मानसून का बदलता पैटर्न बढ़ा रहा भारत का जलवायु संकट
पीढ़ियों से भारत में जीवन और मानसून की लय साथ चलती आई है.
पीढ़ियों से भारत में जीवन और मानसून की लय साथ चलती आई है. लेकिन अब मानसून का मिजाज बदल रहा है. कहीं लंबा सूखा, तो कहीं बादल फटना और बाढ़ की घटनाएं ना सिर्फ जलवायु परिवर्तन, बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था को भी बिगाड़ रहे हैं.आमतौर पर भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून जून के महीने में दस्तक देता है और सितंबर आते-आते विदा लेने लगता है. देश की सालाना बारिश काफी हद तक इस मानसून पर ही निर्भर है.
हालांकि, मानसून के आने का समय और बारिश की तीव्रता पहले भी बदलती रही है, लेकिन एक तय पैटर्न रहता था. इसी के हिसाब से किसान, शहर और कारोबारी अपनी तैयारियां करते थे. अब मानसून का यह पुराना पैटर्न बदल रहा है.
जुलाई के अंत से लेकर अब तक भारत के अलग-अलग हिस्सों में भारी बारिश, बाढ़, भूस्खलन और बिजली गिरने से 100 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है.
इस साल पूर्वोत्तर राज्य असम इस मानसून की बलि चढ़ा है. यहां बाढ़ से 1.2 लाख से अधिक लोग प्रभावित हुए हैं. दूसरी तरफ, केरल, जम्मू-कश्मीर, बिहार और झारखंड में भी जान माल का भारी नुकसान हुआ है.
यहां दिक्कत ज्यादा बारिश की नहीं है, बल्कि बारिश के पैटर्न की है, जो अब बिल्कुल बदल चुका है. लंबे समय तक सूखा पड़ने के बाद जब अचानक कुछ ही घंटों में तेज बारिश होती है, तो नदियां उफान पर आ जाती हैं, शहरों के ड्रेनेज सिस्टम जवाब दे देते हैं और पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है.
मौसम में हो रही उठापटक को अल नीनो ने और गंभीर बना दिया है. वैज्ञानिकों का मानना है कि लगातार बदल रहे मौसम की एक बड़ी वजह बदलती जलवायु है.
ये नए दौर का मानसून है?
यूके के नेशनल सेंटर फॉर एटमॉस्फेरिक साइंस एण्ड यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग के वरिष्ठ शोध वैज्ञानिक अक्षय देवरस भारतीय मानसून के बारे में कहते हैं कि वह "पूरी तरह एक अलग दौर” में प्रवेश कर चुका है. उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "तेज बारिश और थमी हुई बारिश, दोनों ही हमेशा से मानसून का हिस्सा रहे हैं. अब फर्क बस इतना है कि इनकी तीव्रता बढ़ रही है.”
उन्होंने बताया कि जैसे-जैसे वातावरण गर्म होता है, हवा में नमी जमा होती है. इससे बारिश कई गुना तेज और गंभीर हो जाती है.
जलवायु वैज्ञानिक और पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के पूर्व सचिव, माधवन नायर राजीवन का कहना है कि मानसून के मिजाज में बदलाव साफ नजर आ रहा है. उनका कहना है कि मानसून के पूरे सीजन में होने वाली कुल बारिश अभी भी लगभग पहले जितनी ही है. लेकिन बारिश कब होती है, कितनी तेजी से होती है और किस इलाके में कितनी बारिश होती है, इसमें साफ बदलाव नजर आ रहा है.
उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "भारतीय मानसून का मिजाज पहले से काफी बदल गया है. अब कम समय में ज्यादा बारिश होने लगी है, लंबा सूखा पड़ने लगा है और मानसून की बारिश कब, कितनी और किस इलाके में होगी, इसमें भी काफी बदलाव देखने को मिल रहा है.”
