सुप्रीम कोर्ट का आदेश: बिहार में वोटर लिस्ट से काटे गए 65 लाख मतदाताओं के नाम जारी करे चुनाव आयोग
सुप्रीम कोर्ट (Photo: Wikimedia Commons)

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (14 अगस्त) को चुनाव आयोग (ECI) को एक बड़ा निर्देश दिया है. कोर्ट ने कहा है कि बिहार में जिन लगभग 65 लाख वोटरों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं, उनकी पूरी सूची कारण के साथ वेबसाइट पर जारी की जाए. यह आदेश बिहार में चलाए गए 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' (SIR) अभियान के बाद आया है, जिसमें बड़ी संख्या में लोगों के नाम ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में शामिल नहीं किए गए.

यह मामला जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जयमाल्य बागची की बेंच के सामने था, जिसने चुनाव आयोग को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा कि लोकतंत्र में पारदर्शिता बनी रहे और हर वोटर को अपने अधिकार के बारे में जानने का हक़ मिले.

सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को क्या-क्या करने का आदेश दिया?

कोर्ट ने चुनाव आयोग को कई अहम कदम उठाने के निर्देश दिए हैं, जिन्हें अगले मंगलवार तक पूरा करना होगा.

  1. वेबसाइट पर लिस्ट डालें: जिन 65 लाख लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं, उनकी जिलेवार सूची हर जिले के चुनाव अधिकारी की वेबसाइट पर डाली जाए. यह जानकारी बिहार के मुख्य चुनाव अधिकारी की वेबसाइट पर भी उपलब्ध होनी चाहिए.
  2. नाम कटने का कारण बताएं: लिस्ट में हर व्यक्ति का नाम काटे जाने का कारण भी साफ-साफ बताया जाना चाहिए, जैसे – मृत्यु हो जाने के कारण, किसी और जगह चले जाने के कारण, या एक से ज़्यादा जगह नाम होने (डुप्लीकेट) के कारण.
  3. लिस्ट सर्च करने लायक हो: वेबसाइट पर डाली गई लिस्ट ऐसी होनी चाहिए कि कोई भी व्यक्ति अपने EPIC नंबर (वोटर आईडी कार्ड नंबर) से अपना नाम आसानी से खोज सके.
  4. खूब प्रचार करें: इस बात की जानकारी आम लोगों तक पहुंचाने के लिए स्थानीय अखबारों, टीवी, रेडियो और सोशल मीडिया पर खूब प्रचार किया जाए. नोटिस बोर्ड पर भी लिस्ट लगाई जाए ताकि जिन लोगों के पास इंटरनेट नहीं है, वे भी इसे देख सकें.
  5. आधार कार्ड को भी मान्यता दें: कोर्ट ने यह भी साफ किया कि जिन लोगों के नाम कट गए हैं, वे जब अपना नाम दोबारा जुड़वाने के लिए आवेदन करें, तो वे सबूत के तौर पर अपना आधार कार्ड भी जमा कर सकते हैं. चुनाव आयोग को अपने सार्वजनिक नोटिस में यह बात स्पष्ट रूप से बतानी होगी.

कोर्ट में क्या बहस हुई?

सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने कहा कि ऐसा कोई कानून नहीं है जो उन्हें नाम कटने वालों की लिस्ट और वजह बताने के लिए मजबूर करे. आयोग के वकील राकेश द्विवेदी ने कहा कि उन्होंने यह लिस्ट राजनीतिक पार्टियों के बूथ लेवल एजेंटों को दे दी है.

इस पर जजों ने सख़्त रुख अपनाया और कहा:

  • "वोटर राजनीतिक पार्टियों के पीछे क्यों भागे?": जस्टिस सूर्यकांत ने पूछा, "क्या आप कोई ऐसा सिस्टम नहीं बना सकते जिससे लोगों को अपनी जानकारी के लिए स्थानीय राजनीतिक पार्टियों के चक्कर न काटने पड़ें? आप इसे इंटरनेट पर क्यों नहीं डाल देते?"
  • "पारदर्शिता से भरोसा बढ़ता है": बेंच ने कहा कि जब आप जानकारी को सार्वजनिक करते हैं, तो संस्था (चुनाव आयोग) पर लोगों का भरोसा बढ़ता है. अगर कोई गलतफहमी है, तो वह भी दूर हो जाती है.
  • "पूनम देवी को पता चलना चाहिए": जस्टिस कांत ने एक आम आदमी का उदाहरण देते हुए कहा, "अगर पूनम देवी का नाम लिस्ट से हटाया गया है, तो पूनम देवी को यह जानने का हक़ है कि उनका नाम क्यों हटाया गया है. नोटिस आम लोगों को समझ आने वाली आसान भाषा में होना चाहिए."

मामला क्या है?

यह पूरा मामला बिहार में चुनाव आयोग द्वारा चलाए गए 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' (SIR) अभियान से जुड़ा है. इस अभियान के बाद एक ड्राफ्ट वोटर लिस्ट जारी की गई, जिसमें से लगभग 65 लाख लोगों के नाम गायब थे.

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) जैसी संस्थाओं ने इस पर याचिका दायर की और मांग की कि हटाए गए नामों की सूची कारणों के साथ सार्वजनिक की जाए. याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि वोटरों पर यह साबित करने का बोझ नहीं डाला जा सकता कि वे नागरिक हैं.

अब इस मामले में अगली सुनवाई अगले शुक्रवार, 22 अगस्त को होगी. सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश को नागरिकों के अधिकारों और चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है.