दो साल में ही मिट्टी हो गया सफेद सोना, डूबने लगीं कंपनियां
कभी निकल को सफेद सोना कहा जा रहा था.
कभी निकल को सफेद सोना कहा जा रहा था. अब इसके भाव इतने गिर गए हैं कि कंपनियां बंद हो रही हैं. दो साल में ही बाजार फर्श से अर्श पर कैसे आ गया?मंगलवार को दुनिया की सबसे बड़ी माइनिंग कंपनी बीएचपी के शेयर धड़ाम से गिरे. इसकी वजह कंपनी के छमाही मुनाफे में 86 फीसदी की गिरावट रही.
लेकिन मुनाफे में कमी की जो वजहें कंपनी ने बताई हैं, उनमें 2015 में ब्राजील में हुए एक हादसे के भुगतान के अलावा निकल की कीमतों में आई भारी गिरावट भी है, जिसकी वजह से कंपनी को अपनी एक शाखा ही अस्थायी तौर पर बंद करनी पड़ रही है.
ब्रिटिश-ऑस्ट्रेलियन कंपनी बीएचपी ने मंगलवार को जारी अपनी छमाही रिपोर्ट में कहा कि 2022 के आखिरी छह महीनों के मुकाबले 31 दिसंबर तक के 2023 के छह महीनों में उसकी बिक्री छह फीसदी तक बढ़ी. लेकिन कुल मुनाफा गिरकर 92.7 करोड़ पर आ गया.
मुनाफे में गिरावट की बड़ी वजह है निकल की कीमतों में आई भारी गिरावट. बीएचपी के चीफ एक्जेक्यूटिव माइक हेनरी ने कहा, "वैश्विक स्तर पर कमोडिटी कीमतों में बहुत उतार-चढ़ाव चल रहा है जबकि मांग उम्मीद से कम रही है. हालांकि चीन में घरों के बाजार में गिरावट के बावजूद मांग बनी हुई है. भारत भी एक चमकदार बाजार बना हुआ है.”
पिछले हफ्ते ही बीएचपी ने ऐलान किया था कि वह वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया प्रांत में चलने वाले अपने निकल के कारोबार को अस्थायी तौर पर बंद कर रहा है क्योंकि इंडोनेशिया से निर्यात बढ़ने के कारण बाजार में भारी गिरावट है.
सोने से मिट्टी हुआ
कुछ समय पहले तक ही निकल को आधुनिक सोना कहा जा रहा था क्योंकि यह स्टेनलेस स्टील बनाने में तो इस्तेमाल होता ही है, बैट्रियां बनाने में इसकी जरूरत पड़ती है.
चूंकि इलेक्ट्रिक गाड़ियों की मांग बढ़ रही है इसलिए निकल के भावों में तेजी की उम्मीद की जा रही थी. लेकिन पिछले एक साल में ही निकल की कीमतें 40 फीसदी तक गिर चुकी हैं. 2022 में निकल की कीमत 50 हजार डॉलर प्रति टन पहुंच गई थी जो अब 16 हजार डॉलर के आसपास है.
इसकी वजह है कि निकल की रिफाइनिंग तकनीक में काफी सुधार हुआ है और इससे कम गुणवत्ता वाले निकल को भी रिफाइन करके इस्तेमाल किया जा सकता है.
इंडोनेशिया में कम गुणवत्ता वाला निकल कहीं ज्यादा मात्रा में उपलब्ध है और चीनी कंपनियां वहां भारी मात्रा में खनन कर रही हैं. पिछले एक साल में वैश्विक निकल बाजार में इंडोनेशिया की हिस्सेदारी दस गुना बढ़ चुकी है.
इस वजह से ऑस्ट्रेलिया के निकल बाजार में हाहाकार मचा हुआ है. केंद्र सरकार ने उद्योग को मुसीबत से बचाने के लिए अरबों डॉलर के राहत पैकेज भी जारी किए हैं. लेकिन उद्योग अब भी जूझ रहा है और हजारों नौकरियां मुश्किल में पड़ी हुई हैं.
इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया के पास दुनिया के सबसे बड़े निकल भंडार हैं. दोनों के पास लगभग 2.1 करोड़ टन निकल भंडार हैं. चीन निकल का सबसे बड़ा ग्राहक है. वह दुनियाभर में रिफाइन होने वाले निकल का कुल 35 फीसदी खरीदता है. इसके अलावा इंडोनेशिया से भी वह 15 फीसदी निकल अपने यहां लाता है.
चीन का चक्रव्यूह
चीन इन दुर्लभ धातुओं के लिए सबसे अहम बाजार है. वह दुनिया का 70 फीसदी लिथियम और 70 फीसदी जर्मेनियम भी खरीदता है. निकल की कीमतों को कम रखने के लिए उसने इंडोनेशिया में भारी निवेश किया है, जिसका सबसे बड़ा नुकसान ऑस्ट्रेलिया को हुआ है.
ऑस्ट्रेलिया अब कोशिश कर रहा है कि वह भारत, जापान, कोरिया, ब्रिटेन और अमेरिका में साझेदारियां खोजे. लेकिन यह भी आसान नहीं है.
मोनाश यूनिवर्सिटी के सिविल इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट में एसोसिएट प्रोफेसर मोहन येल्लीशेट्टी कहते हैं कि ऐसा करने पर चीन की रणनीतिक प्रतिक्रिया का खतरा रहता है.
कनवर्सेशन पत्रिका में एक लेख में वह लिखते हैं, "चीन की तरफ से रणनीतिक प्रतिक्रिया का खतरा रहता है. वह व्यापारिक बैन लगा सकता है. पहले भी वह जर्मेनियम, गैलियम और दुर्लभ धातुओं पर बैन लगा चुका है. साथ ही वह सप्लाई भी बढ़ा देता है.”
ऑस्ट्रेलिया लिथियम बैट्री में इस्तेमाल होने वाली दस की दस धातुओं का उत्पादक है लेकिन फिलहाल वह चीन के बुने चक्रव्यूह में फंस गया है और उसे निकलने का रास्ता नजर नहीं आ रहा है. बीएचपी के साथ जो हुआ, वह उसका एक संकेत मात्र है.
(The above story first appeared on LatestLY on Feb 20, 2024 11:40 AM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

