नई दिल्ली, 5 जून: संयुक्त राष्ट्र (UN) ने वैश्विक समुदाय को सचेत करते हुए कहा है कि दुनिया को प्राकृतिक मौसमी चक्र 'अल नीनो' (El Niño) की आसन्न वापसी और इसके कारण बढ़ने वाले वैश्विक तापमान व चरम मौसमी घटनाओं (Weather Extremes) के लिए पूरी तरह तैयार रहना चाहिए. विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) द्वारा जारी नवीनतम अनुमानों के अनुसार, इस बात की 80 प्रतिशत संभावना है कि यह शक्तिशाली मौसमी पैटर्न सितंबर 2026 से पहले पूरी तरह सक्रिय हो जाएगा, जबकि नवंबर से पहले इसके बनने की संभावना 90 प्रतिशत तक है. जलवायु विशेषज्ञों के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि इस बार अल नीनो का प्रभाव मानव-प्रेरित वैश्विक ग्लोबल वार्मिंग के दौर में सामने आ रहा है, जिससे इसके परिणाम पहले की तुलना में कहीं अधिक विनाशकारी और 'सुपरचार्ज्ड' हो सकते हैं. इस मौसमी बदलाव की मार सबसे ज्यादा एशिया महाद्वीप पर पड़ने की आशंका है, जहां भीषण गर्मी और सूखे के चलते कृषि, बिजली ग्रिड और पानी की आपूर्ति प्रणालियों पर अत्यधिक दबाव पड़ेगा. यह भी पढ़ें: El Nino Alert 2026: डब्ल्यूएमओ की गंभीर चेतावनी; अगस्त तक अल नीनो आने की 80% संभावना, भारत में कमजोर मानसून और भीषण गर्मी का बढ़ा खतरा
भारत के लिए 'घातक संयोजन': मानसून और कृषि पर संकट
भारतीय उपमहाद्वीप के संदर्भ में पर्यावरणविदों ने चेतावनी दी है कि अल नीनो का आगमन देश के लिए एक 'घातक संयोजन' साबित हो सकता है. मुख्य चिंता यह है कि यह प्रणाली पहले से ही 'औसत से कम' रहने के लिए अनुमानित दक्षिण-पश्चिम मानसून को और अधिक कमजोर कर सकती है. यदि मानसूनी बारिश में देरी होती है, तो देश के कई हिस्सों में हाल के हफ्तों से जारी भीषण लू (Heatwave) की अवधि और लंबी खिंच जाएगी, जिससे बड़े पैमाने पर जनहानि और आजीविका का संकट खड़ा हो सकता है.
भारतीय कृषि विशेषज्ञ और कार्यकर्ता देवेंद्र शर्मा के अनुसार, जलवायु परिवर्तन और वर्तमान भू-राजनीतिक (Geopolitical) परिस्थितियों के बीच साल 2026 भारत के लिए एक कठिन परीक्षा का मैदान बनने जा रहा है. उन्होंने स्पष्ट किया कि जुलाई या अगस्त में अल नीनो का प्रभाव पूरी तरह दिखाई देने लगेगा, जो विशेष रूप से खरीफ फसलों की बुवाई करने वाले किसानों और देश की समग्र खाद्य सुरक्षा (Food Security) के लिए बेहद नुकसानदेह साबित होगा. इसके अलावा, पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) के संकट के कारण किसान पहले से ही रोपण के लिए आवश्यक उर्वरकों की संभावित कमी और ईंधन की बढ़ती कीमतों से जूझ रहे हैं.
मुंबई में गहरा सकता है जल संकट
अल नीनो का सीधा असर भारत के शहरी बुनियादी ढांचे और देश की आर्थिक राजधानी मुंबई पर भी देखने को मिल सकता है. मुंबई की 22 मिलियन (2.2 करोड़) से अधिक आबादी पूरी तरह से बारिश पर निर्भर रहने वाली सात झीलों के जल भंडार पर टिकी हुई है. वर्तमान में इन झीलों में केवल 45 दिनों की आवश्यकता को पूरा करने जितना ही पानी शेष बचा है. ऐसे में यदि अल नीनो के प्रभाव के कारण जून और जुलाई में मानसून के आगमन में थोड़ी भी देरी होती है, तो मुंबई महानगर को एक अभूतपूर्व और गंभीर जल संकट (Water Crisis) का सामना करना पड़ सकता है.
