इंटिमेट पार्टनर वॉयलेंस: भारत में महिलाओं के खिलाफ बढ़ता, लेकिन अनदेखा अपराध
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

भारत में लगभग हर तीसरी महिला को 'आईपीवी' का सामना करना पड़ रहा है. यह केवल सामाजिक समस्या नहीं है, बल्कि महिलाओं की सेहत को भी गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है.सुशीला और उनकी बहू रजनी दिल्ली के कालिंदी कुंज इलाके में रहती हैं. सुशीला के बेटे उमेश कुमार ई-रिक्शा चलाते हैं और महीने भर में लगभग पंद्रह से बीस हजार रुपये कमाते हैं. सुशीला, रजनी को दिल्ली के आरएमएल अस्पताल में एक डॉक्टर के पास ले गईं.

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रजनी के शरीर पर चोट के नीले निशान थे. रजनी ने बताया कि शरीर में लगातार दर्द होने के कारण कई रातों से वह ठीक से सो नहीं पाईं. उन्होंने लगभग एक महीने तक डॉक्टर से इलाज कराया. इलाज के क्रम में डॉक्टर दिव्यांश सिंह को कुछ गड़बड़ी का अंदेशा हुआ.

उन्होंने रजनी के मेडिकल टेस्ट करवाए. पता चला कि रजनी के गुप्तांगों में घाव थे. उन्हें डिप्रेशन की समस्या भी थी. अस्पताल में काउंसलिंग के बाद सामने आया कि उमेश को शराब की लत थी और वह नशे में अक्सर रजनी के साथ हिंसक व्यवहार करता. उमेश पैसों के लिए अपनी मां पर भी हाथ उठाता था.

'इंटिमेट पार्टनर वॉयलेंस' पर क्या बताते हैं आंकड़े

शादी, डेटिंग या लिव‑इन जैसे अंतरंग रिश्तों में एक साथी द्वारा दूसरे साथी के खिलाफ हिंसा करना अपराध है. इसे 'अंतरंग साथी हिंसा' या इंटिमेट पार्टनर वॉयलेंस (आईपीवी) कहते हैं.

रजनी का मामला पार्टनर द्वारा की जाने वाली हिंसा की गंभीरता रेखांकित करता है. यह एक व्यापक मसला है. लैंसेट में छपे एक अध्ययन के अनुसार, दुनियाभर में लगभग 60.8 करोड़ महिलाएं आईपीवी का शिकार होती हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक, भारत में 18 से 49 साल के आयुवर्ग में करीब 30 प्रतिशत महिलाओं ने जीवन में कम-से-कम एक बार आईपीवी का अनुभव किया है. कर्नाटक, बिहार और तेलंगना में आईपीवी की दर राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है. जबकि गोवा, हिमाचल प्रदेश और नागालैंड में यह कम है.

किस रूप में होती है आईपीवी हिंसा?

आईपीवी एक गंभीर सामाजिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या है. यह केवल शारीरिक चोट तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह हिंसा कई रूपों में सामने आती है.

एडवोकेट स्वाति खैरे कई एनजीओ के साथ जुड़कर ऐसे मामलों में महिलाओं की कानूनी मदद करती हैं. वह मुंबई स्थित 'वन स्टॉप सेंटर' में भी काम कर चुकी हैं, जो कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा, उत्पीड़न और शोषण के मामलों में सभी जरूरी सहायता एक ही जगह पर उपलब्ध कराता है.

स्वाति बताती हैं कि 'वन स्टॉप सेंटर' पर रोजाना आने वाले 60 प्रतिशत फोन कॉल पार्टनर द्वारा हिंसा के होते हैं. भारत में घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम (2005) या डीवी एक्ट मौजूद है. लिव‑इन रिश्तों में रहने वाली महिलाएं भी इस कानून के तहत सुरक्षा पा सकती हैं.

