एक मेयर की मैटरनिटी लीव से क्यों नाराज हुआ जापान?
शोको क्वाटा महज 33 साल की उम्र में ही मेयर चुनी गई थीं.
शोको क्वाटा महज 33 साल की उम्र में ही मेयर चुनी गई थीं. शुरू से ही राजनीति में दिलचस्पी रखने वाली शोको का मैटरनिटी लीव पर जाना अंतरराष्ट्रीय खबर कैसे बन गई?क्या किसी महिला नेता का मैटरनिटी लीव पर जाना, एक ऐतिहासिक खबर हो सकती है? जापान में इन दिनों शोको क्वाटा का मैटरनिटी लीव पर जाना किसी ऐतिहासिक घटना से कम नहीं माना जा रहा है. जापान के यवाटा शहर की, 35 साल की शोको क्वाटा जापान की सबसे युवा मेयर हैं और फिलहाल 16 हफ्तों के मातृत्व अवकाश पर हैं. उनकी डिलीवरी सितंबर में होने वाली है. वह जापान की पहली मेयर और महिला नेता भी हैं जिन्होंने मैटरनिटी लीव ली है.
लेकिन मैटरनिटी लीव पर जाने के बाद उनके इस्तीफे की मांग होने लगी है. उनके पुरुष सहकर्मी और राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी ने उनकी आलोचना की, कि एक मेयर होकर वे इतनी लंबी छुट्टी पर कैसे जा सकती हैं. अखबारों के पहले पन्ने पर उनकी छुट्टी की खबरें छपीं, सोशल मीडिया पर उन्हें ट्रोल किया गया. उनके फैसले पर मीडिया ने ओपिनियन पोल कराए.
शोको ने मई में ऐलान किया था कि वह जल्द ही मैटरनिटी लीव पर जाने वाली हैं. उनके इस सार्वजनिक ऐलान को लगभग दो महीने बीत चुके हैं लेकिन जापान के समाज में अभी भी यह बहस जारी है कि शोको ने मैटरनिटी लीव लेकर कितनी बड़ी ‘गलती' की है. दरअसल, जापान में गर्भवती महिलाओं के पास 14 हफ्तों की मैटरनिटी लीव लेने का अधिकार तो है लेकिन ये अधिकार महिला नेताओं के पास नहीं है.
ना ही किसी कानून में यह साफ किया गया है कि अगर महिला नेता गर्भवती होती हैं तो क्या वे छुट्टी ले सकती हैं. वजह है, कानून बनाते वक्त लोगों के जेहन में यह बात नहीं आई होगी कि आने वाले समय में युवा महिलाएं इन राजनीतिक पदों को संभालेंगी. शोको इस सोच और कानून को ही बदलना चाहती हैं. मीडिया को दिए गए इंटरव्यू में शोको ने बताया कि कानून में महिला नेताओं को मैटरनिटी लीव का अधिकार नहीं दिया गया लेकिन कानून में यह भी कहीं नहीं लिखा कि एक मेयर मैटरनिटी लीव नहीं ले सकती. वह इसका फायदा उठाते हुए एक मिसाल पेश करना चाहती हैं.
महिला मेयर का मैटरनिटी लीव पर जाना टैक्सपेयर के पैसे की बर्बादी कैसे?
शोको जब छुट्टी पर गईं तो उन पर आरोप लगे कि एक मेयर जो कि जनता का सेवक है, उसका इतनी लंबी छुट्टी पर जाना ‘टैक्सपेयर' के पैसों की बर्बादी है. यह उस देश में हो रहा है जिसने पहली बार सनाए ताकाएची के रूप में अपनी पहली महिला प्रधानमंत्री को चुना है. हालांकि, ताकाएची या उनकी पार्टी की तरफ से इस मुद्दे पर अब तक कोई बयान नहीं आया है. यह उस देश में हो रहा है जहां राजनीति में महिलाओं की भागीदारी सिर्फ 15 से 16 फीसदी के बीच है. एक ऐसा देश जो लगातार कम होती प्रजनन दर की चुनौती से जूझ रहा है लेकिन गर्भवती महिलाओं के जरूरी अधिकारों को टैक्सपेयर के पैसों की बर्बादी समझता है.
