'पॉश' शिकायतों की अनदेखी से कैसे बिगड़ता है दफ्तरों का माहौल
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

महाराष्ट्र के नासिक में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) के बीपीओ कैंपस में महिलाओं के साथ हुए कथित यौन दुर्व्यवहार ने कॉरपोरेट दफ्तरों की सच्चाई पर सवाल खड़े कर दिए हैं.भारत में पॉश कानून के तहत हर कंपनी में यौन उत्पीड़न की शिकायतों के लिए एक समिति बनाना जरुरी है. इसका काम निष्पक्ष और समय रहते जांच करना है. नासिक में टीसीएस के ऑफिस में यौन उत्पीड़न के मामले सामने आए हैं. आरोप है कि टीसीएस ने पॉश (प्रिवेंशन ऑफ सेक्सुअल हैरेसमेंट) कानून की गाइडलाइंस की अनदेखी की. विशेष जांच टीम (एसआईटी) मामले की पड़ताल कर रही है. कर्मचारी संगठन 'नैसेंट इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एम्प्लॉइज सीनेट' ने श्रम और रोजगार मंत्रालय को पत्र लिखकर महाराष्ट्र की अन्य आईटी कंपनियों में पॉश अनुपालन का ऑडिट कराने की मांग की है.

भारत की बड़ी सूचीबद्ध कंपनियों में वित्त वर्ष 2025 के दौरान यौन उत्पीड़न की शिकायतों में 6.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई. पिछले साल सितंबर में सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून के प्रभावी क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने का आदेश भी दिया था. अदालत ने माना कि कई कंपनियों में कानून का सही तरीके से पालन नहीं हो रहा है. इस व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत है. सवाल उठता है कि कार्यस्थल पर शिकायतों के निपटारे की प्रक्रियाएं कितनी प्रभावी और संवेदनशील हैं.

पॉश समिति द्वारा ठोस प्रयासों की कमी

पॉश कानून साल 2013 से लागू है. इसके तहत 10 या उससे अधिक कर्मचारियों वाले हर संस्थान में आंतरिक शिकायत समिति (आईसीसी) बनाना अनिवार्य है. समिति में आधे सदस्य महिलाएं और एक बाहरी सदस्य होना चाहिए. इसके पालन की जिम्मेदारी अधिकतर एचआर और लीगल विभाग की होती है. छोटे संस्थानों और असंगठित क्षेत्र की महिलाओं के लिए जिला स्तर पर स्थानीय शिकायत समिति (एलसी) की व्यवस्था होती है. शिकायत दर्ज होने के 90 दिन के भीतर समिति रिपोर्ट तैयार करती है. इसी के आधार पर कंपनियां फैसला लेती हैं.

जानकार बताते हैं कि औपचारिक क्षेत्र में कुछ ही कंपनियों में आईसीसी बनी होती है. कई जगह इसका गठन शिकायत आने पर होता है. आईसीसी की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी, ‘रोकथाम' और ‘निषेध' पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता. यह केवल शिकायत आने पर कार्रवाई करने तक सीमित रह जाती है.

‘कैपग्रो कॉरपोरेट एडवाइजरी सर्विसेज' में वाइस प्रेसिडेंट (ऑपरेशंस) और पॉश ट्रेनर अविका कपूर कई कंपनियों की आईसीसी में बाहरी सदस्य के तौर पर जुडी हैं. अविका डीडब्ल्यू को बताती हैं कि कंपनियां पॉश ट्रेनिंग को एक 'खर्च' की तरह देखती हैं. इसके लिए उन्हें ट्रेनर बुलाना पड़ता है और फीस देनी होती है. कर्मचारियों को ट्रेनिंग के लिए काम के बीच दो से तीन घंटे का समय निकालना पड़ता है. जिसे कंपनियां अक्सर काम के समय की बर्बादी की तरह देखती हैं.

समीक्षा झा ‘मार्था फेरेल फाउंडेशन' में बतौर प्रोग्राम लीड काम कर रही हैं. यहां वह कार्यस्थल पर सुरक्षा, यौन उत्पीड़न की रोकथाम और जागरूकता को बढ़ावा देने से जुड़े कार्यक्रमों का नेतृत्व करती हैं. समीक्षा कहती हैं कि कई कंपनियों में स्पष्ट पॉश नीतियां मौजूद नहीं होती.