स्वाति ने डीडब्ल्यू से बातचीत में बताया, "मार-पीट, धक्का देना या चोट पहुंचाना, अपने साथी की हर गतिविधि पर नजर रखना, ये सभी शारीरिक हिंसा में आता है. किसी भी जेंडर के साथी के साथ जबरदस्ती या उसकी सहमति के बिना यौन संबंध बनाना यौन हिंसा है. भावनात्मक या मानसिक हिंसा में अपमान करना, डराना, धमकाना, ताने देना या आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाना शामिल है. वहीं आर्थिक हिंसा तब होती है जब पैसे, संपत्ति या काम करने और खर्च करने की स्वतंत्रता पर नियंत्रण रखा जाता है."

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वह आगे बताती हैं, "कई घरों में पुरुष, पढ़ी-लिखी महिलाओं से शादी करते हैं ताकि उनका आर्थिक बोझ कम हो सके. बच्चा पैदा होते ही वे चाहते हैं कि महिला काम पर चली जाए. उस समय महिला का शरीर अच्छे स्वास्थ्य में नहीं होता. ऐसे में उसे जबरदस्ती काम पर भेजना भी आईपीवी के अंतर्गत आता है. ऐसे कई मामले हमारे सामने आते हैं. आईपीवी के बारे में जागरूकता की शुरुआत स्कूल लेवल से हो जानी चाहिए. बच्चों की स्कूली शिक्षा में डीवी एक्ट पढ़ाया जाना चाहिए."

मेडिकल सहायता में चूक बन सकती है बड़ी समस्या

चिकित्सकीय लापरवाही भी कई मामलों में आईपीवी को छिपा रहने देती है. महिलाओं का सबसे पहला संपर्क डॉक्टर से होता है. उस समय उन्हें नहीं पता होता कि उनके साथ हिंसा हो रही है. यदि डॉक्टर चोट के संकेतों को अनदेखा कर दे, तो पीड़िता को मदद नहीं मिलती. सवाल नहीं पूछना या पुलिस व परामर्श सेवाओं से जोड़ने में विफल रहना भी इसका हिस्सा है.

डॉ. दिव्यांश सिंह सामुदायिक चिकित्सा और सार्वजनिक स्वास्थ्य के विशेषज्ञ हैं. वह बताते हैं कि महिला को देखकर पता लगाया जा सकता है कि वह आईपीवी से परेशान है. डॉक्टरों को इस तरह के संकेतों पर विशेष ध्यान देना चाहिए.

डॉ. दिव्यांश ने डीडब्ल्यू से बातचीत में बताया, "महिला जो बता रही है, वह अगर उसके शरीर पर पाई गई चोटों से मेल नहीं खाता, तो महिला की मेडिकल रिपोर्ट में उसकी शारीरिक तकलीफ का कारण पता चल जाता है. कई बार देखकर भी अंदाजा लगाया जा सकता है. एक महिला ने कहा कि जमीन पर गिरने से उसके हाथ में चोट लगी, लेकिन चोट हाथ के बाहरी हिस्से पर थी. यह आमतौर पर तब होता है जब कोई सामने से हमला करे."

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आईपीवी के कारण गर्भावस्था के दौरान महिला को कई तरह की शारीरिक और मानसिक दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. कुछ मामलों में महिला का एक या उससे अधिक बार गर्भपात हो चुका होता है. उसे एसटीडी या एचआईवी हो सकता है. डिप्रेशन, पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (पीटीएसडी) और मानसिक तनाव भी आईपीवी से जुड़े हो सकते हैं. इसके अलावा, ऐसी परिस्थितियों में प्रभावित महिलाओं के बच्चों को भी अक्सर हिंसा का सामना करना पड़ता है.

जैसा कि डॉ. दिव्यांश बताते हैं, "ऐसे परिवारों में बच्चे भी सुरक्षित नहीं होते. वे ऐसे माहौल में बड़े होकर इस हिंसा को अपनाना सीख जाते हैं. यह पैटर्न परिवार की अगली पीढ़ी में भी फैल जाता है. लंबी अवधि तक हिंसा के संपर्क में रहने से बच्चों में आक्रामक व्यवहार बढ़ने लगता है. इसके साथ ही उनमें ड्रग्स या शराब को अपनाने का जोखिम और आपराधिक प्रवृत्ति भी विकसित होने लगती है."

