देश की खबरें | कचरे की समस्या से निपटने के लिए लोगों को जागरूक किया जाए, जुर्माना लगाया जाए : अतिन बिस्वास

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. शहरों के साथ ही पहाड़ी क्षेत्रों में भी कचरा प्रबंधन एक चुनौती बनता जा रहा है जिससे स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा हो रहा है। पेश हैं इस संबंध में विज्ञान और पर्यावरण केंद्र में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन इकाई के निदेशक अतिन बिस्वास से भाषा के पांच सवाल और उनके जवाब...

नयी दिल्ली, पांच जून शहरों के साथ ही पहाड़ी क्षेत्रों में भी कचरा प्रबंधन एक चुनौती बनता जा रहा है जिससे स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा हो रहा है। पेश हैं इस संबंध में विज्ञान और पर्यावरण केंद्र में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन इकाई के निदेशक अतिन बिस्वास से के पांच सवाल और उनके जवाब...

सवाल: पर्वतीय क्षेत्रों में बढ़ रहे पर्यटन के साथ जगह-जगह कूड़े के ढेर भी बढ़ रहे हैं। यह पर्वतीय पर्यावरण के लिए कितनी बड़ी चुनौती है और इससे निपटने के लिए सरकारों को क्या करना चाहिए।

जवाब: कूड़ा फेंकने की जगह औपचारिक या अनौपचारिक हो सकती है। यह तथ्य है कि पूर्वोत्तर और उत्तर भारत के पहाड़ी इलाकों में कूड़ा फेंकने (डंपसाइट) की अनौपचारिक संख्या अधिक है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के 2019 के आंकड़ों के अनुसार पहाड़ी राज्यों में औपचारिक तौर पर कूड़ा फेंकने की 232 जगह हैं। इसमें उत्तराखंड में 42, हिमाचल प्रदेश में 27, जम्मू और कश्मीर में नौ, त्रिपुरा में 17, मणिपुर में 21, अरुणाचल प्रदेश में 31, असम में 76, सिक्किम में दो, मिजोरम में एक और मेघालय में छह स्थान हैं...अपशिष्ट प्रबंधन के संबंध में स्थानीय प्रशासन के पास समावेशी दृष्टिकोण का अभाव है जो ग्रामीण या शहरी स्थानीय निकायों द्वारा एक स्थायी अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली स्थापित करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

उत्तराखंड सरकार के पर्यटन विभाग के आंकड़ों के अनुसार चार धाम यात्रा के लिए आने वाले यात्री अपनी यात्रा के दौरान काफी कूड़ा फैलाते हैं। इसलिए स्थानीय प्रशासन को मुख्य स्थानों पर जागरूकता फैलाने के साथ ही कूड़ा फेंकने वालों पर भारी जुर्माना लगाना चाहिए। इस पहल में उचित प्रबंधन और वैज्ञानिक निपटान के लिए हॉटस्पॉट से संचित कचरे का संग्रह भी शामिल होना चाहिए।

सवाल: आपके अनुसार वर्तमान समय में कचरा निस्तारण की आधुनिक तकनीकी की उपलब्धता होने के बावजूद ऐसी क्या कमी है कि कचरे का प्रबंधन ठीक तरह से नहीं हो पा रहा है।

जवाब: स्थानीय प्रशासन का कचरा प्रबंधन को लेकर मूल दृष्टिकोण ‘सेवा’ उन्मुख है, जो अकसर इसके ‘प्रबंधन’ के उद्देश्य को घटा देता है। ‘प्रबंधन’ शब्द का अर्थ है विभिन्न अपशिष्ट अंशों का प्रसंस्करण, उपचार, पुनर्प्राप्ति और पुनर्चक्रण। स्रोत स्थल पर जो कचरा इकट्ठा किया जाता है, वह पर्याप्त पृथक्करण के अभाव में, एक ‘मिश्रित’ कचरा होता है, जो न केवल प्रबंधन को मुश्किल बनाता है, बल्कि इसका अधिकांश हिस्सा लैंडफिल स्थल/ कचरा स्थल पर समाप्त हो जाता है। आमतौर पर इस तरह के अंश धूल, नाली की गाद आदि होते हैं। इसलिए अपशिष्ट प्रबंधन ऐसी कोई चुनौती नहीं है, जिसे प्रौद्योगिकी के होने या न होने से जोड़ा जा सकता है।

स्वच्छ भारत मिशन 2.0 स्थानीय निकायों को यह सुनिश्चित करने का आदेश देता है कि वे 2026 के अंत तक कूड़े के लैंडफिल पर पहुंचने से पहले उसे 80 प्रतिशत तक प्रसंस्करित करें। इस कार्यक्रम के तहत पांच वर्षों (2021-2026) के लिए 1.4 लाख करोड़ के वित्तीय हस्तांतरण की भी प्रतिबद्धता जताई गई है।

सवाल: शहरों में और पहाड़ी राज्यों में कूड़े के प्रबंधन में किस तरह की समस्याएं हैं?