चीन में चरम मौसम की मार: आपातकालीन भंडारण की सलाह
एशिया के दूसरे बड़े हिस्से यानी चीन में भी अल नीनो के कारण इस बार गर्मियों में भीषण बाढ़ और सूखे का दोहरा संकट गहराने की आशंका है, जिससे बिजली ग्रिड पर अत्यधिक दबाव बढ़ गया है. चीन के राष्ट्रीय जलवायु केंद्र के अनुसार, अल नीनो का प्रभाव शरद ऋतु और सर्दियों में अपने चरम पर होगा, जिसके कारण दक्षिणी चीन में अत्यधिक भारी बारिश और देश के बाकी हिस्सों में रिकॉर्ड तोड़ तापमान दर्ज किया जा सकता है.
चीनी सरकारी मीडिया शिन्हुआ (Xinhua) के मुताबिक, देश के कुछ हिस्सों में इस साल औसत से 20 प्रतिशत अधिक बारिश होने का अनुमान है. तिब्बती पठार पर स्थित उत्तर-पश्चिमी प्रांत किंगहाई (Qinghai) के मौसम विज्ञान ब्यूरो ने स्थानीय नागरिकों को चेतावनी जारी करते हुए अचानक होने वाले मौसमी बदलावों से निपटने के लिए घरों में आपातकालीन आवश्यक वस्तुओं और रसद का स्टॉक (Stockpiles) रखने की सलाह दी है. वर्तमान में दक्षिणी और पूर्वी चीन के कई हिस्सों, विशेषकर हुबेई (Hubei) प्रांत में 200 मिलीमीटर से अधिक की मूसलाधार बारिश ने बाढ़ नियंत्रण की स्थिति को बेहद संवेदनशील बना दिया है.
दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए एक बड़ा 'स्ट्रेस टेस्ट'
मलेशिया, सिंगापुर, इंडोनेशिया, थाईलैंड और फिलीपींस जैसे दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के लिए अल नीनो को एक बड़े 'स्ट्रेस टेस्ट' के रूप में देखा जा रहा है. यूनिवर्सिटी मलेशिया सबाह के विशेषज्ञों के अनुसार, सामान्य दिनों में प्रशांत महासागर की मानसूनी हवाएं इस क्षेत्र में भारी बारिश लाती हैं, लेकिन अल नीनो के दौरान इन हवाओं के कमजोर पड़ने या विपरीत होने से वायुमंडलीय नमी पूर्व की ओर खिसक जाती है. इस व्यवधान के कारण पूरे क्षेत्र में लंबे समय तक सूखा, जंगल की आग (Wildfires) और गंभीर वायु प्रदूषण का खतरा बढ़ जाता है.
इस शुष्कता का सबसे बड़ा झटका चावल (Rice) और पाम ऑयल (Palm Oil) जैसी मुख्य फसलों को लगेगा, जिससे बाजार में खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ेंगी और कम आय वाले परिवारों की पोषण सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी. ग्रामीण और सुदूरवर्ती इलाकों में पानी के प्राकृतिक स्रोत सूखने से हैजा (Cholera) जैसी जलजनित बीमारियों और डेंगू व मलेरिया जैसी उष्णकटिबंधीय बीमारियों के फैलने की आशंका बढ़ गई है. साथ ही, तापमान के 40 डिग्री सेल्सियस के पार जाने से बैंकॉक से लेकर दा नांग तक का पर्यटन क्षेत्र भी बुरी तरह प्रभावित होने की कगार पर है.












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