क्या भविष्य में बचा रहेगा इंडिया गठबंधन?
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

भाजपा के खिलाफ विपक्षी एकजुटता का प्रतीक रहा इंडिया गठबंधन अब आंतरिक चुनौतियों से जूझता दिखाई दे रहा है. सहयोगी दलों के बीच बढ़ती दूरियां और नेतृत्व को लेकर असहमति इसके भविष्य पर सवाल खड़े कर रही है.हाल ही में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) ने साफ किया कि वह इंडिया गठबंधन का हिस्सा नहीं रहेगी. साल 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान डीएमके इस गठबंधन की प्रमुख सहयोगी थी. लेकिन 2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के बाद राजनीतिक समीकरण बदल गए हैं. डीएमके 8 जून को नई दिल्ली में इंडिया गठबंधन की बैठक में शामिल नहीं हुई. उसके साथ आम आदमी पार्टी ने भी गठबंधन से खुद को अलग कर लिया है.

डीएमके का कहना है कि कांग्रेस ने पिछले महीने उसके साथ दो दशक पुराने अपने राजनीतिक रिश्ते से अलग होकर अभिनेता से राजनेता बने विजय की टीवीके सरकार को समर्थन देने का फैसला किया था, जो 'विश्वासघात' है.

साल 2023 में 28 विपक्षी दलों ने मिलकर बीजेपी और उसके एनडीए गठबंधन के खिलाफ इंडिया नाम का गठबंधन बनाया था. हालांकि हाल की बैठक में सिर्फ 23 दल शामिल हुए. इस दौरान निर्णय लिया गया कि 2029 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के खिलाफ एकजुट होकर चुनाव लड़ना और साझा रणनीति अपनाना जरूरी है.

लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या अगले लोकसभा चुनाव तक इंडिया गठबंधन अपनी एकजुटता बनाए रख पाएगा या नहीं?

इंडिया गठबंधन का जन्म

विपक्षी एकजुटता की पहल की शुरुआत बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और अब एनडीए में शामिल हो चुके नीतीश कुमार ने की थी. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि समाजवादी पृष्ठभूमि से आने के कारण उनकी पहली कोशिश आरजेडी, जेडीयू, समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल जैसे समाजवादी दलों को एक मंच पर लाने की थी. हालांकि इस प्रयास में उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिली.

2022 में नीतीशकुमार ने एनडीए से अलग होकर बिहार में महागठबंधन की सरकार बनाई. उन्होंने दिल्ली में विभिन्न विपक्षी नेताओं से मुलाकातें भी कीं. नीतीश, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के खिलाफ साझा विपक्षी मोर्चा बनाने की कोशिश कर रहे थे. उसी साल महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा बदलाव आया था. एकनाथ शिंदे और शिवसेना के अन्य विधायकों ने बगावत कर दी थी. तत्कालीन मुख्यमंत्री और शिवसेना (यूबीटी) के नेता उद्धव ठाकरे को इस्तीफा देना पड़ा. महा विकास अघाड़ी (एमवीए) सरकार गिर गई.

नीतीश कुमार ने कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी), डीएमके, शिवसेना (उद्धव गुट), एनसीपी, आम आदमी पार्टी (आप) और वाम दलों सहित सभी क्षेत्रीय विपक्षी दलों को एकजुट करने में अहम भूमिका निभाई. 17 और 18 जुलाई 2023 को बेंगलुरु में हुई बैठक में विपक्षी गठबंधन को आधिकारिक रूप से 'इंडिया अलायंस' नाम दिया गया.

शुरुआत से चली आ रही अस्थिरता

इंडिया गठबंधन की नींव 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के खिलाफ संयुक्त रूप से लड़ने के उद्देश्य से रखी गई थी. इसके गठन के दौरान नेतृत्व को लेकर मतभेद सामने आए. राजनीतिक विश्लेषक सुनील कश्यप डीडब्ल्यू हिंदी को बताते हैं कि ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल, दोनों नीतीश कुमार को गठबंधन का संयोजक बनाए जाने के पक्ष में नहीं थे. बाद में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को गठबंधन का अध्यक्ष चुना गया.

राज्य विधानसभा चुनावों में इसके सहयोगी दल अक्सर अलग-अलग रास्तों पर चलते दिखाई दिए. मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों में आप और सपा ने कांग्रेसके साथ सीटों का समझौता न होने पर अकेले चुनाव लड़ा. हरियाणा और दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस और आप के बीच सीट बंटवारे पर सहमति नहीं बन सकी. वहीं पश्चिम बंगालमें तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने हर चुनाव बिना गठबंधन के लड़ा.

कांग्रेस प्रवक्ता गौतम सेठ डीडब्ल्यू हिंदी से कहते हैं, "हरियाणा जैसे राज्यों में आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़कर कांग्रेस के वोट काटे, जिसका फायदा भाजपा को मिला. डीएमके को भी तमिलनाडु की बदलती राजनीतिक स्थिति को ध्यान में रखना चाहिए. महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के राजनीतिक घटनाक्रमों के बाद क्षेत्रीय दलों को यह समझना चाहिए कि भाजपा का मुकाबला करने के लिए उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर मौजूद कांग्रेस के नेतृत्व वाले व्यापक विपक्षी मंच के साथ आना होगा."

इंडिया गठबंधन का कितना फायदा

2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने 99 सीटें जीतीं. यह 2014 में मिली 44 सीटों और 2019 में मिली 52 सीटों के मुकाबले बड़ी बढ़त थी. अब 2026 के विधानसभा चुनावों के नतीजों ने भी कांग्रेस को मौका दिया है.