वह अपने अनुभव से बताती हैं, "महिलाओं को नौकरी या करियर के नुकसान का डर दिखाकर शिकायत दर्ज करने से रोका जाता है. उन्हें आपस में ही मामला सुलझाने की सलाह दी जाती है. कंपनी के हेड और एचआर के भीतर एक पूर्वाग्रह भी देखने को मिलता है. यह मान लिया जाता है कि दर्ज की गई शिकायतें झूठी हैं. प्रशिक्षण देते समय पहला सवाल यही उठता है कि इसके दुरुपयोग को कैसे रोका जाए. पूरे मुद्दे का मजाक बनाया जाता है."

असंगठित क्षेत्र में भी समस्या गंभीर

समीक्षा पिछले 8 सालों से कई संस्थानों में पॉश ट्रेनिंग दे चुकी हैं. खासकर सरकारी संस्थानों में ऐसे प्रशिक्षणों में केवल महिला कर्मचारियों को ही भेजा जाता है. यौन उत्पीड़न केवल गंभीर घटनाओं तक सीमित नहीं है. यह किसी महिला कर्मचारी को असहज करने वाला मैसेज भेजना, उसकी निजी या यौन जीवन पर टिप्पणी करना और आपत्तिजनक मजाक करने जैसा मामूली दिखने वाला व्यवहार भी हो सकते हैं. इसका महिलाओं के काम और मानसिक स्थिति पर सीधा असर पड़ता है.

समीक्षा कहती हैं, "पुरुष कर्मचारियों को भी यह समझाना जरुरी है कि कौन-सा व्यवहार महिलाओं को असहज करता है. ताकि कार्यस्थल वास्तव में सुरक्षित और संवेदनशील बन सके. असंगठित क्षेत्र में महिलाओं की स्थिति और भी गंभीर है."

मार्था फेरेल फाउंडेशन द्वारा 2017 में दायर एक आरटीआई के मुताबिक, भारत के 655 जिलों में से केवल 191 में ही स्थानीय समितियां (एलसी) सक्रिय थीं. जहां एलसी मौजूद भी हैं, वहां तक पहुंच अब भी मुश्किल बनी हुई है. साल 2023 के एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि 96 प्रतिशत महिला घरेलू कामगारों के लिए मेजिस्ट्रेट कार्यालय की दूरी और जागरूकता की कमी के कारण एलसी तक पहुंचना कठिन होती है.

समीक्षा ने आगे बताया, "शिकायत दर्ज कराने के लिए महिलाएं मजिस्ट्रेट के पास जाती हैं. अक्सर देखा गया है कि एलसीसी के कई सदस्यों को यह तक पता नहीं होता कि वे उसका हिस्सा हैं और ऐसे मामलों से कैसे निपटना है."

'महिला कर्मचारी को 'बोझ' समझती हैं कंपनियां'

एडवोकेट पर्सिस सिधवा पिछले 12 सालों से बाल एवं महिला अधिकारों की वकील हैं. वह कई कंपनियों की आईसीसी में सदस्य रही हैं. वह बताती हैं कि जब आरोपी कंपनी में किसी प्रभावशाली या वरिष्ठ पद पर होता है या कंपनी उसे महत्वपूर्ण मानती है, तो शिकायत चाहे जितनी गंभीर क्यों न हो, महिलाओं को न्याय नहीं मिल पाता. ऐसे मामलों में महिलाओं को अक्सर ‘बोझ' या ‘परेशानी' समझ लिया जाता है.

पर्सिस ने डीडब्ल्यू से कहा, "भले ही कंपनी शिकायत को गंभीरता से ले, महिलाओं को अक्सर प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है. शिकायत दर्ज कराने पर सहकर्मी उन्हें ताने देते हैं और दोषी ठहराते हैं. कई महिलाओं ने मुझसे कहा है कि समिति का गठन कानून के अनुसार सही तरीके से नहीं किया गया. शिकायतों का निवारण 90 दिनों के भीतर नहीं हुआ."

अविका कपूर इसमें जोड़ती हैं. कंपनी के आकार के अनुसार नियमित ट्रेनिंग होती रहनी चाहिए. पूरे साल संदेशों व पोस्टरों के जरिए जागरूकता बढ़ाई जाए. शिकायतों को नजरअंदाज करने से कंपनी की छवि पर लंबे समय तक असर पड़ता है. यह सोशल मीडिया का जमाना है, जहां एक पोस्ट लिखकर भी आप अपनी बात रख सकते हैं. सरकार भी अपनी तरफ से कोशिशें कर रही है. महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने 2017 में 'शी-बॉक्स' लॉन्च किया. सरकारी, निजी या असंगठित क्षेत्र की कोई भी महिला इस पर ऑनलाइन शिकायत दर्ज करा सकती है. लेकिन विशेषज्ञ बताते हैं कि इसके बारे में जागरूकता कम है.