देश की खबरें | नेता प्रतिपक्ष नियुक्त करने की जिम्मेदारी सरकार और विधानसभा अध्यक्ष की है: शिवसेना (उबाठा)
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मुंबई, एक जुलाई शिवसेना (उबाठा) के विधायक भास्कर जाधव ने मंगलवार को कहा कि यह राज्य सरकार और विधानसभा अध्यक्ष की संयुक्त जिम्मेदारी है कि वे महाराष्ट्र विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष (एलओपी) की नियुक्ति करें।
जाधव ने विधान भवन परिसर में संवाददाताओं से कहा कि राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (उबाठा) प्रक्रियात्मक मानदंडों से न तो अनजान है और न ही अनभिज्ञ है।
शिवसेना (उबाठा) ने नेता प्रतिपक्ष पद के लिए जाधव के नाम की सिफारिश की है। यह कैबिनेट दर्जे का पद होता है।
गौरतलब है कि शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के सांसद संजय राउत ने कहा था कि पूर्व में नेता प्रतिपक्ष का पद विपक्षी दलों को दिया गया था, जबकि उस समय उन्होंने 10 प्रतिशत सीट भी नहीं जीती थीं।
उन्होंने बताया कि 288 सदस्यीय राज्य विधानसभा में संयुक्त रूप से विपक्षी दलों के लगभग 50 विधायक हैं।
राउत ने कहा था कि शिवसेना (उबाठा) के पास 20 विधायक हैं। उन्होंने दावा किया कि भले ही विधायकों की संख्या कम हो, लेकिन संविधान में ऐसा कोई कानून या प्रावधान नहीं है जो कहता हो कि सदन को नेता प्रतिपक्ष के बिना काम करना चाहिए।
जाधव ने कहा, ‘‘विपक्ष के नेता की नियुक्ति में कोई तकनीकी बाधा नहीं बची है। सरकार विधानसभा अध्यक्ष पर उंगली उठाकर अपना पल्ला नहीं झाड़ सकती। जब ऐसा महत्वपूर्ण संवैधानिक पद खाली हो, तो सरकार और विधानसभा अध्यक्ष दोनों को ही कार्रवाई करनी चाहिए।’’
शिवसेना (उबाठा) विधायक ने कहा कि उनके पास विधान भवन प्रशासन की ओर से लिखित संदेश है, जिसमें पुष्टि की गई है कि इस पद पर दावा करने के लिए कोई खास संख्या बल होना जरूरी नहीं है।
उन्होंने कहा, ‘‘महा विकास आघाडी (एमवीए) में शिवसेना (उबाठा) के विधायकों की संख्या सबसे ज्यादा है। हमारे सहयोगियों ने भी मेरी उम्मीदवारी का समर्थन किया है। अब गेंद सरकार और विधानसभा अध्यक्ष के पाले में है।’’
जाधव ने दावा किया, ‘‘यह राज्य विधानमंडल का लगातार तीसरा सत्र है, फिर भी विधानसभा में विपक्ष का कोई नेता नहीं है। यह देरी न केवल अनुचित है, बल्कि सरकार की मंशा पर भी सवाल उठाती है।’’
उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी ने सभी औपचारिकताओं और अपेक्षाओं का पालन किया है और दावा किया कि इस तरह की देरी सदन में विपक्ष की संवैधानिक भूमिका को कमजोर करने के बराबर होगी।
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