देश की खबरें | त्रावणकोर के शासकों ने श्री पद्माभनस्वामी के सेवादार की भूमिका नहीं खोई : उच्चतम न्यायालय

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि उसने कई पैमानों पर मसलन, ऐतिहासिक, पांरपरिक मान्याताएं और मंदिर तथा श्री पद्मनाभस्वामी के साथ संबंधों पर परखा और उसे यह मानने को मजबूर किया कि त्रावणकोर के शासक अनुबंध पर हस्ताक्षर करने तक मंदिर के प्रबंधक या सेवादार की भूमिका में थे।

नयी दिल्ली, 13 जून उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि उसने कई पैमानों पर मसलन, ऐतिहासिक, पांरपरिक मान्याताएं और मंदिर तथा श्री पद्मनाभस्वामी के साथ संबंधों पर परखा और उसे यह मानने को मजबूर किया कि त्रावणकोर के शासक अनुबंध पर हस्ताक्षर करने तक मंदिर के प्रबंधक या सेवादार की भूमिका में थे।

शीर्ष अदालत ने कहा कि परिपाटियों से पता चलता है कि शाही परिवार के किसी सदस्य के जन्म से लेकर मृत्यु तक के लिए मंदिर में विशेष प्रार्थना एवं अनुष्ठान किए जाते हैं।

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न्यायमूर्ति यू यू ललित और न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि शाही परिवार द्वारा मालिकाना हक का दावा नहीं किए जाने के बावजूद यह तथ्य है और यह स्वीकार्य है कि मंदिर का प्रबंधन हमेशा से शाही परिवार या त्रावणकोर राजप्रसाद के पास रहा है।

न्यायालय ने कहा, ‘‘ किसी भी पैमाने पर परखा जाए जैसे ऐतिहासिक दस्तावेज, लोक मान्यताएं, कुछ परंपराएं जो अनुष्ठान और मंदिर के मामलों से जुड़ी हैं और जिनमें शासक के उपस्थित होने की जरूरत होगी, शाही परिवार के सदस्यों का जीवन के विभिन्न चरणों में मंदिर और श्री पद्मनाभस्वामी के साथ गहरा जुड़ाव, तृप्ति धनम और उसका महत्व, लंबे समय से मान्यता प्राप्त और स्वीकार्य तथ्य है कि मंदिर का प्रबंधन हमेशा से शाही परिवार के पास रहा है।’’

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पीठ ने कहा, ‘‘ इससे हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि सदियों से मंदिर त्रावणकोर के शासक और शाही परिवार के प्रबंधन में रहा है और अनुबंध पर हस्ताक्षर करने तक वे मंदिर के प्रबंधक या सेवादार की भूमिका में रहे हैं।

परंपराओं का संदर्भ देते हुए पीठ ने कहा, ‘‘शाही परिवार में जन्म लेने वाला कोई भी पुरुष सदस्य श्री पद्मनाभस्वामी का ‘दास’ बनता है जबकि महिला सदस्य ‘सेवनी’ बनती है और इसके लिए अनुष्ठान तय है। शाही परिवार के पुरुष सदस्य के उपनयन संस्कार और महिला सदस्य के विवाह के समय विशेष उत्सव मनाया जाता है।

पीठ ने कहा कि यह तथ्य है कि मंदिर के विभिन्न अनुष्ठानों के लिए लिए शासक की उपस्थिति अनिवार्य है, जैसे प्रत्येक दिन सुबह होने वाले श्री पद्मनाभस्वामी के ‘एकांत दर्शन’। इस समय नम्बी (पुजारी) को छोड़कर अन्य कोई नहीं होता है और शासक को भी शहर से बाहर जाने से पहले अनुमति लेनी पड़ती है। भगवान की जो भी यात्रा होती है उसमें शासक को तलवार नीचे करके नेतृत्व करना होता है जो स्थापित करता है कि शाही परिवार का श्री पद्मनाभस्वामी से विशेष संबंध है।

त्रावणकोर के शाही परिवार के सदियों पुराने प्रशासनिक अधिकार को कायम रखकर उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को 13वीं सदी के इस मंदिर के प्रशासन की रूप रेखा भी तय कर दी। इस मंदिर का पुनर्निर्माण 1686 में किया गया था।

पीठ ने कानूनी उत्तराधिकारी उतरादम थिरुमल मार्तंड वर्मा के उस प्रस्ताव पर भी सहमति जताई जिसमें मंदिर के मामलों के प्रबंधन के लिए एक समिति गठित करने का प्रस्ताव किया गया था।

पीठ ने कहा, ‘‘ कानूनी पहलुओं का समाधान हो गया है, हमें इसपर विचार करना है कि आगे क्या करना है।’’

न्यायालय ने कहा, ‘‘खातसौर पर हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे है कि मंदिर का प्रबंधन या सेवादारी शाही परिवार के पास ही रहेगा।’’

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