नयी दिल्ली, पांच मार्च बंदरों की प्रजाति ‘रीसस मकाक’ का कानूनी संरक्षण हटा दिए जाने के बाद उनके लुप्तप्राय होने का खतरा बढ़ने के मद्देनजर, 30 से अधिक वन्यजीव समूहों ने ‘पीपुल्स फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स’ (पेटा) इंडिया के नेतृत्व में इन्हें वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के दायरे में फिर से लाने का सरकार से आग्रह किया है।
केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव को बुधवार को सौंपे गए एक संयुक्त पत्र में कहा गया कि उक्त प्रजाति को अधिनियम से हटा दिये जाने के कारण उनका शिकार और उत्पीड़न किये जाने का खतरा बढ़ गया है तथा पारिस्थितिकी से जुड़ी समस्याएं भी उत्पन्न हो सकती हैं।
वन्यजीव समूहों ने ‘रीसस मकाक’ की लगातार कम हो रही संख्या का पत्र में हवाला दिया। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में 2015 से उक्त प्रजाति की संख्या में 25 प्रतिशत की कमी आई है जबकि हिमाचल प्रदेश और हरियाणा में भी इसी तरह की प्रवृत्ति देखने को मिली है।
पत्र में कहा गया, ‘‘रीसस मकाक बीजों का प्रसार करने और वनीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, लेकिन उनकी घटती संख्या के कारण पारिस्थितिकी असंतुलन पैदा हो सकता है।’’
उक्त पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले लोगों ने इस वन्य जीव के प्रति बढ़ती क्रूरता, उनकी तस्करी तथा अन्य प्रजातियों में शामिल बोनेट मकाक को पेश आ रहे खतरों का भी जिक्र किया। हालांकि, बोनेट मकाक संरक्षित प्रजाति है।
पत्र में कहा गया, ‘‘भारत को अपने स्वदेशी वन्यजीवों की सुरक्षा और संरक्षण सुनिश्चित करके अपनी पारिस्थितिकी और सांस्कृतिक मूल्यों को बनाए रखना चाहिए।’’
संगठनों ने मंत्रालय से आग्रह किया कि ‘रीसस मकाक’ को वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम में पुनः शामिल किया जाए, ताकि उन्हें उच्चतम स्तर का कानूनी संरक्षण प्रदान किया जा सके।
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