उनका मानना है कि यह सिर्फ मौसम में होने वाले उतार-चढ़ाव की वजह से नहीं हो रहा है. उन्होंने कहा, "यह मानसून के पूरे सिस्टम में हो रहे एक बड़े बदलाव का संकेत है.”
गांव और शहर दोनों खतरे में
भारत के किसान आज भी खेती के लिए काफी हद तक मानसून पर निर्भर है. लंबे समय में बारिश ना हो, तो बुवाई में देरी हो सकती है और मिट्टी में नमी कम हो सकती है. दूसरी तरफ, एकदम से आने वाली तेज बारिश फसलों को भारी नुकसान पहुंचा सकती है.
यह मुसीबत बस गांवों तक ही सीमित नहीं है. निर्माण के चलते कंक्रीट का जंगल फैलता जा रहा है और जमीन तक बारिश का पानी पहुंच नहीं पा रहा है.
एक और बड़ी समस्या यह भी है कि कई हफ्तों तक सूखा पड़ने के बाद मिट्टी सख्त हो जाती है और पानी को सोख नहीं पाती. ऐसे में जब तेज बारिश होती है, तो पानी जमीन के अंदर जाने के बजाय बाढ़ का रूप ले लेता है.
बारिश की दिक्कतों से निपटने के लिए भारत क्या कर रहा है
देओरस ने डीडब्ल्यू से कहा, "सबसे बड़ा खतरा कम समय में होने वाली बेहद तेज बारिश है.” उनका कहना है कि भारत का बुनियादी ढांचा इस खतरे को झेलने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं है. उनके मुताबिक, शहरों की जल निकास प्रणाली और बाढ़ से निपटने वाली व्यवस्था आज भी पुराने पैटर्न पर बनी है. जबकि अब असल मुसीबत कुछ ही घंटों में पूरे शहरों को डूबा देने वाली बारिश है.
उन्होंने कहा कि अब सटीक तरीके से मौसम का अंदाजा लगाया जा सकता है. लेकिन इसका फायदा तभी होगा, जब प्रशासन समय रहते उस चेतावनी पर कार्रवाई भी करे.
उनका कहना है कि "तुरंत, सटीक फैसले” लेना जरूरी है, जैसे भारी बारिश से पहले स्कूलों के समय में बदलाव करना, लोगों की आवाजाही पर रोक लगाना या खतरे वाले इलाकों को बंद कर देना. पर्यावरण कानून विशेषज्ञ और लीगल इनिशिएटिव फॉर फॉरेस्ट एंड एनवायरनमेंट के मैनेजिंग ट्रस्टी ऋत्विक दत्ता का कहना है कि समस्या सिर्फ बिगड़ते मौसम तक ही सीमित नहीं है.
उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "अब विज्ञान भी साफ कहता है कि जलवायु परिवर्तन से बारिश का पैटर्न अनियमित हो रहा है. मानसून के दौरान कुछ ही दिनों में बहुत ज्यादा बारिश होती है और उसके बाद लंबे समय तक सूखा पड़ जाता है.” उन्होंने आगे कहा कि समस्या इसलिए और बढ़ रही है क्योंकि भारत में निर्माण से जुड़े फैसले लेते समय जलवायु परिवर्तन को ध्यान में नहीं रखा जाता.
पुणे का उदाहरण देते हुए दत्ता समझाते हैं जैसे राज्य सरकार और द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट की एक स्टडी के मुताबिक साल 2030 तक पुणे में बारिश करीब 37 फीसदी बढ़ सकती है. इसके बावजूद शहर की विकास योजनाओं में इस अनुमान को ठीक से शामिल नहीं किया गया है. यहां तक कि नदी किनारे बन रहे रिवरफ्रंट में भी इस खतरे को पर्याप्त तवज्जो नहीं दिया गया है.
दत्ता ने कहा, "जलवायु परिवर्तन की वजह से बांध, तटबंध और सड़कें बड़े नुकसान का शिकार हो सकती हैं. फिर भी हम जलवायु परिवर्तन को सिर्फ कांफ्रेंस और वर्कशॉप तक ही सीमित किए हुए हैं.”
