नई दिल्ली, 5 जून: देश में दक्षिण-पश्चिम मानसून (Southwest Monsoon) के दस्तक देने के साथ ही एक गंभीर मौसमी और आर्थिक चिंता सामने आने लगी है. भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (India Meteorological Department) (IMD) ने अपने नवीनतम बुलेटिन में चेतावनी दी है कि इस साल मानसून सीजन के दौरान पूर्वोत्तर भारत में तो सामान्य बारिश होने की संभावना है, लेकिन देश के शेष अधिकांश हिस्सों में सामान्य से कम (Below-Normal) वर्षा दर्ज की जा सकती है. मौसम वैज्ञानिकों के लिए सबसे बड़ी चिंता प्रशांत महासागर में 'सुपर अल नीनो' (Super El Niño) के उभरने की तीव्र गति है. यदि यह प्रणाली अनुमान के अनुरूप बेहद मजबूत होती है, तो यह देश की कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था, ग्रामीण आय और खाद्य कीमतों को सीधे तौर पर प्रभावित कर सकती है. यह भी पढ़ें: El Niño Alert 2026: 'अल नीनो' की वापसी से एशिया में चरम मौसम का संकट; भारत के मानसून, कृषि और खाद्य सुरक्षा पर मंडराया दोहरा खतरा
पिछले साल की तुलना में इस बार स्थितियां विपरीत
साल 2026 का यह सूखा और चिंताजनक पूर्वानुमान पिछले वर्ष के बिल्कुल उलट है। गौरतलब है कि साल 2025 में मानसून ने देश भर में बेहतरीन प्रदर्शन किया था और लंबी अवधि के औसत (LPA) की 108 प्रतिशत के बराबर प्रचुर बारिश दर्ज की गई थी. पिछली इस अच्छी मानसूनी वर्षा ने देश भर के जलाशयों को पानी से पूरी तरह भर दिया था और कृषि उत्पादन को बड़ा बढ़ावा मिला था.
भारत में मानसूनी बारिश के कमजोर होने की आशंका इसलिए इतनी बड़ी चिंता का विषय है, क्योंकि देश की कुल वार्षिक वर्षा का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा अकेले इसी मानसून से प्राप्त होता है. इसके अलावा, भारत की लगभग आधी कृषि योग्य भूमि आज भी सिंचाई के कृत्रिम साधनों के बजाय सीधे तौर पर इसी प्राकृतिक वर्षा पर निर्भर है.
क्या है 'सुपर अल नीनो' और क्यों है यह खतरनाक?
अल नीनो एक ऐसी वैश्विक जलवायु घटना है, जो तब विकसित होती है जब भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर (Equatorial Pacific Ocean) के कुछ हिस्सों में समुद्र की सतह का तापमान असामान्य रूप से गर्म हो जाता है. भारत से हजारों किलोमीटर दूर होने के बावजूद यह प्रणाली भारतीय मानसून को सबसे ज्यादा प्रभावित करती है और उपमहाद्वीप तक पहुंचने वाली मानसूनी हवाओं की नमी को सोख लेती है, जिससे सूखे की आशंका बढ़ जाती है.
आईएमडी के अनुसार, इस साल के मानसून सीजन के दौरान अल नीनो की स्थिति उभरने की 92 प्रतिशत संभावना है। विश्व की कई अग्रणी मौसम एजेंसियों का अनुमान है कि इस बार प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से 2.5 डिग्री सेल्सियस से भी अधिक ऊपर जा सकता है, जिसका सीधा मतलब है कि यह इतिहास के सबसे शक्तिशाली अल नीनो के रूप में दर्ज हो सकता है. यूके मेट ऑफिस के दीर्घकालिक पूर्वानुमान प्रमुख एडम स्केफ ने भी सचेत किया है कि यह अल नीनो दशकों का सबसे मजबूत या रिकॉर्ड तोड़ने वाला रूप ले सकता है. इससे पहले साल 2015 में आए 'सुपर अल नीनो' के दौरान भारत का मानसून गिरकर औसत का केवल 86 प्रतिशत रह गया था, जिससे देश को बड़े ग्रामीण संकट का सामना करना पड़ा था.
