बांग्लादेश की निर्वासित लेखिका तस्लीमा का सवाल, आखिर मेरा कसूर क्या था?

अपनी लेखनी के लिए विवादों में रही बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन को पहले अपना देश और फिर अपना 'दूसरा घर' कोलकाता छोड़ना पड़ा था.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

अपनी लेखनी के लिए विवादों में रही बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन को पहले अपना देश और फिर अपना 'दूसरा घर' कोलकाता छोड़ना पड़ा था. करीब दो दशक बाद महानगर में लौटी लेखिका यहां अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख सकी.19 साल पहले कोलकाता छोड़ते समय तस्लीमा ने लिखा था, "जोदी मानुस होए ना पारी, पाखी होए ओ फिरबो एक दिन” यानी अगर इंसान के तौर पर नहीं भी लौट सकी तो एक दिन पक्षी बन कर ही जरूर लौटूंगी.

अब वापसी के बाद अपने पहले सार्वजनिक कार्यक्रम में उन्होंने सवाल किया कि आखिर मेरा कसूर क्या था जो मुझे पहले अपनी जन्मभूमि और उसके बाद फिर अपना 'दूसरा घर' यानी कोलकाता छोड़ना पड़ा था? उन्होंने कहा कि मैंने जीवन में कई बार घर से बेघर होने की पीड़ा झेली है.

बांग्लादेश की निर्वासित लेखिका तस्लीमा ने कोलकाता वापसी को अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा क्षण बताया. उन्होंने कहा, "यूरोप ने मुझे नागरिकता जरूर दी है. लेकिन घर तो भाषा और प्यार से बनता है. एक बंगाल में मेरा जन्म हुआ और दूसरे बंगाल ने मुझे घर दिया."

साल 2007 में छोड़ा था कोलकाता

नवंबर, 2007 में कोलकाता छोड़ने के करीब 19 साल बाद शुक्रवार को यहां लौटी तस्लीमा ने वापसी के बाद शनिवार शाम को कोलकाता के रबींद्र सदन में एक साहित्यिक कार्यक्रम में हिस्सा लिया. इसमें मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के अलावा कई बुद्धिजीवी मौजूद थे. इस कार्यक्रम का आयोजन तीन गैर-सरकारी संगठनों-सेक्युलर मिशन, पश्चिमबंगेर जन्यो (पश्चिम बंगाल के लिए) और ह्यूमन राइट्स बियॉन्ड फ्रंटियर्स ने मिल कर किया था. इस मौके पर सभागार पूरा भरा था और सुरक्षा का भी जबरदस्त इंतजाम किया गया था.

पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ बीजेपी ने तस्लीमा की वापसी का स्वागत किया है. मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने फूलों का गुलदस्ता देकर और शाल ओढ़ा कर उनका स्वागत किया. इस कार्यक्रम में बुद्धिजीवियों के अलावा सरकार के कई मंत्री और बीजेपी के नेता भी मौजूद थे.

सीपीएम और टीएमसी ने उठाए टाइमिंग पर सवाल

वहीं सीपीएम और तृणमूल कांग्रेस ने तस्लीमा की वापसी को धर्म-आधारित राजनीति बताते हुए इसकी टाइमिंग पर सवाल उठाए हैं. है. तृणमूल कांग्रेस प्रवक्ता कुणाल घोष ने डीडब्ल्यू से कहा, "बीजेपी अपने पारंपरिक एजेंडे के तहत धर्म-आधारित राजनीति करने में जुटी है." सीपीएम नेता विकास भट्टाचार्य ने डीडब्ल्यू से कहा, "राज्य में किसी पुराने विवाद को हवा देना उचित नहीं है. तस्लीमा की वापसी से विभिन्न समुदायों का आपसी सद्भाव खतरे में पड़ सकता है."

शनिवार के कार्यक्रम में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा, "तस्लीमा जितनी बार चाहें, यहां आ सकती हैं. अब धमकियों के दिन खत्म हो गए हैं. सरकार उनको समुचित सुरक्षा मुहैया कराएगी." शुभेंदु ने यह भी कहा, "हमारी प्रिय लेखिका तस्लीमा करीब दो दशक बाद बंगाल की धरती पर आई हैं. इससे यह साबित हो गया है कि बंगाल में लोकतंत्र, संविधान, अभिव्यक्ति की आजादी और मौलिक अधिकार नई सरकार के हाथों में सुरक्षित हैं."