जवाब: पूर्वोत्तर, उत्तर भारत, लेह और लद्दाख समेत 11 पहाड़ी राज्यों में 493 शहरी स्थानीय निकाय हैं। इनमें से तकरीबन 80 प्रतिशत नगर पंचायत हैं जो अर्ध शहरी स्थानीय निकायों के तौर पर काम करती हैं। कई कारणों से इन संस्थाओं के पास व्यवस्थित अपशिष्ट प्रबंधन की व्यवस्था नहीं है। साथ ही, केंद्रीकृत अपशिष्ट प्रसंस्करण और उपचार सुविधाओं के लिए स्थलाकृतिक कारणों से घर-घर जाकर कूड़ा जमा करना चुनौतीपूर्ण है। पहाड़ी क्षेत्रों के शहरों के लिए सबसे अच्छा तरीका ‘विकेंद्रीकृत प्रणालियों’ को अपनाना और लागू करना है, ताकि उत्पन्न जैव-निम्नीकरणीय कचरे को सूक्ष्म खाद सुविधाओं में उपचारित किया जा सके और गैर जैव-निम्नीकरणीय कचरे को द्वितीय पृथक्करण के लिए सप्ताह में दो बार इकट्ठा किया जा सके। राज्य या जिला प्रशासन कचरे की मात्रा को देखते हुए ब्लॉक स्तर पर एक केंद्र बना सकते हैं, ताकि बड़ी मात्रा में प्रसंस्करण के लिए भेजे जाने से पहले इसमें बड़ी तादाद में कूड़ा जमा हो सके।

सवाल : पहाड़ों के अलावा छोटे शहरों में प्रतिदिन बढ़ती जनसंख्या के साथ कचरे की मात्रा भी बढ़ रही है। इसे नियंत्रित करने के लिए स्थानीय व प्रशासनिक स्तर पर क्या-क्या कार्य किए जा रहे हैं?

जवाब: शहरी भारत में हर रोज 1,40,000 मीट्रिक टन कचरा पैदा हो रहा है और इसकी रफ्तार तेजी से बढ़ रही है। विश्व बैंक के अध्ययन के मुताबिक वर्तमान समय में प्रति व्यक्ति हिसाब से हर दिन 450 ग्राम कूड़ा पैदा होता है, जिसके अगले 15-20 साल में बढ़कर हर दिन 800 ग्राम प्रति व्यक्ति होने का अनुमान है। दस हजार हेक्टेयर से ज्यादा जमीन कचरे के पहाड़ के नीचे दब गई है, जिसे अब पुन: हासिल करने की कोशिश की जा रही है। तकरीबन 1300 मिलियन टन पुराना कचरा देश के 3,159 कूड़ाघरों में पड़ा हुआ है जिससे अगले पांच साल में देश को एक लाख करोड़ रुपये का नुकसान हो सकता है। यह भारत में बीते कुछ दशकों में कचरे के कुप्रबंधन का नतीजा है। इस स्थिति में बदलाव कठिन नहीं है, इसके लिए सिर्फ नीतिगत स्तर पर सुधार और स्थानीय प्रशासन के रवैये में बदलाव की जरूरत है।

अनौपचारिक कचरा बीनने वालों और निजी कंपनियों के लिए समान अवसर मुहैया कराने के साथ कचरा प्रबंधन को ‘सेवा’ से ‘व्यापार मॉडल’ में बदलने के लिए टिकाऊ अभ्यास पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है। विशेष रूप से छोटी आबादी वाले शहरों के लिए हमें जल्द से जल्द विकेंद्रीकृत प्रणाली को बढ़ावा देने के लिए व्यापक नीति की भी आवश्यकता है।

सवाल: दिल्ली और उससे जुड़े नगरीय संकुल में कचरा निपटान की समस्या के मुख्य कारण एवं कचरा प्रबंधन के उपाय क्या हो सकते हैं।

जवाब: दिल्ली और इससे जुड़े नगरीय संकुलों में कचरा निपटान से जुड़ी समस्यायों में बिना किसी उपचार के कचरे को यहां-वहां अंधाधुंध फेंकना शामिल है। दिल्ली में उत्पन्न होने वाले कुल कचरे का लगभग 50 से 60 प्रतिशत (11,400 टन प्रति दिन) निपटान तीन प्रमुख कचरा स्थलों- गाजीपुर, ओखला और भलस्वा में किया जाता है, जो अपरिवर्तनीय स्वास्थ्य और पर्यावरणीय चुनौतियों का कारण बन रहा है। नतीजतन, दिल्ली में उत्पन्न कचरे का एक महत्वपूर्ण अंश अनुपयोगी हो जाता है और कचरा स्थलों पर समाप्त हो जाता है। ऊर्जा एवं संसाधन संस्थान (टेरी) द्वारा 2018 में किए गए अध्ययन के मुताबिक, नगरपालिका के ठोस कचरे के अपघटन को मीथेन का तीसरा प्रमुख मानवजनित स्रोत माना जाता है, और यह कुल मानवजनित मीथेन उत्सर्जन में लगभग 11 प्रतिशत योगदान देता है। दिल्ली में कचरे की समस्या को प्रभावी ढंग से प्रबंधित करने और ग्रीनहाउस उत्सर्जन को कम करने के उपायों में स्रोत पृथक्करण एक महत्वपूर्ण कारक है जिसे सभी हितधारकों और सुशासन की भागीदारी से प्राप्त किया जा सकता है।

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