Prahaar Movie Review: राजकुमार राव की दमदार एक्टिंग से सजी, इंसाफ के जंग की अनसुनी कहानी है यह फिल्म
फिल्मों ने भारतीय सिनेमा में कोर्टरूम ड्रामा को एक नई पहचान दी है, लेकिन 'प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्ज्वल निकम' खुद को इस जॉनर की दूसरी फिल्मों से बिल्कुल अलग स्थापित करती है. जहाँ ज़्यादातर फिल्में केस की कानूनी पेचीदगियों को ही दिखाती हैं, वहीं 'प्रहार' एक वकील की निजी ज़िंदगी, उसके परिवार और देश सेवा के बीच पिसती उसकी भावनाओं को गहराई से उकेरती है.
Prahaar Movie Review: अविनाश अरुण (Avinash Arun) के निर्देशन में बनी और 140 मिनट की अवधि वाली इस फिल्म में राजकुमार राव (Rajkummar Rao), वामिका गब्बी (Wamiqa Gabbi), ललित प्रभाकर, जयदीप अहलावत, सिकंदर खेर और आशीष विद्यार्थी जैसे बेहतरीन कलाकारों की शानदार स्टार कास्ट देखने को मिलती है. लेटेस्टली हिंदी ने इस फिल्म को 4 स्टार्स की रेटिंग दी है; इस बेहतरीन रेटिंग की वजह जानने के लिए आगे का रिव्यू पढ़ें.
फिल्मों ने भारतीय सिनेमा में कोर्टरूम ड्रामा को एक नई पहचान दी है, लेकिन 'प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्ज्वल निकम' खुद को इस जॉनर की दूसरी फिल्मों से बिल्कुल अलग स्थापित करती है. जहाँ ज़्यादातर फिल्में केस की कानूनी पेचीदगियों को ही दिखाती हैं, वहीं 'प्रहार' एक वकील की निजी ज़िंदगी, उसके परिवार और देश सेवा के बीच पिसती उसकी भावनाओं को गहराई से उकेरती है. अपने करियर में हर तरह की भूमिकाएं निभा चुके राजकुमार राव के लिए भी यह फिल्म बेहद खास है. 26/11 के हमले ने उज्ज्वल निकम की ज़िंदगी में जो भूचाल लाया, निर्देशक अविनाश अरुण ने उसे पर्दे पर बिना किसी एक्स्ट्रा ड्रामे के पेश किया है. यह फिल्म दर्शकों को सीधे उस तनावपूर्ण माहौल में ले जाती है जहाँ हर दलील के पीछे देशभक्ति और हिम्मत का इम्तिहान था.
एक ऐसी जंग, जहां हर दलील के साथ दांव पर था इंसाफ
26/11 के हमले ने मुंबई को हिलाकर रख दिया था, लेकिन इस खौफनाक रात के बाद एक और लड़ाई शुरू हुई, जिसका मैदान अदालत थी. यहां न गोलियों की आवाज थी, न सामने कोई दुश्मन, लेकिन हर दलील और हर सबूत की अपनी अहमियत थी. मकसद था उन लोगों को सजा दिलाना, जिन्होंने सैकड़ों जिंदगियों को तबाह कर दिया. 'प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्ज्वल निकम' इसी मुश्किल सफर को पर्दे पर उतारती है. अजमल कसाब का मुकदमा हो या 1993 के मुंबई बम धमाकों का मामला, फिल्म दिखाती है कि बड़े से बड़े अपराध के बाद भी इंसाफ तक पहुंचने का रास्ता आसान नहीं होता. इस लड़ाई में कानून की समझ के साथ धैर्य, हिम्मत और अपने मकसद पर टिके रहने की जरूरत होती है, लेकिन क्या दूसरों को इंसाफ दिलाने की जिद में जुटा एक इंसान अपनी निजी जिंदगी को भी संभाल पाता है? फिल्म का एक अहम पहलू इसी सवाल से जुड़ा है.
राजकुमार राव की एक्टिंग बनी फिल्म की जान
राजकुमार राव ने उज्ज्वल निकम के किरदार को गंभीरता और सहजता के साथ निभाया है. वह अपनी एक्टिंग में जरूरत से ज्यादा जोश दिखाने के बजाय छोटे-छोटे हावभाव और संवादों के जरिए किरदार का असर पैदा करते हैं. अदालत में उनकी मौजूदगी और अपनी बात पर टिके रहने का अंदाज उन्हें एक मजबूत वकील के रूप में पेश करता है. वहीं, जब बात उनके परिवार की आती है, तो उनके किरदार का एक अलग पहलू सामने आता है. राजकुमार ने एक ऐसे इंसान की उलझन को बखूबी दिखाया है, जो अपने काम के लिए पूरी तरह समर्पित है, लेकिन इसी वजह से अपने करीबियों को समय नहीं दे पाता. यही संतुलन उनके अभिनय को खास बनाता है.