दत्ता मानते हैं, "हम पर्यावरण को अपने खिलाफ इस्तेमाल कर रहे हैं.” दत्ता का कहना है कि भारत में पर्यावरण परियोजनाओं को मंजूरी देते समय जलवायु परिवर्तन के असर को ध्यान में रखना जरूरी नहीं माना जाता है. जाहिर है कि यह एक बड़ी समस्या है और प्रशासन का रवैया दिखाती है.
पिछले मानसून हजारों मारे गए
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में जिन 334 दिनों पर नजर रखी गई, उनमें से 331 दिन यानी करीब 99 फीसदी दिनों में भारत के किसी ना किसी हिस्से में चरम मौसम की घटनाएं देखने को मिलीं.
इसमें 4,000 से भी ज्यादा लोगों की जान गई, जिसमें करीब 3,000 मौतें मानसून के दौरान हुईं. लगभग 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लगातार आठ महीनों तक चरम मौसमी घटनाएं दर्ज की गई.
इस संस्था की डायरेक्टर जनरल सुनीता नारायण का कहना है कि अब जलवायु परिवर्तन को देश की विकास रणनीति का अहम हिस्सा बनाना होगा.
उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की बात नहीं है. भीषण गर्मी, तेज बारिश और विनाशकारी मौसमी घटनाओं के रूप में यह अब हमारे सामने खड़ा है.” उन्होंने आगे कहा, "अब चुनौती जलवायु परिवर्तन को साबित करना नहीं है, बल्कि असली चुनौती अपनी अर्थव्यवस्था और बुनियादी ढांचे को इस तरह बदलना है कि हम इसके असर का सामना कर सकें.”
वह मानती हैं, "अब शहरों, सड़कों, ड्रेनेज सिस्टम को पुराने पैटर्न के हिसाब से नहीं बनाया जा सकता.” देश में होने वाला हर निवेश इस सोच के साथ किया जाना चाहिए कि आने वाले समय में मौसम और बिगड़ सकता है.
उनका मानना है कि भारत को हर बाढ़ को अलग आपदा मानने से बचना होगा. अब ऐसी योजना बनाने की जरूरत है, जो भविष्य की भीषण मौसमी घटनाओं के अनुसार हो.
गंभीर मौसमी घटनाओं से कैसे बचें
भारत मौसम के एक बिल्कुल नए पैटर्न का सामना कर रहा है. पूरे देश में बारिश कम हो सकती है, लेकिन कुछ इलाकों में बाढ़ के हालात बन सकते हैं. दूसरी तरफ कई हफ्तों से बारिश का इंतजार करने वाले किसानों की फसलें कुछ ही घंटों के अंदर तेज बारिश से बर्बाद हो सकती है. तेज बारिश शहरों की पूरी व्यवस्था को भी चरमरा सकती है.
जलवायु वैज्ञानिक और पूर्व सरकारी अधिकारी राजीवन ने कहा, "अब सिर्फ इन बदलावों को दर्ज करने और उन पर चर्चा करने से काम नहीं चलेगा. हमें ऐसी ठोस योजनाएं लागू करनी होंगी, जो बदलते मौसम के असर से निपट सकें.”
अब शहरों में बाढ़ से निपटने की बेहतर व्यवस्था, खेती के तरीकों में बदलाव, पानी को जमा करने की मजबूत प्रणाली और ऐसा बुनियादी ढांचा तैयार करना होगा, जो अचानक आने वाली बेहद तेज बारिश को थाम सके.
भारत मानसून या अल नीनो को नियंत्रित नहीं कर सकता और ना ही अकेले ग्लोबल वार्मिंग को रोक सकता है. लेकिन यह जरूर तय कर सकता है कि उसका हर निर्माण, हर प्रणाली और हर योजना भविष्य के मौसम को ध्यान में रखकर तैयार की जाए.
(The above story first appeared on LatestLY on Aug 12, 2026 08:30 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

