मुंबई, 18 जनवरी वृहद आर्थिक मोर्चे पर स्थिति बेहतर होने के साथ देश को मजबूत आर्थिक वृद्धि की गति बनाये रखने और अगले वित्त वर्ष 2024-25 में कम-से-कम सात प्रतिशत जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) वृद्धि दर हासिल करने की जरूरत है। साथ ही आने वाले महीनों में मुद्रास्फीति को काबू में कर चार प्रतिशत के लक्ष्य पर लाने की आवश्यकता है। भारतीय रिजर्व बैंक के बुलेटिन में प्रकाशित एक लेख में यह कहा गया है।
‘अर्थव्यवस्था की स्थिति’ पर प्रकाशित लेख में कहा गया है कि विश्व अर्थव्यवस्था को लेकर निकट भविष्य में वृद्धि के मामले में संभावनाएं अलग-अलग हैं और एशिया के नेतृत्व में उभरती बाजार अर्थव्यवस्थाएं बाकी दुनिया से बेहतर प्रदर्शन करने के लिए तैयार हैं।
इसके अनुसार, ‘‘भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 2023-24 में उम्मीद से अधिक मजबूत रहने का अनुमान है। यह वृद्धि उपभोग से निवेश की ओर बदलाव पर आधारित है। सरकार के पूंजीगत व्यय पर जोर से निजी निवेश बढ़ना शुरू हुआ है। प्रतिकूल तुलनात्मक आधार के कारण खाद्य वस्तुओं की महंगाई बढ़ने से मुख्य (हेडलाइन) मुद्रास्फीति दिसंबर में जरूर बढ़ी है।’’
रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर माइकल देबव्रत पात्र की अगुवाई वाली टीम द्वारा लिखे गए इस लेख में कहा गया है कि सरकार ने बढ़-चढ़कर पूंजीगत व्यय किया है, उसका असर दिखने लगा है। इससे निजी निवेश बढ़ना शुरू हुआ है।
देश में संभावित उत्पादन में तेजी आ रही है। वास्तविक उत्पादन इससे अधिक है। हालांकि, अंतर बना हुआ है लेकिन वह कम है।
लेख में कहा गया है, ‘‘वृहद आर्थिक मोर्चे पर स्थिरता है। इसको देखते हुए अगले वित्त वर्ष 2024-25 में हमारा लक्ष्य वृद्धि की गति बनाये रखते हुए कम-से-कम सात प्रतिशत की आर्थिक वृद्धि दर हासिल करने का होना चाहिए।’’
इसको देखते हुए मुद्रास्फीति को इस साल की दूसरी तिमाही के लक्ष्य के अनुरूप रखने की जरूरत है।
लेख के अनुसार, साथ ही वित्तीय संस्थानों के बही-खातों को मजबूत बनाने और संपत्ति गुणवत्ता में और सुधार की जरूरत है। इसके साथ राजकोषीय और अंतरराष्ट्रीय लेन-देन के स्तर पर खातों में मजबूती का जो दौर चल रहा है, उसे बनाये रखने की आवश्यकता है।
इसमें कहा गया है, ‘‘जो बदलावकारी प्रौद्योगिकी के लाभ हैं, उसका उपयोग एक मजबूत जोखिम-मुक्त परिवेश में समावेशी विकास के लिए किया जाना चाहिए।
आरबीआई बुलेटिन में छपे लेख के अनुसार, ‘‘सबसे महत्वपूर्ण, सरकारी पूंजीगत व्यय से निवेश के लिए जो सकारात्मक माहौल बना है, उसमें कंपनियों की भागीदारी और यहां तक की इस मामले में उनकी अगुवाई जरूरी है। साथ ही पूरक के रूप में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश भी होना चाहिए।’’
लेख में कहा गया है कि अभी जो वैश्विक परिदृश्य कमजोर बना हुआ है, अगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी तनाव खत्म होता है और उसके प्रभाव को जिंस और वित्तीय बाजार, व्यापार तथा परिवहन एवं आपूर्ति नेटवर्क के जरिये काबू किया जाता तो स्थिति बेहतर हो सकती है।
आरबीआई ने यह साफ किया है कि बुलेटिन में प्रकाशित विचार लेखकों के हैं और यह केंद्रीय बैंक के विचारों को प्रतिनिधित्व नहीं करता है।
लेख में यह भी कहा गया है कि प्राथमिक बाजार में जमा प्रमाणपत्र के जरिये जुटाया गया कोष 2023-24 में दिसंबर तक बढ़कर 5.6 लाख करोड़ रुपये हो गया जो एक साल पहले 4.9 लाख करोड़ रुपये था।
इसमें कहा गया है, ‘‘दिसंबर, 2023 में बैंकों ने कर्ज वृद्धि और उस अनुपात में जमा वृद्धि नहीं होने के बीच के अंतर को पाटने के लिए एक लाख करोड़ रुपये से अधिक के जमा प्रमाणपत्र (सीडी) जारी किये। यह चालू वित्त वर्ष में किसी महीने में सर्वाधिक है।’’
दिसंबर, 2023 तक दस लाख करोड़ रुपये के वाणिज्यिक पत्र जारी किये गये। एक साल पहले समान अवधि में यह आंकड़ा 10.5 लाख करोड़ रुपये था।
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