देहू (महाराष्ट्र), 14 जून प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को कहा कि हिंदुत्व विचारक वीर सावरकर ने देश के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जेल में रहते हुए संत तुकाराम के अभंग (भगवान विठ्ठल की स्तुति में भक्तिमय छंद) गाए थे।
मोदी ने कहा, ‘‘जेल में रहते हुए वीर सावरकर ने अपनी हथकड़ियों का इस्तेमाल संत तुकाराम की चिपली (संगीत वाद्ययंत्र) की तरह किया और उनके अभंग गाए।’’
वह पुणे के समीप देहू में 17वीं सदी के संत को समर्पित संत तुकाराम महाराज मंदिर में एक शिला मंदिर का उद्घाटन करने के बाद वारकरियों (पंढरपुर में भगवान विठ्ठल मंदिर की तीर्थयात्रा करने वाले श्रद्धालुओं) की सभा को संबोधित कर रहे थे।
मोदी ने मंदिर के दौरे के दौरान ‘वारकरियों’’ से बातचीत भी की। यह दौरा देहू में 20 जून से शुरू हो रहे वार्षिक ‘वारी’ तीर्थयात्रा से पहले हुआ। इस मौके पर प्रधानमंत्री को विशेष तुकाराम पगड़ी भी भेंट की गयी।
भक्ति आंदोलन के प्रतिष्ठित संत तुकाराम की प्रशंसा करते हुए मोदी ने कहा कि उन्होंने छत्रपति शिवाजी महाराज जैसे ‘राष्ट्र नायक’ के जीवन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।
खास प्रकार के राजस्थानी पत्थर से बना शिला मंदिर पत्थर की एक पटिया को समर्पित एक मंदिर है, जिस पर संत तुकाराम ने 13 दिनों तक ध्यान लगाया था। वारकरी पंढरपुर की तीर्थयात्रा शुरू करने से पहले शिला मंदिर में प्रार्थना करते हैं।
‘शिला मंदिर’ के समीप मंदिर में संत तुकाराम की एक नयी प्रतिमा भी स्थापित की गयी है।
संत तुकाराम ‘अभंग’ कहलाने वाली भक्तिमय कविताओं और आध्यात्मिक गीतों के लिए प्रसिद्ध थे। महाराष्ट्र में वारकरी समुदाय के लिए उनकी रचनाएं बहुत अहम हैं। इंद्रायणी नदी के किनारे स्थित देहू, संत तुकाराम का जन्म स्थान है।
मोदी ने कहा कि संत ज्ञानेश्वर महाराज और संत तुकाराम महाराज पालकी मार्ग का निर्माण पांच चरणों में पूरा किया जाएगा और 350 किलोमीटर (अलंदी-देहू-पंढरपुर) लंबे राजमार्ग के निर्माण पर 11,000 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे।
मोदी ने कहा कि संत तुकाराम ने वेदों को वापस लाने के लिए शिला (चट्टान) पर बैठकर 13 दिनों तक ध्यान किया था। उन्होंने कहा, ‘‘यह सिर्फ एक शिला नहीं है, बल्कि भक्ति और ज्ञान (प्राप्ति) की आधारशिला है।’’
उन्होंने कहा कि हमें गर्व है कि भारत दुनिया की सबसे पुरानी जीवित सभ्यताओं में से एक है और इसका श्रेय संतों और ऋषियों को जाता है।
उन्होंने कहा, ‘‘भारत संतों की भूमि है और हर काल में कुछ महान आत्माएं समाज को दिशा देने के लिए आईं हैं। आज जब देश हमारे सांस्कृतिक मूल्यों के आधार पर आगे बढ़ रहा है, तो 'अभंग' हमें रास्ता दिखा रहे हैं और हमें प्रेरणा दे रहे हैं।’’ प्रधानमंत्री ने कहा कि संत तुकाराम कहा करते थे कि इंसानों के बीच भेदभाव एक बड़ा पाप है।
उन्होंने कहा, ‘‘यह संदेश न केवल भागवत भक्ति के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि राष्ट्र भक्ति और समाज भक्ति (समाज की सेवा) के लिए भी महत्वपूर्ण है। इन संदेशों के साथ हमारे 'वारकरी' भाई-बहन हर साल पंढरपुर की यात्रा पर निकलते हैं।’’ उन्होंने कहा कि इस संदेश के साथ देश 'सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास' की अवधारणा के साथ आगे बढ़ रहा है।
मोदी ने कहा कि 'वारकरियों' की तर्ज पर देश भी महिला सशक्तिकरण के साथ आगे बढ़ रहा है। उन्होंने कहा, ‘‘वारी समान अवसरों का प्रतीक रहा है, क्योंकि महिला वारकरी भी अपने पुरुष समकक्षों के साथ समान जोश और उत्साह के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलती हैं। इसी तरह, सरकार भी बिना किसी भेदभाव के सभी को कल्याणकारी योजनाओं का लाभ प्रदान कर रही है।’’ उन्होंने कहा कि दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों और गरीबों का कल्याण देश की प्राथमिकता है।
मोदी ने कहा कि एक सच्चे संत की पहचान यह है कि वह अंतिम व्यक्ति के कल्याण के लिए प्रयास करता है और यही हमारी 'अंत्योदय' योजना का संकल्प है। मोदी ने कहा कि देश में विभिन्न यात्राएं सामाजिक और आध्यात्मिक प्रगति के लिए शक्ति की स्रोत हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘इन यात्राओं से हम 'एक भारत श्रेष्ठ भारत' की अवधारणा को बरकरार रखते हैं। ये यात्राएं हमारे देश की विविधता को जोड़ती हैं। देश की एकता को मजबूत करने के लिए हमें अपनी प्राचीन पहचान को जीवित रखना चाहिए।’’
प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि प्रौद्योगिकी और बुनियादी ढांचा भारत की प्रगति का पर्याय बन रहा है, ‘‘हम यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि विरासत और विकास साथ-साथ चलें।’’
उन्होंने शास्त्रों का उल्लेख करते हुए कहा कि संतों का सत्संग मानव जीवन का दुर्लभतम विशेषाधिकार है।
उन्होंने कहा, ‘‘यदि संतों की कृपा का अनुभव होता है, तो भगवान की प्राप्ति स्वतः हो जाती है। आज देहू की इस पवित्र तीर्थ भूमि पर आकर मुझे ऐसा ही महसूस हो रहा है।’’ उन्होंने यह भी कहा कि जीवन के हर क्षेत्र में स्वच्छता बनाए रखने का संकल्प लेना चाहिए।
प्रधानमंत्री ने प्राकृतिक खेती पर जोर देने और योग एवं योग दिवस को लोकप्रिय बनाने का आह्वान करते हुए कहा, ‘‘ये राष्ट्रीय प्रतिज्ञाएं आध्यात्मिक प्रतिज्ञाओं का हिस्सा होनी चाहिए।’’
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