देश की खबरें | बच्चों के खिलाफ अपराध के मामले में सच्चा न्याय उन्हें समर्थन, सुरक्षा देकर ही मिलता है: शीर्ष अदालत
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नयी दिल्ली, 20 अगस्त उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि बच्चों के खिलाफ अपराध के मामलों में सच्चा न्याय केवल अपराधी को पकड़ने या दी गई सजा की गंभीरता से नहीं, बल्कि पीड़ित को समर्थन और सुरक्षा प्रदान करने से मिलता है।
न्यायमूर्ति एस रवींद्र भट्ट और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार की पीठ ने ‘यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण’ (पॉक्सो) कानून के तहत समर्थन करने वाले लोगों (सपोर्ट पर्सन) की नियुक्ति से संबंधित दिशानिर्देश जारी करते हुए यह टिप्पणी की।
‘सपोर्ट पर्सन’ से आशय बाल कल्याण समिति द्वारा नियुक्त उस व्यक्ति से है जो जांच और मुकदमे की प्रक्रिया के माध्यम से बच्चे को सहायता प्रदान करता है।
पीठ ने कहा, ‘‘बच्चों के खिलाफ अपराधों में न केवल भय या आघात होता है, बल्कि समर्थन नहीं होने और साथ नहीं देने से यह समस्या और गहराती जाती है।’’
इसने कहा, ‘‘इस तरह के अपराधों में सच्चा न्याय केवल अपराधी को पकड़ने या दी गई सजा की गंभीरता से नहीं, बल्कि पीड़ित को समर्थन और सुरक्षा प्रदान करने से मिलता है, जैसा कि राज्य और उसके सभी प्राधिकारियों द्वारा जांच तथा मुकदमे की पूरी प्रक्रिया के दौरान यथासंभव पीड़ारहित, कम कठिन अनुभव का आश्वासन दिया जाए।’’
शीर्ष अदालत ने कहा कि इस अवधि में सरकारी संस्थानों और कार्यालयों द्वारा प्रदान की जाने वाली देखभाल और समर्थन महत्वपूर्ण है।
इसने कहा कि न्याय तभी कहा जा सकता है जब पीड़ितों को समाज में वापस लाया जाए, उन्हें सुरक्षित महसूस कराया जाए और उनकी गरिमा और सम्मान बहाल किया जाए।
पीठ ने कहा, ‘‘इसके बिना, न्याय खोखला मुहावरा है, एक भ्रम है। पॉक्सो नियम 2020 में इस संबंध में एक प्रभावशाली रूपरेखा है। यह अब राज्य, जो इसमें सबसे बड़ा पक्षकार है, पर निर्भर है कि सच्ची भावना से इसका कड़ाई से क्रियान्वयन सुनिश्चित करे।’’
उच्चतम न्यायालय गैर सरकारी संगठन ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ की याचिका पर सुनवाई कर रहा था। याचिका में उत्तर प्रदेश में पॉक्सो के एक मामले में एक पीड़ित के सामने आईं कठिनाइयों का उल्लेख किया गया है।
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