देश की खबरें | संसदीय समिति ने पराली के लिए एमएसपी की तरह न्यूनतम मूल्य तय करने की सिफारिश की

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नयी दिल्ली, 11 फरवरी संसद की एक समिति ने सर्दियों में पराली जलाने को हतोत्साहित करने के लिए धान के अवशेषों का न्यूनतम मूल्य निर्धारित करने के वास्ते एक प्रणाली बनाने की सिफारिश की है।

राज्यसभा में पेश अपनी रिपोर्ट में अधीनस्थ विधान संबंधी समिति ने सुझाव दिया है कि खरीफ फसल के मौसम से पहले इन बेंचमार्क कीमतों की समीक्षा की जानी चाहिए और उन्हें सालाना अधिसूचित किया जाना चाहिए।

समिति ने कहा कि यह सुनिश्चित करेगा कि कीमतें श्रम और मशीनरी सहित अवशेष संग्रह के लिए किसानों की लागत के हिसाब से होंगी।

वाहनों से होने वाला उत्सर्जन, पराली जलाने की घटनाएं, पटाखे और स्थानीय प्रदूषण के अन्य कारक सर्दियों के दौरान दिल्ली-एनसीआर में वायु गुणवत्ता के खतरनाक श्रेणी में पहुंचने का कारण बनते हैं।

पराली जलाने की ज्यादातर घटनाएं पंजाब और हरियाणा में होती हैं, जहां कई किसान अगली फसल के लिए अपने खेतों को जल्दी से तैयार करने के लिए फसल अवशेषों को जलाते हैं।

इससे बचने के लिए केंद्र सरकार किसानों को सब्सिडी वाली मशीनरी जैसे हैप्पी सीडर, रोटावेटर और मल्चर इन-सीटू धान के पुआल प्रबंधन के लिए प्रदान कर रही है। हालांकि, उच्च ईंधन लागत कई किसानों को इन मशीनों का उपयोग करने से हतोत्साहित करती है।

कुछ किसान धान की पराली को बायोमास संयंत्रों और बॉयलर को बेचते हैं, लेकिन कीमत हमेशा निश्चित नहीं होती है।

संसदीय समिति ने दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण नियंत्रण की देखरेख करने वाले वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) के परामर्श से धान की पराली के लिए न्यूनतम मूल्य निर्धारित करने के लिए एक तंत्र स्थापित करने की सिफारिश की है।

समिति ने कहा है, "यह मूल्य न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के समान होना चाहिए, ताकि किसानों को अपनी पराली बेचने पर गारंटीकृत रिटर्न मिल सके।"

समिति ने राज्य सरकारों से पीयूएसए 44 (धान का एक प्रकार) जैसी लंबी अवधि की किस्मों के बजाय कम अवधि की धान की किस्मों को अपनाने को बढ़ावा देने का भी आग्रह किया।

समिति ने खरीद प्रक्रियाओं के मानकीकरण, बीज प्रमाणन प्रतिबंधों को लागू करने और सरकारी योजनाओं के तहत फसल विविधीकरण का विकल्प चुनने वाले किसानों को वित्तीय सहायता देने जैसे कदम भी सुझाए हैं।

समिति ने यह भी सिफारिश की है कि केंद्र सरकार को अन्य राज्यों में फसल विविधीकरण योजना जैसी योजनाओं के तहत फसल विविधीकरण प्रोत्साहनों के लिए एक प्रभावी मूल्यांकन ढांचा विकसित करना चाहिए, ताकि अन्य राज्यों में उनकी मापनीयता का आकलन किया जा सके।

समिति ने कृषि अवशेषों को जैव ऊर्जा उत्पादन में एकीकृत करने के लिए एक एकीकृत राष्ट्रीय नीति की जरूरत पर भी बल दिया।

समिति ने कहा, "इस नीति के तहत कृषि, नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस, उद्योग, स्वास्थ्य और पर्यावरण मंत्रालयों में अंतर-मंत्रालयी समन्वय सुनिश्चित किया जाना चाहिए और बायोथेनॉल, संपीड़ित बायोगैस और बायोमास पैलेट जैसी प्रौद्योगिकियों को अपनाने को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।"

समिति ने कहा कि नीति में फसल अवशेष प्रबंधन लागत का समाधान किया जाना चाहिए, वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान किया जाना चाहिए, आपूर्ति शृंखला बुनियादी ढांचे का विकास करना और आर्थिक व्यवहार्यता एवं पर्यावरणीय स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए किसानों के वास्ते जागरूकता कार्यक्रम चलाया जाना चाहिए।

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