नयी दिल्ली, 12 मई उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ के निर्माताओं की ओर से दायर उस याचिका पर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु सरकार से जवाब मांगा जिसमें कहा गया है कि इन दोनों राज्यों के सिनेमाघरों में उनकी फिल्म नहीं दिखाई जा रही है।
पश्चिम बंगाल सरकार ने सिनेमाघरों में प्रदर्शित होने के तीन दिन बाद इस फिल्म पर प्रतिबंध लगा दिया। तमिलनाडु ने फिल्म पर प्रतिबंध नहीं लगाया है, लेकिन सुरक्षा कारण से फिल्म को सिनेमाघरों से हटा लिया गया है।
प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा की पीठ ने पश्चिम बंगाल सरकार से सवाल करते हुए कहा कि फिल्म को देश के बाकी हिस्सों में बिना किसी समस्या के प्रदर्शित किया जा रहा है और इस पर प्रतिबंध लगाने का कोई कारण नहीं दिख रहा।
पीठ ने पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक सिंघवी से कहा, ‘‘देश के बाकी हिस्सों में फिल्म दिखाई जा रही है जिसमें वे राज्य भी शामिल हैं जिनकी जनसांख्यिकीय संरचना समान है और वहां कुछ नहीं हुआ। इसका फिल्म के कलात्मक मूल्य से कुछ नहीं लेना-देना है। यदि लोग फिल्म को नहीं पसंद करते, तो वे फिल्म को नहीं देखेंगे।’’
सिंघवी ने कहा कि खुफिया जानकारी के मुताबिक, यहां कानून-व्यवस्था की समस्या उत्पन्न हो सकती है और विभिन्न समुदायों के बीच शांति भंग हो सकती है।
पीठ ने तमिलनाडु सरकार से कहा कि वह फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ का प्रदर्शन करने वाले सिनेमाघरों को पर्याप्त सुरक्षा उपलब्ध कराने के लिए उठाए गए कदमों के बारे में स्पष्ट करे।
पीठ ने तमिलनाडु सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता अमित आनंद तिवारी से कहा, ‘‘राज्य सरकार नहीं कह सकती कि जब सिनेमाघरों पर हमला किया जाता है और कुर्सियों को जलाया जाता है, तो वह मुंह मोड़ लेगी।’’
फिल्म के निर्माताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने कहा कि तमिलनाडु में वास्तव में पाबंदी लगाई गई है क्योंकि फिल्म का प्रदर्शन करने वाले सिनेमाघरों को धमकी दी जा रही है और उन्होंने इसका प्रदर्शन बंद कर दिया है।
साल्वे ने कहा, ‘‘पश्चिम बंगाल को लेकर हम अनुरोध करते हैं कि पाबंदी लगाने के आदेश को रद्द किया जाए।’’
पीठ ने कहा, ‘‘हम दोनों राज्यों को नोटिस जारी कर रहे हैं और वे अपना जवाब बुधवार तक दाखिल कर सकते हैं। हम इस मामले पर बृहस्पतिवार को विचार करेंगे।’’
‘द केरल स्टोरी’ का निर्देशन सुदिप्तो सेन ने किया है और इसे गत पांच मई से सिनेमाघरों में प्रदर्शित किया जा रहा है।
फिल्म में दावा किया गया है कि केरल की महिलाओं को इस्लाम अपनाने के लिए बाध्य किया गया और आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट (आईएस) द्वारा उनकी अपने संगठन में भर्ती की गई।
राज्य सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि आठ मई को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ‘घृणा और हिंसा की किसी भी घटना’ से बचने के लिए राज्य में फिल्म के प्रदर्शन पर तत्काल प्रतिबंध लगाने का आदेश दिया था।
फिल्म की रिलीज पर रोक लगाने से इनकार करने के केरल उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ एक अलग याचिका पर सुनवाई 15 मई को करेगी और उसी दिन नयी याचिका पर भी सुनवाई की जाएगी।
पांच मई को उच्च न्यायालय ने फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था और कहा था कि फिल्म के ट्रेलर में किसी समुदाय विशेष के खिलाफ कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है।
उच्च न्यायालय ने निर्माताओं की उस दलील का जिक्र किया था कि वे ‘अपमानजनक टीजर’ को बनाए रखने के इच्छुक नहीं हैं जिसमें एक बयान है कि केरल की ‘32,000 महिलाओं’ को मतांतरित किया गया और आतंकवादी संगठन में शामिल हुईं। यह भी कहा गया कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) ने फिल्म की समीक्षा करने के बाद पाया कि यह सार्वजनिक प्रदर्शन के लिहाज से उपयुक्त है।
उच्च न्यायालय ने यह भी कहा था कि निर्माताओं ने फिल्म के साथ एक ‘डिस्क्लेमर’प्रकाशित किया जिसमें विशेष रूप से कहा गया है कि यह घटनाओं का फंतासीयुक्त और नाटकीय रूपांतरण है और फिल्म सटीकता का दावा नहीं करती है।
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