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उस तस्वीर की कहानी जो प्रवासी मजदूरों के दर्द की बानगी बन गई

वह निजामुद्दीन पुल पर बैठकर फोन पर बात कर रहे थे और लगातार रोए जा रहे थे। उन्हें देखकर मैं आगे नहीं बढ़ पाया।

उस तस्वीर की कहानी जो प्रवासी मजदूरों के दर्द की बानगी बन गई
जमात

नयी दिल्ली, 16 मई माथे पर तनाव की लकीरें, आंखों में मायूसी के आंसू और कान पर सटे फोन पर दूसरी तरफ से किसी अनहोनी की आशंका । प्रवासी मजदूरों की पीड़ा दिखाती सबसे मजबूत तस्वीरों में से एक रही इस तस्वीर को सोशल मीडिया और समाचार जगत ने हाथों हाथ लिया जिससे उस व्यक्ति को बिहार में अपने घर पहुंचने में मदद मिली । पीटीआई फोटोग्राफर अतुल यादव बताते हैं कि कैसे उन्होंने दिल्ली की एक सड़क पर रामपुकार पंडित को देखा और कैसे उनकी पीड़ा को अपने कैमरे में कैद किया ।

वह निजामुद्दीन पुल पर बैठकर फोन पर बात कर रहे थे और लगातार रोए जा रहे थे। उन्हें देखकर मैं आगे नहीं बढ़ पाया।

 पिछले कुछ हफ्तों में मैंने कई बेबस प्रवासियों को देखा और उनकी तस्वीरें ली हैं। मुझे उम्मीद नहीं थी कि एक वयस्क आदमी को रोता देखकर मुझे इतना दुख और हैरानी होगी। लेकिन उन्हें देखकर मैं स्तब्ध रह गया था।

उनके चेहरे पर साफ दिख रहे उनके दुख ने मुझे हिला कर रख दिया। मैं तस्वीर खींचकर वहां से आगे नहीं बढ सका । मैं उसकी व्यथा जानना चाहता था ।

पूछने पर उस परेशान पिता ने मुझे बताया कि उनका बेटा बीमार है और उसकी हालत गंभीर है। हो सकता है कि वह बच भी नही पाये । वह सिर्फ वहां जाकर उसे देखना चाहते थे।

मैंने उनसे पूछा कहां तो उस 40 साल के सिसकते हुए आदमी ने किसी तरह “उधर” बोलकर खाली सड़क की तरफ इशारा किया। बाद में मुझे पता चला कि उसका घर यहां से 1,200 किमी दूर बिहार में बेगूसराय के बरियारपुर में है।

उसने बताया कि वह नजफगढ़ में मजदूरी का काम करता है। यातायात का कोई साधन ना मिलने पर हजारों प्रवासियों की तरह वह भी अपने घर के लिए पैदल ही निकल पड़ा।

लेकिन पुल पर पुलिस ने उसे आगे जाने से रोक दिया।

वह दुखी और हताश आदमी तीन दिनों से निजामुद्दीन पुल पर फंसा हुआ था।

मैंने उसे बिस्कुट और पानी देकर उसे सांत्वना देने की कोशिश की। लेकिन मेरी कोई भी सांत्वना उस पिता के दुख को कम नहीं कर सकती थी जिसके मन में यह डर हो कि वह अपने बेटे को फिर कभी नहीं देख पाएगा।

मैं किसी भी तरह उस आदमी को उसके घर पहुंचाना चाहता थी इसलिए मैंने पुलिस वालों से उसे सीमा पार जाने देने का अनुरोध किया। पुलिसकर्मी ये नहीं करना चाहते थे लेकिन एक मीडियाकर्मी के अनुरोध को वे टाल नहीं सके और उसे घर पहुंचाने का आश्वासन दिया।

मैं घर पहुंचा तो मुझे अहसास हुआ कि मैंने उस आदमी से उसका नाम या फोन नंबर तो पूछा ही नहीं। मैं जानना चाहता था कि वह घर पहुंचा या नहीं, उसका बेटा कैसा है और वह बेटे से मिला या नहीं। 

मेरे पास इंतजार करने के लिए ज्यादा वक्त नहीं था।

सोमवार शाम के 5:15 बज रहे थे।

पीटीआई ने मेरी खींची हुई तस्वीर को मीडिया के माध्यम से लोगों तक पहुंचाई जिसके बाद उस पिता के दर्द ने लोगों बहुत लोगों के दिल को छुआ।

जैसे ही मेरी खींची हुई तस्वीर मीडिया में वायरल होना शुरु हुई तो कई अखबारों ने उस आदमी की कहानी लोगों के सामने लाने की कोशिश की।

उसके बाद मुझे पता चला कि उसका नाम रामपुकार पंडित था। इन खबरों से ही मुझे पता चला कि उसका बेटा जिंदगी की जंग हार गया।

यह जानकार मेरा दिल टूट गया ।

(यह सिंडिकेटेड न्यूज़ फीड से अनएडिटेड और ऑटो-जेनरेटेड स्टोरी है, लेटेस्टली स्टाफ ने इसमें कोई बदलाव या एडिट नहीं किया है)

(The above story first appeared on LatestLY on May 16, 2020 06:38 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).