नयी दिल्ली, 26 मार्च भारत में स्वीडन के राजदूत क्लास मोलिन ने कहा कि दुनिया भर में लैंगिक समानता का प्रतीक स्वीडन अभी भी ‘पितृसत्ता, मानदंडों और मूल्यों (वैल्यू)’ से जूझ रहा है। उन्होंने कहा कि इस मामले में ‘‘हमारी सोच के विपरित विभिन्न देश लगभग एक जैसे हैं।’’
भारत में यूरोपीय संघ के राजदूत यूगो एस्तुतो ने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि दुनिया अभी तक वास्तविक समानता तक नहीं पहुंची है। उन्होंने स्वीडन को, पिछले कुछ वर्षों में इस क्षेत्र में यूरोप द्वारा की गई प्रगति का एक ‘‘उत्कृष्ट उदाहरण’’ बताया।
स्वीडन ने 10 मार्च को एस्टोनिया से यूरोपीय संघ के ‘जेंडर चैंपियन’ का चक्रीय आधार पर छह महीने के लिए नेतृत्व संभाला। यह एक वैश्विक पहल है जिसका उद्देश्य महिलाओं और बालिकाओं को सशक्त करने तथा उन्हें पूर्ण मानवाधिकार प्रदान करने को बढ़ावा देना है।
इस पहल के तहत किसी देश को छह महीने की अवधि के लिए इस दिशा में जोर शोर से काम करना होता है।
स्वीडन ने 1974 में मातृत्व अवकाश का नाम बदलकर इसे अभिभावक अवकाश कर दिया। लगभग एक दशक पहले स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में एक हाई स्कूल ने महिलाओं, पुरुषों और अन्य के लिए तीन शौचालयों का चलन शुरू किया था।
यह पूछे जाने पर कि क्या लैंगिक असमानता के मामले में भारत और स्वीडन के बीच कोई समानता है, मोलिन ने कहा, ‘‘सिर्फ भारत और स्वीडन ही नहीं... जितना हम सोचते हैं उससे कहीं अधिक और भी देश पारंपरिक और कुछ मायने में एक जैसे हैं।’’
मोलिन ने पीटीआई- से एक साक्षात्कार में कहा, ‘‘हम निश्चित रूप से इससे जूझ रहे हैं और अभी भी पारंपरिक मानदंडों से जूझ रहे हैं जो हमारे हित में नहीं हैं। मूल रूप से, नैतिकता की बातें करना आसान है, लेकिन हम अभी भी पितृसत्ता, मानदंडों और मूल्यों के साथ संघर्ष कर रहे हैं।’’
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