ललित प्रभाकर से जयदीप अहलावत तक, कलाकारों का दमदार साथ
ललित प्रभाकर ने अजमल कसाब के किरदार को ऐसे अंदाज में निभाया है, जो दर्शकों के मन में बेचैनी पैदा करता है. फिल्म के आखिरी हिस्से में उनका कबूलनामे वाला सीन खास तौर पर ध्यान खींचता है. सिकंदर खेर बचाव पक्ष के वकील के रूप में संयमित अभिनय करते हैं, जबकि जयदीप अहलावत पाकिस्तानी सरकारी वकील के किरदार में अपनी अलग छाप छोड़ते हैं. वामिका गब्बी ज्योति निकम के रूप में कहानी में भावनात्मक जुड़ाव लाती हैं. उनका किरदार उज्ज्वल निकम की व्यस्त जिंदगी के उस हिस्से को सामने लाता है, जो अक्सर लोगों की नजरों से दूर रहता है. वहीं, आशीष विद्यार्थी जस्टिस एम. एल. तहिलियानी के रोल में अदालती दृश्यों को गंभीरता देते हैं। पूरी कास्ट कहानी को मजबूती देने में अपना योगदान देती है.
अदालत की बहस से आगे बढ़ती है कहानी
फिल्म की राइटिंग की खास बात यह है कि यह कानूनी लड़ाई को सिर्फ लंबे संवादों और नाटकीय टकराव के सहारे नहीं चलाती. दलीलों और सबूतों को जगह देते हुए कहानी धीरे-धीरे आगे बढ़ती है. इससे अदालत के सीन फिल्म के माहौल के मुताबिक गंभीर बने रहते हैं. साथ ही, उज्ज्वल निकम और उनके बेटे अनिकेत के रिश्ते को दिखाकर कहानी में भावनाओं के लिए भी जगह बनाई गई है. दोनों के बीच की दूरी और एक-दूसरे से जुड़ी उम्मीदें यह समझने में मदद करती हैं कि किसी इंसान की पेशेवर जिंदगी उसके निजी रिश्तों को किस तरह प्रभावित कर सकती है. यही पहलू फिल्म को केवल एक कानूनी मामले की कहानी बनने से आगे ले जाता है.
संगीत जो माहौल को बनाए रखता है
फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर खास मौकों पर कहानी के तनाव को बढ़ाता है. अदालत में चल रही बहसों के दौरान यह गंभीर माहौल तैयार करता है, जबकि भावनात्मक दृश्यों में किरदारों की मनःस्थिति को उभारने में मदद करता है. संगीत की सबसे अच्छी बात यह है कि यह सीन पर हावी होने की कोशिश नहीं करता. कलाकारों की एक्टिंग और कहानी को सामने रखते हुए बैकग्राउंड स्कोर जरूरी पलों को ज्यादा असरदार बनाता है.
अविनाश अरुण का सधा हुआ निर्देशन
दिनेश विजन के मैडॉक फिल्म्स के बैनर तले बनी इस फिल्म का निर्देशन अविनाश अरुण ने किया है. 'बदलापुर', 'मिमी' और 'स्त्री' जैसी अलग-अलग विषयों वाली फिल्मों के बाद मैडॉक इस बार एक गंभीर कानूनी कहानी लेकर आया है. अविनाश अरुण ने फिल्म को बेवजह के ड्रामे से दूर रखा है और अदालत की कार्यवाही को स्वाभाविक तरीके से आगे बढ़ने दिया है. उनका निर्देशन कहानी की गंभीरता बनाए रखता है. वहीं, उज्ज्वल निकम की निजी जिंदगी को भी जगह देकर वह दिखाते हैं कि किसी बड़ी जिम्मेदारी को निभाने की कीमत कई बार इंसान के अपने रिश्तों को चुकानी पड़ती है.
देखें या नहीं?
'प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्ज्वल निकम' उन दर्शकों को पसंद आ सकती है, जिन्हें कोर्टरूम ड्रामा और असली घटनाओं से जुड़ी कहानियां देखना अच्छा लगता है. राजकुमार राव की गंभीर एक्टिंग, दमदार सहायक कलाकार और अदालत में चलने वाली कानूनी लड़ाई फिल्म को देखने की वजह देते हैं. यह फिल्म सिर्फ एक चर्चित मामले को दोबारा दिखाने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उस लंबे संघर्ष की ओर भी ध्यान दिलाती है, जो किसी त्रासदी के बाद इंसाफ पाने के लिए करना पड़ता है. अगर आप ऐसी कहानी देखना चाहते हैं, जिसमें कानून, जिम्मेदारी और निजी रिश्तों के अलग-अलग पहलू सामने आते हैं, तो 'प्रहार' को मौका दिया जा सकता है.