आचार्य प्रशांत ने किया योग के वास्तविक स्वरूप का पुनर्स्थापन; 40 से अधिक पीवीआर-आईएनओएक्स सिनेमाघरों में गीता सत्र का सीधा प्रसारण
प्राशांत अद्वैत फाउंडेशन और पीवीआर-आईएनओएक्स की ओर से आयोजित एक ऐतिहासिक कार्यक्रम में, प्रसिद्ध दार्शनिक और बेस्टसेलिंग लेखक आचार्य प्रशांत ने “भगवद्गीता के प्रकाश में योग” विषय पर देश को संबोधित किया. यह संबोधन गोवा के पीवीआर-आईएनओएक्स ओसिया से हुआ और इसे भारत भर के 40 से अधिक सिनेमाघरों में एक साथ लाइव प्रसारित किया गया.
गोवा, 21 जून : प्राशांत अद्वैत फाउंडेशन और पीवीआर-आईएनओएक्स की ओर से आयोजित एक ऐतिहासिक कार्यक्रम में, प्रसिद्ध दार्शनिक और बेस्टसेलिंग लेखक आचार्य प्रशांत ने “भगवद्गीता के प्रकाश में योग” विषय पर देश को संबोधित किया. यह संबोधन गोवा के पीवीआर-आईएनओएक्स ओसिया से हुआ और इसे भारत भर के 40 से अधिक सिनेमाघरों में एक साथ लाइव प्रसारित किया गया.
दर्शकों ने इस बार टिकट मनोरंजन के लिए नहीं, आत्मज्ञान के लिए खरीदे. इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि सिनेमाहॉल में भगवद्गीता पर चर्चा हुई. गुड़गांव, मुंबई, पुणे, पटना, भोपाल, इंदौर सहित कई शहरों के दर्शकों ने थिएटर भरे, जहां आधुनिक भ्रांतियों को चुनौती देने वाला एक गहन गीता सत्र हुआ, जिसने भारत के योग से संबंध को फिर से जाग्रत किया. यह भी पढ़ें : दुनिया तनाव से गुजर रही है, योग से हमें शांति की दिशा मिलती है: प्रधानमंत्री मोदी
“गीता का योग शारीरिक लचीलापन नहीं, आंतरिक अजेयता है,” आचार्य प्रशांत ने वैश्विक स्तर पर योग के बाजारीकरण की आलोचना करते हुए कहा. “प्राचीन योगी सोशल मीडिया लाइक्स के लिए आसन नहीं कर रहे थे. वे सत्य के योद्धा थे. अर्जुन से उठकर लड़ने को कहा गया था, आसन जमाने को नहीं. योग मूलतः तुम्हारी आंतरिक जड़ता से लड़ाई है.”
यह तीखी सांस्कृतिक समीक्षा उस विचारक की है जिसने अपना जीवन शास्त्रों के वास्तविक अर्थ को पुनर्जीवित करने में समर्पित कर दिया है. प्राशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक और 160 से अधिक पुस्तकों के लेखक के रूप में आचार्य प्रशांत ने प्राचीन वेदांत को जलवायु परिवर्तन, मानसिक विघटन, पशु क्रूरता और आध्यात्मिक भ्रम जैसे समकालीन संकटों के समाधान से जोड़ा है.
वे विश्व के सबसे बड़े भगवद्गीता शिक्षण कार्यक्रम का नेतृत्व कर रहे हैं, जिसमें 100,000 से अधिक प्रतिभागी जुड़े हैं, और जो अविश्वसनीय गति से फैल रहा है-जिसे पर्यवेक्षक “न्यूक्लियर चेन रिएक्शन” की तरह मानते हैं. फाउंडेशन ने हाल ही में विश्व की सबसे बड़ी गीता-आधारित ऑनलाइन परीक्षा आयोजित की, जिसमें दुनियाभर से साधकों ने भाग लिया.
आचार्य प्रशांत का अध्यात्मबोध वेदांत, बौद्ध दर्शन, अस्तित्ववाद और आधुनिक मनोविज्ञान का समावेशी संगम है, जो यूसी बर्कले, बार्ड कॉलेज, आईआईटी, आईआईएम, आईआईएस, और एआईआईएमएस जैसे संस्थानों में युवाओं को प्रशिक्षित कर रहा है. वे एनडीटीवी और द संडे गार्जियन में संपादकीय लेखक भी हैं. हाल ही में, आईआईटी दिल्ली एलुमनाई एसोसिएशन ने उन्हें “राष्ट्रीय विकास में असाधारण योगदान” (ओसीएनडी) सम्मान से नवाज़ा है, और “सबसे प्रभावशाली पर्यावरणविद्” पुरस्कार भी ग्रीन सोसायटी ऑफ इंडिया से प्राप्त हुआ है. कार्यक्रम से पहले पत्रकारों से बातचीत में आचार्य प्रशांत ने योग की लोकप्रिय छवि पर सवाल उठाए:
“आज योग चमकदार मंचों पर मनाया जा रहा है, सेलिब्रिटीज द्वारा किया जा रहा है, मैट्स और आउटफिट्स के साथ बेचा जा रहा है. लेकिन क्या हम जानते हैं कि योग को जीना क्या होता है? गीता कहती है: ‘योगः कर्मसु कौशलम्’ और ‘योगः समत्वम्’. जब तक यह नहीं समझा, तब तक यह योग नहीं, सिर्फ़ करतब है.” उन्होंने चेतावनी दी कि आजकल योग शब्दावली को वेलनेस इंडस्ट्री ने हड़प लिया है: “योग कोई फैशन नहीं है. यह आंतरिक प्रतिबद्धता है-क्रांतिकारी, स्पष्ट और साहसी. गीता अर्जुन को ध्यान लगाने के लिए नहीं कहती, बल्कि युद्ध के बीच विवेकपूर्ण कर्म करने के लिए प्रेरित करती है.”
इस आयोजन का स्वरूप दर्शकों पर गहरा प्रभाव छोड़ गया. कई लोगों ने साझा किया कि यह भारत की आध्यात्मिक विरासत को जनता के बीच लौटाने जैसा है. संदेश साफ था: योग दुनिया से भागने का साधन नहीं, जागरूकता और स्पष्टता के साथ उससे निपटने की तैयारी है. जैसे ही अंतरराष्ट्रीय योग दिवस समाप्त हुआ, आचार्य प्रशांत की यह बात गूंजती रही: “सच्चा योग किसी आसन से नहीं, एक उद्देश्य से शुरू होता है, और वह उद्देश्य है-सत्य.”
(The above story first appeared on LatestLY on Jun 21, 2025 10:04 AM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