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अलग-अलग वर्ग की महिलाओं में हिंसा के रूप अलग हो सकते हैं. विकलांग महिलाएं सबसे अधिक प्रभावित होती हैं. कम आयवर्ग की महिलाएं अधिकतर शारीरिक हिंसा का सामना करती हैं और अक्सर खुलकर शिकायत करती हैं. जबकि, मध्यम वर्ग में मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना ज्यादा होती है. महिलाएं परिवार की इज्जत बचाने के लिए इसे छुपाती हैं.

डॉ. दिव्यांश का कहना है कि मेडिकल की किताबों में आईपीवी के बारे में लिखा है, मगर उसपर जोर नहीं दिया जाता. वह कहते हैं, "एमबीबीएस और एमडीम की परीक्षा में इस पर कोई सवाल नहीं पूछा जाता. इसे केवल पढ़ाने के लिए ही पढ़ा दिया जाता है."

महिलाओं के लिए कानूनी रास्ता मुश्किल

आईपीवी को रोकने के लिए कई देशों ने सख्त रवैया अपनाया है. ब्राजील, संयुक्त राज्य अमेरिका और पेरू जैसे देशों में कड़े कानून हैं. यूरोपीय संघ ने साल 2024 में पहली बार एक समग्र कानून अपनाया.

यह कानून महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा को रोकने, इसे अपराध मानने और पीड़ितों के लिए सुरक्षा व सहायता सुनिश्चित करने के नियम तय करता है. इसके तहत बिना सहमति के अंतरंग यौन सामग्री को साझा करना, साइबर स्टॉकिंग, साइबर हैरैसमेंट और हिंसा को उकसाने वाले ऑनलाइन व्यवहार शामिल हैं.

भारत में भी डीवी कानून है, लेकिन इसके तहत मामलों के निपटारे में कई साल बीत जाते हैं. विशेषज्ञों के अनुसार, सामाजिक ढांचे के कारण बहुत सी महिलाओं को पति का उनपर हाथ उठाना सामान्य लगने लगता है. परिवार, बच्चों के भविष्य और सामाजिक बदनामी के डर से अधिकांश महिलाएं एफआईआर या शिकायत दर्ज कराने से बचती हैं.

'मजलिस' एक कानूनी सहायता और अधिकार संगठन है. यह महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए काम करता है. इसकी निदेशक एडवोकेट ऑड्रे डीमेलो डीडब्ल्यू को बताती हैं कि अक्सर हिंसा अचानक नहीं होती, बल्कि धीरे-धीरे शुरू होती है. शुरुआत में साथी ताना देना, आलोचना करना या अपमानजनक बातें करता है. इसे प्यार या मजाक समझ लिया जाता है. लगातार ऐसा होने पर यह भावनात्मक दबाव और डर पैदा करता है.

दिल्ली से ज्यादा मुंबई सुरक्षित लगता है महिलाओं को

ऑड्रे डीमेलो के मुताबिक, हर साल 'मजलिस' को देशभर से 15 से 20 हजार कॉल्स आते हैं. इसमें से केवल 10 प्रतिशत महिलाएं ही कानूनी रास्ता अपनाती हैं. न्याय पाने की प्रक्रिया बहुत कठिन और लंबी होती है. पुलिस और अदालत अक्सर कोशिश करती हैं कि तलाक न हो. मामला दर्ज होने के बाद 60 दिनों में फैसला हो जाना चाहिए, लेकिन वास्तविकता में ऐसा बहुत कम होता है.

ऑड्रे डीमेलो बताती हैं, "अदालतें मामले को मध्यस्थता या समझौते के लिए बार-बार भेजती हैं. लोक अदालत जैसे फोरम का सहारा लिया जाता है, जिससे समय और भी बढ़ जाता है. कभी-कभी दूसरे पक्ष के लोग अदालत में उपस्थित नहीं होते. अदालत कई महीनों बाद अगली तारीख देती है. मेंटेनेंस ऑर्डर के लिए महीनों या सालों तक इंतजार करना पड़ता है. कई मामलों में दो से तीन साल या उससे भी अधिक समय लग सकता है."