कमजोर मानसून से बढ़ सकता है महंगाई का बोझ
इस मौसमी संकट का समय भारत के लिए आर्थिक रूप से बेहद संवेदनशील मोड़ पर आया है। देश इस समय ईरान युद्ध के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतों और मुद्रास्फीति (Inflation) के झटके से पहले ही जूझ रहा है. घरेलू स्तर पर रुपया अपने निचले स्तर पर है, थोक मुद्रास्फीति 8.3 प्रतिशत पर पहुंच चुकी है और खुदरा महंगाई 13 महीने के उच्चतम स्तर पर चल रही है.
चूंकि भारत अपनी जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए ऊर्जा की कीमतों में होने वाली हर बढ़ोतरी सीधे परिवहन लागत और विनिर्माण खर्चों को बढ़ा देती है. ऐसे में यदि मानसून कमजोर रहता है, तो खाद्य पदार्थों की कीमतों में तेजी आएगी, जो भारतीय अर्थव्यवस्था और आम उपभोक्ताओं पर चौतरफा बजटीय दबाव डाल सकती है.
आईओडी (IOD) और पश्चिमी विक्षोभ का दोहरा प्रभाव
आमतौर पर, भारत को अल नीनो के दुष्प्रभावों से बचाने में हिंद महासागर द्विध्रुव (Indian Ocean Dipole - IOD) नामक एक अन्य मौसमी पैटर्न से मदद मिलती है. जब पश्चिमी हिंद महासागर का हिस्सा पूर्वी हिस्से की तुलना में अधिक गर्म होता है, तो इसे 'पॉजिटिव आईओडी' कहा जाता है, जो भारत में बारिश को बढ़ाकर अल नीनो के प्रभाव को बेअसर कर देता है. लेकिन इस बार आईएमडी ने इसके पूरी तरह 'न्यूट्रल' यानी तटस्थ रहने का अनुमान लगाया है, जिससे कोई अतिरिक्त मदद मिलने के संकेत नहीं हैं.
इसके साथ ही, विशेषज्ञों की चिंता 'पश्चिमी विक्षोभ' (Western Disturbances) को लेकर भी बढ़ गई है. ये तूफान प्रणालियां आमतौर पर सर्दियों और वसंत में उत्तर-पश्चिम भारत को प्रभावित करती हैं, लेकिन हाल के वर्षों में इनका व्यवहार असामान्य हो गया है. एक सामान्य मानसून सीजन में केवल कुछ ही विक्षोभ सक्रिय होते हैं, लेकिन पिछले साल इनकी संख्या 17 दर्ज की गई थी. मानसून के आगमन से ठीक पहले ही उत्तर-पश्चिम भारत में दो पश्चिमी विक्षोभ रिकॉर्ड किए जा चुके हैं. जब ये प्रणालियां मानसूनी हवाओं से टकराती हैं, तो अचानक बादल फटने, फ्लैश फ्लड (अचानक बाढ़) और भूस्खलन जैसी चरम मौसमी आपदाएं आ सकती हैं.
तैयारियों के मोर्चे पर राहत, संयुक्त राष्ट्र की बड़ी चेतावनी
सकारात्मक पहलू यह है कि भारत इस बार मानसून सीजन में पहले की तुलना में अधिक बेहतर प्रशासनिक तैयारियों के साथ प्रवेश कर रहा है. देश के प्रमुख जलाशयों में पानी का स्तर वर्तमान में स्वास्थ्यप्रद स्थिति में है, मौसम पूर्वानुमान तकनीकों में भारी सुधार हुआ है और सूखा प्रवृत्त जिलों के लिए पहले से ही आकस्मिक योजनाएं (Contingency Plans) तैयार कर ली गई हैं. किसानों को सूखा-प्रतिरोधी फसलों की बुवाई करने और जल संरक्षण तकनीकों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है.
इसके बावजूद, वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय स्थिति को लेकर बेहद गंभीर है. संयुक्त राष्ट्र (UN) के प्रमुख एंटोनियो गुटेरेस ने इस सप्ताह एक कड़ा संदेश जारी करते हुए कहा, 'दुनिया को इसे एक अत्यंत जरूरी और गंभीर जलवायु चेतावनी के रूप में लेना चाहिए. अल नीनो की यह परिस्थितियां पहले से ही गर्म हो रही दुनिया की आग में घी डालने का काम करेंगी.'













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