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प्रतिकूलता से मुक्त कामकाज की दशा मर्यादापूर्ण रोजगार का मूलभूत अंग है : उच्चतम न्यायालय

न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी की पीठ ने अपने एक फैसले में यह टिप्पण की। इस फैसले में पीठ ने 35 साल पुराने एक उस कानून की संवैधानिक वैधता पर भी मुहर लगायी जो सरकारी प्राधिकार को खुफिया अधिकारी के बेनकाब होने अथवा संगठन के लिए उसके ‘अनियोज्य‘ होने पर अनिवार्य रूप से उसे सेवानिवृत करने का अधिकार प्रदान करता है।

प्रतिकूलता से मुक्त कामकाज की दशा मर्यादापूर्ण रोजगार का मूलभूत अंग है : उच्चतम न्यायालय
जमात

नयी दिल्ली, 24 अप्रैल उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि ‘प्रतिकूलता से मुक्त कामकाज की दशा मर्यादापूर्ण रोजगार का मूलभूत अंग है’ तथा यौन उत्पीड़न का कानून केवल वास्तविक अपराध तक सीमित नहीं रहना चाहिए बल्कि उसके अंतर्गत महिलाओं के प्रति रोजमर्रा के पूर्वाग्रह एवं उनके साथ होने वाले भेदभाव भी आना चाहिए।

न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी की पीठ ने अपने एक फैसले में यह टिप्पण की। इस फैसले में पीठ ने 35 साल पुराने एक उस कानून की संवैधानिक वैधता पर भी मुहर लगायी जो सरकारी प्राधिकार को खुफिया अधिकारी के बेनकाब होने अथवा संगठन के लिए उसके ‘अनियोज्य‘ होने पर अनिवार्य रूप से उसे सेवानिवृत करने का अधिकार प्रदान करता है।

न्यायालय का यह फैसला निशा प्रिया भाटिया की याचिकाओं पर आया है । इन याचिकाओं का संबंध 1975 की रिसर्च एंड एनालायसिस (रॉ) विंग (भर्ती, कैडर एवं सेवाएं)नियामवली के तहत उन्हें जबरन सेवानिवृत करने के मुद्दों से जुड़ा है।

अदालत ने इस तथ्य का संज्ञान लिया कि पूर्व अधिकारी द्वारा संगठन के दो वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ लगाये गये यौन उत्पीड़न के आरोपों की जांच के लिए अंदरूनी जांच समिति बनाने में देरी की गयी और पीठ ने केंद्र को उन्हें एक लाख रूपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया।

फैसले में कहा गया है, ‘‘2013 के कानून की योजना, महिलाओं के विरूद्ध सभी तरह के भेदभाव दूर करने पर केंद्रित विशाखा दिशानिर्देश कहता है कि प्रतिकूलता से परे कामकाज का माहौल मर्यादापूर्ण रोजगार का मूलभूत अंग है।’’

उसमें कहा गया है, ‘‘ कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के मामलों से जुड़े कानून का दायरा बस ऐसे उत्पीडनों को होने तक के मामलों तक सीमित नहीं है बल्कि उसमें वह स्थिति भी शामिल है जहां महिलकाकर्मी को कार्यस्थल पर रोजाना के कामकाज में पूर्वाग्रह, शत्रुतापूर्ण रवैये, भेदभावकारी रूख, अपमान से गुजरना होता है। भिन्न दृष्टिकोण अपनाने से इस कनून का उद्देश्य पराजित हो जाएगा। ’’

अदालत ने कहा कि समय से सक्षम मंच द्वारा जांच से वंचित करने से इंसाफ से वंचना एवं मूल अधिकारों का उल्लंघन हुआ।

इस मामले में भाटिया को मुआवजा देने का फैसला सुनाते हुए पीठ ने कहा कि इस मामले की तथ्यात्मक रूपरेखा यौन उत्पीड़न की शिकायत पर सचिव की ओर से संवेदनशीलता की कमी का है।

उसने कहा कि भाटिया की शिकायत की जांच के लिए प्रथम शिकायत समिति का गठन ‘अनपयुक्त’ एवं विशाखा दिशानिर्देशों का उल्लंघन है।

भाटिया द्वारा अपने दो वरिष्ठों के खिलाफ लगाये गये यौन उत्पीड़न के आरोपों की जांच के लिए रॉ ने दो अंदरूनी समितियां गठित की थी।

अधिकारियों को क्लीनचिट दिया गया क्योंकि भाटिया समितियों के सामने पेश नहीं हुईं ।

महिला अधिकारी को 12 दिसंबर, 2009 को जबरन सेवानिवृत कर दिया गया।

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(The above story first appeared on LatestLY on Apr 24, 2020 10:11 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).