मणिपुर में सरकार तो बहाल, लौटेगी शांति भी?
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

मणिपुर में करीब एक साल के राष्ट्रपति शासन के बाद सरकार की बहाली का रास्ता तो साफ हो गया है. लेकिन क्या इससे शांति भी बहाल होगी?बीते करीब 33 महीनों से मैतेई और कुकी समुदाय की जातीय हिंसा की आग में झुलस रहे पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में अब जल्दी ही सरकार बहाल हो जाएगी. बीते साल फरवरी में चौतरफा दबाव के बीच तत्कालीन मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह के इस्तीफा देने के बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया था.

राज्य में दोनों समुदायों के बीच लंबे समय से जारी हिंसा में ढाई सौ से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और हजारों बेघर हो चुके हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 50 हजार से ज्यादा लोग अब भी विभिन्न राहत शिविरों में रह रहे हैं.

राज्य में सरकार बहाल करने की मांग तो लंबे समय से हो रही थी और बीते दिसंबर में इसकी सुगबुगाहट भी शुरू हो गई थी. लेकिन कुकी समुदाय के अलग स्वायत्त क्षेत्र की मांग पर अड़े रहने के कारण यह मामला आगे नहीं बढ़ सका था. अब बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ने जातीय संतुलन को साधने का प्रयास करते हुए मैतेई समुदाय के युमनाम खेमचंद सिंह को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार चुना है, तो साथ ही कुकी और नागा समुदाय के दो नेताओं को उपमुख्यमंत्री बनाने के भी संकेत दिए हैं.

बीजेपी के एक प्रमुख नेता ने नाम नहीं छापने की शर्त पर डीडब्ल्यू को बताया, कुकी समुदाय से आने वाली महिला नेता और पूर्व मंत्री नेमचा किपगेन के उपमुख्यमंत्री बनने की संभावना है. वे राज्य की पहली महिला उपमुख्यमंत्री होंगी. उनके अलावा नागा समुदाय केलोसी दिखो भी उपमुख्यमंत्री बन सकते हैं.

कौन हैं खेमचंद सिंह?

पूर्व विधानसभा अध्यक्ष और दो बार विधायक रहे वाय खेमचंद सिंह कभी पूर्व मुख्यमंत्री बीरेन सिंह के करीबी थे. लेकिन जातीय हिंसा को नियंत्रित करने के मुद्दे पर दोनों नेताओं में मतभेद बढ़ने लगे. खेमचंद ने बीते साल राष्ट्रपति शासन लागू होने से पहले बीरेन सिंह को इस्तीफे की सलाह दी थी.

उसके बाद दिल्ली में पार्टी के शीर्ष नेताओं से मुलाकात में भी उन्होंने कहा था कि बीरेन सिंह के पद पर बने रहने की स्थिति में पार्टी में बगावत का खतरा है. विधायकों का एक बड़ा गुट सरकार के खिलाफ कांग्रेस के अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन कर सकता है. इससे सरकार तो गिर ही जाएगी, पार्टी की भी भद पिटेगी. उसके बाद ही आनन-फानन में बीरेन सिंह से इस्तीफा लेकर राष्ट्रपति शासन लागू किया गया.

लेकिन मुख्यमंत्री पद के लिए आखिर खेमचंद को ही क्यों चुना गया. प्रदेश बीजेपी के एक बड़े नेता नाम नहीं छापने की शर्त पर डीडब्ल्यू को बताते हैं, "खेमचंद एक ऐसे नेता हैं जिनके नाम पर कुकी और नागा समुदाय के नेताओं को भी ज्यादा आपत्ति नहीं है. वो पहले ऐसे मैतेई नेता हैं जिन्होंने बीते साल दिसंबर में कुकी इलाके के राहत शिविरों का दौरा किया था. उनका राजनीतिक करियर भी लगभग बेदाग रहा है. खेमचंद को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भी समर्थन हासिल है."

लेकिन राज्य में सरकार की बहाली का फैसला क्यों किया गया? राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि राज्य में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में एनडीए के विधायक केंद्र पर लगातार सरकार की बहाली का दबाव बढ़ा रहे थे. उनका कहना था कि राष्ट्रपति शासन में चुनाव होने की स्थिति में राज्य में एनडीए का सूपड़ा साफ हो जाएगा. इसके अलावा बीते महीने से ही राज्य के विभिन्न इलाको में 'सेव मणिपुर' रैलियों का आयोजन किया जा रहा था.