सुनील कश्यप याद दिलाते हैं कि 2021 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को केरल, पश्चिम बंगाल, पुद्दुचेरी और असम में हार का सामना करना पड़ा था. इसके बावजूद, 2024 के लोकसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन का अहम हिस्सा बनकर कांग्रेस ने अपनी सीटों की संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की.

डीडब्ल्यू हिंदी ने राजनीतिक विश्लेषक और 'वोटवाइब इंडिया' के संस्थापक अमिताभ तिवारी से भी बातचीत की. उनका कहना है कि राहुल गांधी अपनी ऐसी छवि बनाने में सफल रहे हैं कि वे भाजपा का लगातार विरोध करते हैं और कभी भाजपा में शामिल नहीं होंगे.

क्या इंडिया गठबंधन आगे बढ़ पाएगा?

राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा ने एक इंटरव्यू में कहा कि संगठनात्मक सीमाओं के बावजूद कांग्रेस आज भी देश की प्रमुख राष्ट्रीय स्तर वाली विपक्षी पार्टी है. केवल एक चुनाव के नतीजों के आधार पर क्षेत्रीय दलों को अप्रासंगिक मान लेना भारतीय मतदाताओं की समझदारी और राजनीतिक परिपक्वता के साथ न्याय नहीं होगा. क्षत्रीय दलों की राष्ट्रीय दृष्टि और समावेशी सोच, उन कुछ तथाकथित राष्ट्रीय दलों की तुलना में कहीं अधिक व्यापक है.

लेखक और राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई के अनुसार, किसी भी गठबंधन में सभी दल बराबरी की स्थिति में नहीं होते. ऐसे में गठबंधन अक्सर किसी एक विचारधारा से नहीं, बल्कि चुनाव जीतने के उद्देश्य से बनते हैं. उन्हें चलाने के लिए मजबूत और प्रभावशाली दल की जरूरत होती है जो पूरे गठबंधन का नेतृत्व कर सके. ममता बनर्जी, नीतीश कुमार, एमके स्टालिन, अरविंद केजरीवाल और पिनराई विजयन जैसे नेता चाहते थे कि गठबंधन में उन्हें बराबरी का दर्जा मिले, यानी उन्हें कांग्रेस से कम न आंका जाए.

किदवई उदाहरण देते हुए समझाते हैं, "इंजन आगे बढ़ता है और बाकी डिब्बे उसके साथ चलते हैं. राष्ट्रीय स्तर पर एनडीए की डोर भाजपा और केरल में यूडीएफ की रस्सी कांग्रेस के हाथ में है. वे अपने-अपने गठबंधन की सबसे मजबूत पार्टियां हैं. 1977 की जनता पार्टी से लेकर 1996 के नेशनल फ्रंट तक, ज्यादातर बड़े गठबंधन सत्ता हासिल करने या सरकार बदलने के लक्ष्य के साथ बने. लेकिन जैसे ही यह लक्ष्य पूरा हुआ या पूरा नहीं हो सका, धीरे-धीरे उनके सहयोगी अलग होते चले गए."

किदवई का मानना है कि गठबंधन के लगभग सभी दलों की पहली प्राथमिकता अपनी पार्टी को मजबूत करना होती है. यही वजह है कि गठबंधन में साथ काम करने की इच्छा तो है लेकिन एक-दूसरे पर पूरा भरोसा अभी भी नहीं बन पाया है.

डीडब्ल्यू हिंदी से बातचीत में आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता सर्वेश मिश्रा ने कहा कि उनकी पार्टी का अब इंडिया गढ़बंधन से कोई संबंध नहीं है. उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने कभी भी अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई. उसने दिल्ली, केरल और पश्चिम बंगाल में अपने ही गठबंधन के सहयोगी दलों के खिलाफ चुनाव लड़ा, "जिस प्रकार भाजपा क्षेत्रीय दलों को खत्म करती है, उसी तरह कांग्रेस भी क्षेत्रीय पार्टियों को कमजोर करने की राजनीति कर रही है."

उत्तर प्रदेश चुनाव हो सकता है निर्णायक

अमिताभ तिवारी मानते हैं कि कई राज्यों में क्षेत्रीय दलों के कमजोर होने का फायदा सीधे कांग्रेस को मिला. केरल में वाम दलों के कमजोर होने का लाभ कांग्रेस को मिला. जबकि डीएमके की हार के बावजूद टीवीके को उन्होंने समर्थन दिया.

वह आगे बताते हैं, "इस गठबंधन का भविष्य आने वाले विधानसभा चुनावों, खासकर पंजाब और सबसे महत्वपूर्ण उत्तर प्रदेश, पर काफी हद तक निर्भर करेगा. अगर उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव अच्छा प्रदर्शन करते हैं और समाजवादी पार्टी सत्ता में आती है, तो इंडिया गठबंधन को नई मजबूती मिलेगी."

अमिताभ की मानें तो इससे आप और डीएमके जैसे दलों पर भी गठबंधन में दोबारा शामिल होने का राजनीतिक दबाव बढ़ेगा. लेकिन अगर यूपी में भाजपा की सरकार लौटी, तो इंडिया गठबंधन का अस्तित्व खत्म मुश्किल में पड़ सकता है.

समाजवादी पार्टी प्रवक्ता दीपक रंजन कहते हैं, "कांग्रेस के साथ हमारा सिर्फ गठबंधन है, विलय नहीं. उत्तर प्रदेश में सपा सबसे बड़ी पार्टी है. सीट बंटवारे के समय कांग्रेस को यह ध्यान रखना चाहिए. उसी के अनुरूप फैसला होगा."

अमिताभ का कहना है कि इंडिया गठबंधन का कोई स्पष्ट ढांचा नहीं है. इसमें न तो कोई तय नेतृत्व है और न ही कोई लिखित दस्तावेज है, जिससे उसके उद्देश्यों की स्पष्टता पता चल सके.