नयी दिल्ली, 11 मार्च राज्यसभा में मंगलवार को विभिन्न विपक्षी दलों के सदस्यों ने आरोप लगाया कि शिक्षा समाज के निर्माण का मुख्य आधार है लेकिन इसे सरकार द्वारा नजरअंदाज करने की वजह से यह आधार कभी मजबूत नहीं हो पाया और बच्चों का बीच में पढ़ाई छोड़ना, स्कूलों में शिक्षकों, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा एवं अवसंरचना का अभाव तथा पर्चे लीक होना जैसी समस्याएं दूर होने के बजाय बढ़ती जा रही हैं।
उच्च सदन में शिक्षा मंत्रालय के कामकाज पर चर्चा में हिस्सा ले रहे विपक्षी सदस्यों ने सरकार पर विपक्ष शासित राज्यों के साथ ‘‘प्रतिकूल व्यवहार’’ करने का भी आरोप लगाया।
तृणमूल कांग्रेस के रीताव्रता बनर्जी ने कहा कि शिक्षा समाज के निर्माण का मुख्य आधार है लेकिन दुर्भाग्य से सबके लिए शिक्षा का लक्ष्य देश में आज तक पूरा नहीं हो पाया ।
उन्होंने कहा कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा आज भी चुनौती है और हमारे 80 फीसदी युवा बेरोजगार हैं। ‘‘असंगठित क्षेत्र में न सामाजिक सुरक्षा है और न ही निश्चितता, लेकिन युवा वहां विषम हालात में भी काम करने के लिए मजबूर हैं।’’
बनर्जी ने कहा कि राज्य विश्वविद्यालयों को अपनी जरूरतों के अनुसार काम करने की छूट दी जानी चाहिए लेकिन ऐसा नहीं होता और राजनीतिक प्रतिशोध विपक्ष शासित राज्यों में हावी हो जाता है। उन्होंने कहा कि कुलपतियों की नियुक्ति में राज्य सरकार को उपेक्षित कर दिया जाता है।
उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार, विपक्ष शासित राज्य सरकारों को विभिन्न शिक्षा मदों की केंद्रीय राशि भी समय पर जारी नहीं करती और पश्चिम बंगाल इसका उदाहरण है। ‘‘हमारा समग्र शिक्षा का कोष बार बार अनुरोध के बावजूद आज तक जारी नहीं किया गया। यह सहकारी संघवाद की भावना का पूरी तरह से उल्लंघन है।’’
बनर्जी ने अल्पसंख्यक संस्थानों का जिक्र करते हुए कहा कि आज करीब 54000 संस्थान देश में ईसाई संगठनों द्वारा चलाए जाते हैं जिनमें सात लाख विद्यार्थी पढ़ते हैं जो हर वर्ग के हैं। ‘‘लेकिन ये संस्थान सरकार के निशाने पर रहते हैं।’’
उन्होंने आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश सरकार ने अपनी पाठ्यपुस्तकों में से गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर के पाठ को हटा दिया। ‘‘यह विडंबना है।’’
द्रमुक सदस्य डॉ एनवीएन कनिमोझी शोमू ने कहा कि आजादी से पहले भारत में शिक्षा व्यवस्था विकेंद्रीकृत थी और महिलाएं भी शिक्षा से वंचित थीं लेकिन आजादी के बाद शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए तमाम प्रयास किए गए और इसे समवर्ती सूची में रखा गया जिसमें केंद्र और राज्य सरकार को बराबर के अधिकार हैं।
उन्होंने कहा ‘‘तमिलनाडु ने शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रयास किए और इसे बढ़ावा देने के लिए कई बेहतर कदम उठाए। तमिलनाडु ने मध्याह्न भोजन योजना और शिक्षा का अधिकार कानून सबसे पहले लागू किया। यही वजह है कि हम साक्षरता को बढ़ाने और निरक्षरता को कम करने में बहुत हद तक कामयाब रहे। ’’
शोमू ने कहा कि लेकिन केंद्र की ओर से वह सहयोग नहीं मिला जो मिलना चाहिए था। ‘‘आज तीन के फार्मूले के नाम पर हमारे ऊपर हिंदी थोपी जा रही है। केंद्र ने उत्तर भारत के राज्यों के लोगों को तमिल या अन्य दक्षिण भारतीय एं सिखाने के लिए कोई संस्थान स्थापित क्यों नहीं किया?’’
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