इस मौके पर अपने भाषण में तस्लीमा ने पुरानी यादें और अपने दिल की पीड़ा साझा की और अपनी कविताएं भी सुनाई.

उन्होंने कहा, "मैं अब कोलकाता लौट आई हूं... यह बात कहने में मुझे 19 साल लग गए. इस जमीन पर लौटने के बाद लगता है कि मुझे अपने जीवन का एक खोया हुआ अध्याय वापस मिल गया है."

उन्होंने सुरक्षा मुहैया कराने के लिए मुख्यमंत्री के प्रति आभार जताते हुए कहा कि वो यहां किसी राजनीतिक दल की ओर से या किसी को पराजित करने नहीं आई हैं. लेखिका ने कहा, "मैं यहां अभिव्यक्ति की आजादी और लेखक की स्वाधीनता के पक्ष में बोलने आई हूं."

कोलकाता छोड़ने का जिक्र

तस्लीमा ने उन हालात का भी जिक्र किया जिनके तहत उनको रातों-रात कोलकाता छोड़ना पड़ा था. लेखिका ने कहा, "मेरी किताब द्विखंडितो पर लगे प्रतिबंध को कलकत्ता हाई कोर्ट ने रद्द कर दिया था. उसके बावजूद कट्टरपंथियों को खुश करने की कीमत के तौर पर मुझे राज्य छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा."

तस्लीमा का कहना था, "मैंने तो कोई अपराध नहीं किया था. किसी अदालत ने मुझे कोई सजा भी नहीं दी थी. किसी लेखक के लिए अपनी भाषा वाले शहर में पुलिस पहरे में लौटना बेहद पीड़ादायक है. मैं उस दिन का सपना देखती हूं जब किसी लेखक को अपनी लेखनी के लिए पुलिस की सुरक्षा की जरूरत नहीं पड़े."

उन्होंने कहा, "मैं तो डॉक्टर के तौर पर काम करते हुए कहानी और कविता लिखती रही. मेरा कसूर यही था कि मैं महिलाओं और पुरुष के समान अधिकारों और जाति-धर्म का ख्याल किए बिना मानवाधिकारों की वकालत करती रही. लेकिन इसे मेरा कसूर माना गया था."

क्यों छोड़ा बांग्लादेश?

वर्ष 1993 में अपनी पहली किताब 'लज्जा' के प्रकाशन के बाद ही तस्लीमा को बांग्लादेश के कट्टरपंथी गुटों की ओर से मौत की धमकियां मिलने लगी थी. इसके अगले साल उनको देश छोड़ना पड़ा था. इस दौरान वो अमेरिका और यूरोप के विभिन्न शहरों में रही थी. इस दौरान स्वीडन ने उनको नागरिकता दे दी थी. कोलकाता को अपना दूसरा घर मानने वाली तस्लीमा वर्ष 2004 से कोलकाता में रह रही थी. लेकिन अपनी जीवनी के दूसरे हिस्से 'द्विखंडितो' पर विवाद, विरोध प्रदर्शन और हिंसा के कारण तस्लीमा को नवंबर, 2007 में कोलकाता छोड़ना पड़ा था. कोलकाता में, खासकर अल्पसंख्यक इलाकों में विरोध प्रदर्शन तेज होने के कारण सेना भी उतारनी पड़ी थी.

राज्य की लेफ्ट फ्रंट सरकार के तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने तस्लीमा के उस विवादास्पद किताब पर पाबंदी लगा दी थी. वर्ष 2011 में सत्ता में आने वाली तृणमूल कांग्रेस सरकार ने भी यह अलिखित पाबंदी बरकरार रखी थी. लेकिन बंगाल में सत्ता बदलने के तीन महीने के भीतर तस्लीमा की वापसी का रास्ता साफ हो गया.

रबींद्र सदन में आयोजित कार्यक्रम के एक आयोजक मोहित ने डीडब्ल्यू से कहा, "तस्लीमा के राज्य में आने में कोई कानूनी बाधा नहीं थी. हम लंबे समय से उनके संपर्क में थे. इस कार्यक्रम का राजनीति से कोई संबंध नहीं था. सरकार की ओर से सुरक्षा का भरोसा मिलने के बाद हमने उनको यहां आने का न्योता दिया था."

अब पहले से तय कार्यक्रम के तहत तस्लीमा तीन अगस्त को यहां पत्रकारों से बातचीत करने के बाद अगले दिन कोलकाता से रवाना हो जाएंगी.

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