में कहा, "लाल बारादरी अत्यंत जर्जर अवस्था में है और सुरक्षा कारणों से यहां प्रवेश प्रतिबंधित किया गया है. इमारत के बाहर चेतावनी बोर्ड लगाए गए हैं. साथ ही भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से इसके जीर्णोद्धार को लेकर पत्र भी लिखा गया है. इमारत की जर्जर अवस्था और लोगों की सुरक्षा को ध्यान में रखकर ही इसे बंद करने का फैसला किया गया है, इसके अलावा इसके पीछे कोई वजह नहीं है.”
लेकिन मुस्लिम छात्रों का कहना है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने ये फैसला दक्षिणपंथी संगठनों के दबाव में किया है. विश्वविद्यालय के एक छात्र रईस अहमद ने डीडब्ल्यू को बताया, "हम लोग हमेशा यहां रमजान में इबादत करने आते थे लेकिन लाल बारादरी के मस्जिद वाले हिस्से को अचानक बंद कर दिया गया. विश्वविद्यालय प्रशासन ने कुछ लोगों के दबाव में आकर ऐसा किया. इमारत की हालत आज से नहीं बल्कि कई साल से ऐसी ही है. लेकिन अब तक नहीं ढही तो रमजान के वक्त ही थोड़ी ढह जाती. इसका ठीक से रखरखाव नहीं किया गया है, इसे जानबूझ कर जर्जर किया गया है.”
क्या है लाल बारादरी?
दरअसल, ऐतिहासिक तौर पर विश्वविद्यालय परिसर में स्थित लाल बारादरी एक इमामबाड़ा है जिसे अवध के नवाब नसीरुद्दीन हैदर ने बनवाया था. यह करीब दो सौ साल पुरानी इमारत है और विश्वविद्यालय की स्थापना के पहले से ही यहां मौजूद है.
यूपी विधान परिषद के सदस्य और बीजेपी नेता संतोष सिंह लखनऊ विश्वविद्लाय छात्रसंघ के अध्यक्ष भी रहे हैं. अपनी फेसबुक पोस्ट पर लाल बारादरी की चर्चा करते हुए उन्होंने इसके जीर्णोद्धार की जरूरत बताई है. वो लिखते हैं, "35 साल पहले भी लाल बारादरी का काफी हिस्सा गिर चुका था. बचे हिस्से में लाल कैंटीन, यूको बैंक, शिक्षक संघ कार्यालय हुआ करते थे. लाल बारादरी तब भी बहुत जर्जर थी और इसे बंद करने की बात होती थी. कैंटीन बंद भी हो गई.”
लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेंद्र शुक्ल भी इसी विश्वविद्यालय के छात्र रहे हैं. ज्ञानेंद्र शुक्ल बताते हैं, "लाल बारादरी बादशाही बाग का हिस्सा है. ये तो हमारे समय में ही यानी नब्बे के दशक में ही काफी जर्जर अवस्था में थी. कोई आता-जाता भी नहीं था यहां और न ही यहां हमने कभी किसी को नमाज पढ़ते देखा है. वैसे भी नमाज पढ़ने के लिए यहां आस-पास कई मस्जिदें हैं. हां, पिछले कुछ साल से लोग वहां नमाज पढ़ने जाने लगे थे. दूसरी बात ये भी है कि नमाज पढ़ने वालों के समर्थन या विरोध में विश्वविद्यालय के कोई छात्र तो हैं नहीं, ये सब राजनीतिक दलों के छात्र संगठनों के लोग हैं.”
हालांकि विश्वविद्यालय के कुछ पुराने छात्रों का कहना है कि यहां अध्यापक और छात्र दोनों ही कभी-कभी नमाज पढ़ने आते थे, लेकिन कभी कोई विवाद नहीं हुआ. लखनऊ विश्वविद्यालय की कार्यवाहक कुलपति रह चुकीं प्रोफेसर रूपरेखा वर्मा कहती हैं कि न सिर्फ लाल बारादरी में नमाज पढ़ी जाती रही बल्कि पिछले तीन-चार दशक में ऐसी कई घटनाएं होती रहीं जो विश्वविद्यालय में सांप्रदायिक विभाजन पैदा कर रही थीं, लेकिन किसी ने कोई आपत्ति नहीं की.
कैंपस में धार्मिक गतिविधियां
डीडब्ल्यू से बातचीत में प्रोफेसर रूपरेखा वर्मा कहती हैं, "व्यक्तिगत रूप से मैं विश्वविद्यालय कैंपस में किसी भी तरह की धार्मिक गतिविधियों के बिल्कुल खिलाफ हूं. लेकिन मेरा अनुभव ये है कि हम लोगों के देखते-देखते परिसर में जगह-जगह मूर्तियां स्थापित होती गईं. सांस्कृतिक कार्यक्रम की आड़ में त्योहारों के दौरान हवन-पूजन होने लगे."
यह सब लंबे समय से होता रहा लेकिन किसी को ऐतराज नहीं हुआ. लंबे समय से कुछ छात्र और कुछ अध्यापक लाल बारादरी में कभी-कभी नमाज पढ़ने भी जाते थे, लेकिन अब जब अचानक इसे घेर दिया गया तो सवाल उठेगा ही. दरअसल, लखनऊ में जिस दिन संघ प्रमुख मोहन भागवत थे, उसी समय लाल बारादरी के सामने एक बाड़ लगाने का काम किया जा रहा था.”
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प्रोफेसर रूपरेखा वर्मा कहती हैं कि विश्वविद्यालयों या कॉलेजों में इस तरह की सांप्रदायिक गतिविधियों का असर सीधे तौर पर समाज पर पड़ता है. हाल के दिनों की कुछ घटनाओं का जिक्र करते हुए वो कहती हैं, "पूरे देश में एक समझ फैली है कि बहुसंख्यक लोग अल्पसंख्यकों के खिलाफ कुछ भी कर सकते हैं. रेप जैसे घृणित कृत्य तक का धर्म के आधार पर समर्थन और विरोध हो रहा है. इसी का नतीजा दिख रहा है कि अल्पसंख्यकों पर कोई भी हमला कर देता है. पुलिस कार्रवाइयों में भी भेदभाव साफ दिखता है. लेकिन इन सबके बीच एक अच्छा संकेत यह है कि बहुसंख्यक समुदाय के लोग इस भेदभाव के खिलाफ सामने आ रहे हैं. यह प्रतीकात्मक साझेदारी बहुत जरूरी है.”
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पिछले दिनों यूपी के ही बदायूं में एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें एक युवक तीन बुजुर्ग मुसलमानों को गालियां देते हुए पीट रहा था और कोई बचाने के लिए भी नहीं आया. यहां तक कि उन बुजुर्ग मुसलमानों ने भी कोई प्रतिवाद नहीं किया. हालांकि वीडियो वायरल होने के बाद युवक को गिरफ्तार कर लिया गया.
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