नयी दिल्ली, 11 मार्च सरकार ने मंगलवार को बताया कि राज्य सरकारों द्वारा संचालित प्राकृतिक चिकित्सा शिक्षा प्रणाली में अलग-अलग पाठ्यक्रम और अवधि होती है और इसमें एकरूपता लाने की जरूरत है।
राज्यसभा में प्रश्नकाल के दौरान पूरक प्रश्नों का जवाब देते हुए स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री प्रतापराव गणपतराव जाधव ने स्वीकार किया कि कुछ विसंगतियां हैं। उन्होंने कहा कि जिन राज्यों में पांच साल की अवधि वाले पाठ्यक्रम हैं वहां उम्मीदवारों को डॉक्टर की उपाधि मिलती है, लेकिन चार साल की अवधि के पाठ्यक्रम वाले राज्यों में यह उपाधि नहीं मिलती।
जाधव ने कहा कि प्राकृतिक चिकित्सा पाठ्यक्रम के लिए पंजीकरण के साथ-साथ एक समान नियम और विनियमन की जरूरत है और मंत्रालय इस पर विचार करेगा।
आयुष दवाओं की कमी पर जाधव ने यह भी स्वीकार किया कि अधिकतर आयुष डॉक्टर ग्रामीण इलाकों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं, जहां आयुष दवाओं की कमी है, जिससे डॉक्टरों को एलोपैथिक विकल्प लिखने पर मजबूर होना पड़ रहा है।
उन्होंने कहा कि सरकार देश में आयुष दवाओं की उपलब्धता और सामर्थ्य बढ़ाने के लिए कदम उठा रही है।
उनके अनुसार आयुष मंत्रालय ने अनुसंधान के लिए 24 देशों के साथ सहयोग किया है और संस्थान स्तर पर 51 ऐसे सहयोग किए गए हैं।
जाधव ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आयुष के लिए शैक्षिक पृष्ठभूमि को मजबूत करने के उद्देश्य से, ऑस्ट्रेलिया और मलेशिया जैसे 15 देशों में आयुष पीठ की स्थापना की गई है।
जाधव ने कहा, ‘‘हम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आयुष के प्रचार और प्रसार के लिए प्रतिबद्ध हैं। आयुष मंत्रालय 2047 तक विकसित भारत के मिशन में योगदान देने के लिए तैयार है।’’
उन्होंने कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने गुजरात के जामनगर में एक वैश्विक पारंपरिक चिकित्सा केंद्र स्थापित किया है।
जाधव ने यह भी कहा कि सरकार ने आयुष वीजा देने की भी पहल की है। आयुष मंत्रालय के तहत पांच अनुसंधान परिषदों के बारे में बात करते हुए जाधव ने कहा कि ये परिषदें केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (सीसीआरएएस), केंद्रीय योग और प्राकृतिक चिकित्सा अनुसंधान परिषद (सीसीआरवाईएन), केंद्रीय यूनानी चिकित्सा अनुसंधान परिषद (सीसीआरयूएम), केंद्रीय सिद्ध अनुसंधान परिषद (सीसीआरएस) और केंद्रीय होम्योपैथी अनुसंधान परिषद (सीसीआरएच) हैं।
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