जातीय हिंसा शुरू होने के करीब ढाई साल बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीते साल सितंबर में राज्य का दौरा किया था. राज्य की 60-सदस्यीय विधानसभा में बीजेपी के 37 विधायक हैं. इनमें से सात कुकी समुदाय के हैं. कुकी समुदाय के कुल 10 विधायक हैं. यह राज्य घाटी और पर्वतीय इलाके में बंटा है. मणिपुर घाटी में विधानसभा की 40 सीटें हैं और कुकी-नागा बहुल पर्वतीय इलाके में बीस सीटें.

दिल्ली में नई सरकार के गठन के सिलसिले में आयोजित बैठक में बीजेपी के तमाम कुकी विधायकों ने हिस्सा नहीं लिया. चूड़ाचांदपुर के बीजेपी विधायक पी. हाओकिप (कुकी) ने अलग से केंद्रीय नेताओं से मुलाकात की और साफ किया कि जब तक उनके समुदाय के लिए स्थायी राजनीतिक समाधान का भरोसा नहीं मिलता, वे सरकार में शामिल नहीं हो सकते.

कुकी-जो संगठन अपने इलाके में केंद्र शासित प्रदेश की मांग कर रहे हैं. उन्होंने वर्ष 2023 में सबसे पहले यह मांग उठाई थी. बीजेपी के एक नेता ने डीडब्ल्यू को बताया कि बीते करीब एक सप्ताह से सरकार के गठन की कवायद तेज हो गई थी. बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ने तमाम विधायकों को दिल्ली बुला कर उनसे अलग-अलग समूहों में बातचीत की थी. मैतेई और कुकी समुदाय के नेताओं को साथ लाने के लिए पिछले दरवाजे से भी काफी कोशिश की गई.

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि राष्ट्रपति शासन को एक साल से आगे बढ़ाने के लिए संसद में एक संविधान संशोधन विधेयक पेश करना पड़ता. इसके अलावा अगले साल चुनाव का भी ध्यान था. जातीय हिंसा और अशांति के कारण ही लोकसभा चुनाव में पार्टी को दोनों सीटों से हाथ धोना पड़ा था.

मणिपुर कांग्रेस के अध्यक्ष कीशम मेघचंद्र सिंह कहते हैं, "राज्य में नई सरकार की बहाली तो हो रही है. लेकिन केंद्र ने मूल समस्या की ओर ध्यान नहीं दिया है. कुकी-नागा समुदाय इस सरकार को कितना स्वीकार करेंगे, यह तो आने वाले दिनों में ही पता चलेगा. लेकिन संवैधानिक दिक्कतों और चुनावी राजनीतिको ध्यान में रखते हुए सरकार की बहाली से राज्य की दशकों पुरानी समस्या का समाधान मुश्किल ही नजर आता है."

कम नहीं हैं चुनौतियां

वाय खेमचंद उन चंद मैतेई नेताओं में से हैं जिनकी स्वीकार्यता कुकी और नागा समुदाय में भी है. बावजूद इसके उनके नेतृत्व में बनने वाली सरकार को कई चुनौतियों का सामना करना होगा. मणिपुर में हिंसा भले थम गई हो, जमीनी हालत में ज्यादा बदलाव नहीं आया है. अब भी पर्वतीय और मैदानी इलाकों में फर्क साफ नजर आता है. मैतेई और कुकी समुदाय अपने-अपने इलाकों में ही सिमटे नजर आते हैं.

राजनीतिक विश्लेषक सरोज सिंह बताते हैं, "राज्य में लूटे गए सरकारी हथियारों को पूरी तरह बरामद नहीं किया जा सका है. सबसे बड़ी चुनौती राहत शिविरों में रह रहे विस्थापित लोगों में भरोसा पैदा कर उनको उनके घरों तक लौटाना है. इसके अलावा सरकार के सामने अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले भी समुचित माहौल पैदा करने की चुनौती होगी."