एजेंसी न्यूज

जर्मन और विदेशी कामगारों की कमाई में इतनी बड़ी खाई क्यों?

जर्मनी के श्रम मंत्रालय की नई रिपोर्ट के मुताबिक जर्मन और विदेशी कर्मचारियों की सैलरी में 23.

जर्मन और विदेशी कामगारों की कमाई में इतनी बड़ी खाई क्यों?
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

जर्मनी के श्रम मंत्रालय की नई रिपोर्ट के मुताबिक जर्मन और विदेशी कर्मचारियों की सैलरी में 23.6% का बड़ा अंतर है.जर्मनी में एक जैसे काम और एक जैसे काम के माहौल के बावजूद स्थानीय कर्मचारियों और विदेशी कर्मचारियों की सैलरी में बड़ा अंतर पाया गया है. जर्मन श्रम मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2025 के अंत में यह अंतर 23.6 फीसदी था, जो काफी ज्यादा है. हालांकि साल 2020 से ही सैलरी में अंतर का यह आंकड़ा कमोबेश स्थिर बना हुआ है.

जबकि जर्मनी के श्रमबल में विदेशी कर्मचारियों की हिस्सेदारी काफी ज्यादा है. साल 2025 के अंत तक यहां के कुल कर्मचारियों में से करीब 17 फीसदी विदेशी नागरिक थे. यह आंकड़ा पिछले वर्षों में तेजी से बढ़ा है. साल 2010 में विदेशी कर्मचारियों का अनुपात 2025 के मुकाबले आधा था.

वेतन की खाई और वास्तविक आंकड़े

जर्मनी के श्रम मंत्रालय के अनुसार, वहां एक फुल-टाइम काम करने वाले जर्मन नागरिक की औसत मासिक कमाई €4,396 (लगभग ₹4,91,500) है, जबकि विदेशी कर्मचारियों के लिए यह आंकड़ा केवल €3,358 (लगभग ₹3,75,500) पर अटका हुआ है. इसका मतलब है कि औसतन विदेशी कर्मचारी हर महीने अपने जर्मन सहकर्मियों से €1,038 (लगभग ₹1,16,000) कम कमाते हैं. जर्मन श्रम मंत्रालय ने यह जानकारी देश की संसद में धुर-दक्षिणपंथी पार्टी एएफडी के एक सवाल का जवाब देते हुए सामने रखी.

रिपोर्ट यह भी बताती है कि 2025 में 30.6 फीसदी विदेशी कर्मचारी बेहद कम वेतन वाली नौकरियां करने को मजबूर थे, जबकि इस श्रेणी की नौकरियां करने वाले जर्मन नागरिकों का आंकड़ा महज 12.3 फीसदी था.

सैलरी में अंतर के पीछे की मुख्य वजहें

जर्मनी की धुर-दक्षिणपंथी पार्टी ऑल्टरनेटिव फॉर डॉयचलैंड यानी एएफडी के प्रवक्ता रेने स्प्रिंगर ने इस अंतर को कमजोर इमिग्रेशन नीतियों का नतीजा बताया और आरोप लगाया कि इससे वेतन पर दबाव पड़ रहा है. लेकिन जर्मनी की संघीय रोजगार एजेंसी का मानना है कि इस वेतन विषमता का मुख्य कारण राजनीतिक न होकर कर्मचारियों की योग्यता, भाषा का ज्ञान और अनुभव है. इंस्टीट्यूट फॉर एम्प्लॉयमेंट रिसर्च यानी आईएबी की एक अन्य स्टडी के मुताबिक इस अंतर की अहम वजह आप्रवासियों का ऊंची सैलरी वाले सेक्टर या पदों पर जाने की पात्रता का ना होना है.

आंकड़े दिखाते हैं कि जर्मनी में बिना वोकेशनल ट्रेनिंग वालों की औसतन आय €3,133 (लगभग ₹3,50,000) है. वहीं वोकेशनल डिग्री धारकों की €4,069 (लगभग ₹4,55,000) है. जर्मनी में वोकेशनल डिग्री यानी आउसबिल्डुंग 1 से 3 साल का थ्योरी और प्रैक्टिकल ट्रेनिंग प्रोग्राम है, जहां पढ़ाई के साथ-साथ कंपनी में काम करके सैलरी भी मिलती है. यूनिवर्सिटी स्नातकों की कमाई €6,146 (लगभग ₹6,87,000) प्रति माह तक पहुंच जाती है.

यह समझना भी जरूरी है कि जर्मन श्रम मंत्रालय के ये आंकड़े केवल स्थानीय और विदेशी कर्मचारियों के बीच का सीधा अंतर दिखाते हैं. रिपोर्ट खुद यह स्पष्ट करती है कि ये आंकड़े इस बात को साबित या खारिज नहीं करते कि इमिग्रेशन का सैलरी पर कोई नकारात्मक प्रभाव पड़ा है या नहीं, क्योंकि इसमें यह नहीं बताया गया है कि अगर आप्रवासन नहीं होता तब सैलरी का ट्रेंड क्या रहता.

जेंडर पे गैप और दोहरी मार

जर्मनी में विदेशी महिलाएं वेतन विषमता की दोहरी मार झेलती हैं. डीस्टैटिस (जर्मन संघीय सांख्यिकी कार्यालय) के डेटा के अनुसार, जर्मनी में जेंडर पे गैप लगभग 16 फीसदी है. यानी यहां महिलाओं को पुरुषों की तुलना में प्रति घंटा करीब 16 फीसदी कम वेतन मिलता है. जब इस लैंगिक अंतर को विदेशी कर्मचारियों के 23.6 फीसदी वाले पे गैप के साथ मिलाकर देखा जाता है, तो स्थिति और भी चिंताजनक हो जाती है.

इसके अलावा गैर-यूरोपीय देशों से आने वाली प्रवासी महिलाओं को न केवल विदेशी होने के कारण नौकरशाही, भाषा और डिग्री मान्यता की बाधाएं झेलनी पड़ती हैं, बल्कि वे अक्सर केयर सेक्टर, सर्विस इंडस्ट्री या पार्ट-टाइम नौकरियों जैसे कम भुगतान वाले क्षेत्रों में सिमट कर रह जाती हैं.

(The above story first appeared on LatestLY on Aug 23, 2026 02:50 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).