शोको की आलोचना उसी रूढ़िवादी सोच को मजबूती देती है, जो कहती है कि अगर एक महिला को मां बनना है तो उसे अपने करियर को पीछे छोड़ना होगा. लेकिन शोको ऐसा करने को तैयार नहीं हैं. वह दूसरी महिलाओं के लिए एक उदाहरण बनना चाहती हैं ताकि वे भी जरूरत पड़ने पर अपने अधिकारों का बेझिझक इस्तेमाल कर सकें.
प्रिविलेज नहीं अधिकार है मैटरनिटी लीव
जापान दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां दूसरे विश्व युद्ध के बाद से ही मैटरनिटी लीव, पीरियड्स लीव जैसे कई महिला अधिकार सुनिश्चित किए गए. लेकिन इनका इस्तेमाल करने वाली महिलाओं की संख्या आज भी बेहद कम है क्योंकि इन छुट्टियों से शर्म और झिझक जुड़ी है. खासतौर पर जापान में जहां किसी भी कर्मचारी का आम तौर पर लंबी छुट्टी पर जाना उनके कम प्रोडक्टिव होने से जोड़कर देखा जाता है. हालांकि, गिरती प्रजनन दर को संभालने के लिए सरकार अब महिला और पुरुष दोनों ही कर्मचारियों के लिए पेरेंटल लीव को बढ़ावा दे रही है. इसके बावजूद जापान में भी वही ट्रेंड देखने को मिलते हैं जो आमतौर पर पेरेंटल लीव में होता है. पेरेंटल लीव लेने वाली महिलाओं की संख्या पुरुषों के मुकाबले दोगुनी होती है.
जापान के आंकड़ों को देखें तो 2022 में करीब 80 फीसदी महिला कर्मचारियों ने मैटरनिटी लीव ली थी. हालांकि, लैंगिक और आर्थिक मुद्दों पर काम करने वाले विशेषज्ञ इसे अलग तरीके से देखते हैं. आधिकारिक तौर पर मापी जाने वाली मैटरनिटी लीव को उन महिलाओं के प्रतिशत के रूप में परिभाषित किया जाता है जिन्होंने नौकरी में रहते हुए बच्चे को जन्म दिया और फिर पेरेंटल लीव शुरू की. इसका मतलब यह है कि यह आंकड़ा उन महिलाओं को पूरी तरह बाहर कर देता है जिन्होंने बच्चे के जन्म के समय काम छोड़ दिया था. इसके साथ ही महिलाओं के लिए जो छुट्टियां तय की गई हैं उन्हें लेने वालों में संगठित या सरकारी क्षेत्र में काम करने वाली महिलाएं अधिक होती हैं. ऐसे में असंगठित क्षेत्र की महिलाओं का आंकड़ा इसमें शामिल ही नहीं होता.
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की 2025 की रिपोर्ट बताती है कि 2023 में, कामकाजी उम्र की 70.8 करोड़ महिलाएं बिना वेतन वाले देखभाल के काम की जिम्मेदारियों के कारण श्रम बल से बाहर थीं, जबकि इसकी तुलना में पुरुषों की संख्या केवल 4 करोड़ थी. विश्व में 121 देश पैटरनिटी लीव के अधिकार को मान्यता देते हैं, लेकिन केवल 105 देश ही पेड पैटरनिटी लीव देते हैं, और पिछले दशक में सिर्फ 37 देशों ने पैटरनिटी लीव की शुरुआत की है या इसकी अवधि को बढ़ाया है. शोको की ट्रोलिंग और आलोचना के पीछे मैटरनिटी लीव को एक विशेषाधिकार समझे जाने वाली सोच काम कर रही है, जिसे बदलने के लिए वह लगातार संघर्ष कर रही हैं.
(The above story first appeared on LatestLY on Jul 01, 2026 06:40 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

