जरुरी जानकारी | कर्जदारों के आचरण में बदलाव दिवाला संहिता का दूरगामी प्रभाव: समीक्षा

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on Information at LatestLY हिन्दी. दिवाला एवं ऋण शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) से कर्जदारों के आचरण में बदलाव आया है और यह आईबीसी के विभिन्न दूरगामी प्रभाव में से एक है। साथ ही इस कानून से संकट में फंसी कंपनियों को कारोबार से बाहर निकलने का मौका मिल रहा है और इससे दुर्लभ आर्थिक संसाधनों का अधिक उत्पादक कार्यों में उपयोग हो रहा है।

नयी दिल्ली, 31 जनवरी दिवाला एवं ऋण शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) से कर्जदारों के आचरण में बदलाव आया है और यह आईबीसी के विभिन्न दूरगामी प्रभाव में से एक है। साथ ही इस कानून से संकट में फंसी कंपनियों को कारोबार से बाहर निकलने का मौका मिल रहा है और इससे दुर्लभ आर्थिक संसाधनों का अधिक उत्पादक कार्यों में उपयोग हो रहा है।

संसद में पेश वित्त वर्ष 2022-23 की आर्थिक समीक्षा में यह कहा गया है।

सितंबर, 2022 के अंत तक 5,893 मामलों में कंपनी ऋण शोधन अक्षमता समाधान प्रक्रिया (सीआईआरपी) शुरू हुई। दिसंबर, 2016 में प्रभाव में आए आईबीसी के तहत इसमें से 67 प्रतिशत बंद हो चुकी हैं।

समीक्षा में भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा गया है कि वित्त वर्ष 2021-22 में अनुसूचित बैंकों ने आईबीसी के तहत जो राशि वसूली, वह अन्य किसी भी माध्यम से प्राप्त रकम से ज्यादा है।

समीक्षा के आंकड़ों के अनुसार अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों ने संहिता के जरिये 2021-22 में 89,661 करोड़ रुपये वसूल किये हैं।

इसी अवधि में सरफेसी कानून (वित्तीय परिसंपत्तियों के प्रतिभूतिकरण और पुनर्निर्माण और प्रतिभूति हित प्रवर्तन अधिनियम)के तहत 27,349 करोड़ रुपये, कर्ज वसूली न्यायाधिकरण (डीआरटी) के जरिये 12,114 करोड़ रुपये और लोक अदालतों के माध्यम से 2,777 करोड़ रुपये की वसूली हुई।

ये सभी आंकड़े अस्थायी हैं।

समीक्षा में कहा गया है, ‘‘संहिता का एक दूरगामी प्रभाव कर्जदारों के बीच उनके आचरण में बदलाव आना है। सीआईआरपी शुरू होने को लेकर नियंत्रण खत्म होने के भय से हजारों कर्जदारों ने अपने बकाये का निपटान दिवाला प्रक्रिया शुरू होने से पहले किया।’’

इसके अनुसार, ‘‘तीस सितंबर, 2022 तक सीआईआरपी शुरू करने के लिये 23,417 आवेदनों का निपटान ऋण शोधन अक्षमता समाधान के लिये स्वीकृति से पहले ही हो गया। इन मामलों में कुल चूक 7.3 लाख करोड़ रुपये की थी।’’

समीक्षा में कहा गया है, ‘‘घरेलू वित्तीय प्रणाली में मजबूती का असर बैंकों के बेहतर बही-खाते, एनबीएफसी (गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों) के मजबूत पूंजी स्तर और घरेलू म्युचूअल फंड की प्रबंधन अधीन संपत्तियों में मजबूत वृद्धि के रूप में दिखता है।’’

इसके अनुसार, बैंक कर्ज की अच्छी मांग और निवेश चक्र में सुधार के शुरुआती संकेत को संपत्ति गुणवत्ता में सुधार से लाभ मिल रहा है। इसके अलावा आईबीसी व्यवस्था से दबाव में फंसी कंपनियों के समयबद्ध तरीके से कारोबार से बाहर निकलने की सुविधा से देश में कारोबार सुगमता को समर्थन मिलता रहेगा।

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