Jagdeep Dhankhar Resignation: आजकल दिल्ली की राजनीति में उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ को लेकर अटकलों का बाजार गर्म है. सवाल उठ रहे हैं कि क्या सरकार और उपराष्ट्रपति के बीच सब कुछ ठीक नहीं है? मामला इतना क्यों गरमा गया कि उनके इस्तीफे तक की चर्चा होने लगी. इस पूरी कहानी को समझने के लिए हमें हाल की कुछ घटनाओं को जोड़कर देखना होगा.
विवाद की शुरुआत कहां से हुई?
इस पूरे मामले में दो बड़ी बातें हुईं, जिस पर बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा को सफाई तक देनी पड़ी.
- राज्यसभा में दिया गया बयान: सोमवार को राज्यसभा की कार्यवाही के दौरान, जब विपक्ष हंगामा कर रहा था, तो जेपी नड्डा ने कहा, "गुस्सा मत करो भइया, गुस्सा मत करो, रिकॉर्ड में कुछ नहीं जाएगा, मैं जो बोल रहा हूं वही जाएगा, आपको पता होना चाहिए." पहली नजर में यह बयान ऐसा लगा जैसे वे चेयर पर बैठे उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ को कह रहे हों. इससे बड़ा भ्रम पैदा हो गया कि क्या एक केंद्रीय मंत्री, चेयर का अपमान कर रहा है? हालांकि, नड्डा ने बाद में साफ किया कि उनकी यह बात हंगामा कर रहे विपक्षी सांसदों के लिए थी, न कि चेयर के लिए.
- मीटिंग में न पहुंचना: उसी दिन शाम 4:30 बजे उपराष्ट्रपति धनखड़ ने बिजनेस एडवाइजरी कमेटी (BAC) की एक बैठक बुलाई थी. इस बैठक में जेपी नड्डा और संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजिजू नहीं पहुंचे. इसे लेकर भी कई तरह के कयास लगाए जाने लगे. इस पर भी नड्डा ने सफाई दी कि वे एक दूसरे जरूरी संसदीय काम में व्यस्त थे और इसकी सूचना उपराष्ट्रपति कार्यालय को पहले ही दे दी गई थी.
असली कहानी: जस्टिस वर्मा पर महाभियोग का क्रेडिट कौन लेगा?
ऊपर बताई गई बातें तो सिर्फ ऊपरी सतह पर दिख रही हैं. असली कहानी जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग (Impeachment) प्रस्ताव को लेकर है.
हुआ ये कि सरकार जस्टिस वर्मा को हटाने के लिए लोकसभा में प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रही थी. इसके लिए सांसदों से हस्ताक्षर भी करवाए जा रहे थे. लेकिन सरकार कोई कदम उठाती, उससे पहले ही विपक्ष ने एक तरह से "गुगली" फेंक दी.
कांग्रेस के नेतृत्व में 63 विपक्षी सांसदों ने अचानक राज्यसभा में चेयरमैन जगदीप धनखड़ को जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग का नोटिस सौंप दिया. यह सरकार के लिए एक बड़ा झटका था, क्योंकि अगर यह नोटिस स्वीकार हो जाता, तो जस्टिस वर्मा को हटाने की प्रक्रिया शुरू करने का सारा क्रेडिट विपक्ष को मिल जाता. सरकार इस मामले में पिछड़ती हुई नजर आने लगी.
विपक्ष की इस तेजी से सरकार सकते में आ गई. आनन-फानन में, बीजेपी ने अपने राज्यसभा सांसदों को राजनाथ सिंह के दफ्तर में बुलाया और उनसे एक नोटिस पर हस्ताक्षर करवाए. दिलचस्प बात यह है कि यह सब तब हो रहा था, जब चेयरमैन धनखड़ विपक्ष के नोटिस को स्वीकार करने के संकेत दे चुके थे. ऐसे में बीजेपी के सांसदों के हस्ताक्षर का महत्व वैसे भी कम हो गया था.
तो क्या यह क्रेडिट की लड़ाई है या सरकार से तनातनी?
अब इन घटनाओं को एक साथ देखें तो दो बातें निकलकर आती हैं:
- क्रेडिट की लड़ाई: यह साफ है कि जस्टिस वर्मा के महाभियोग पर सरकार और विपक्ष के बीच क्रेडिट लेने की होड़ मची हुई थी. विपक्ष ने सही समय पर दांव चलकर सरकार को चौंका दिया. सरकार की हड़बड़ी यह दिखाती है कि वह इस मुद्दे का श्रेय विपक्ष को किसी भी हाल में नहीं देना चाहती थी.
- सरकार और उपराष्ट्रपति में खाई: जेपी नड्डा का बयान, भले ही उसकी सफाई दे दी गई हो, और अहम बैठक में बड़े मंत्रियों का न पहुंचना, यह इशारा करता है कि सरकार और उपराष्ट्रपति कार्यालय के बीच तालमेल की कमी है. विपक्ष का नोटिस चेयरमैन द्वारा स्वीकार कर लिया जाना भी सरकार को शायद पसंद नहीं आया. कुछ महीने पहले जो विपक्ष धनखड़ पर महाभियोग चलाना चाहता था, आज उसी विपक्ष के कदम से धनखड़ ने सरकार को असहज कर दिया.
कुल मिलाकर, यह मामला सिर्फ एक बयान या एक बैठक से कहीं ज्यादा गहरा है. यह वर्चस्व, रणनीति और राजनीतिक क्रेडिट की लड़ाई है, जिसके केंद्र में उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ आ गए हैं. इसी तनावपूर्ण माहौल ने उनके इस्तीफे की अटकलों को हवा दे दी है.













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