नयी दिल्ली, 13 जनवरी उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि नागरिक अधिकारों को प्रभावित करने वाले कानूनों की कसौटी पर ही कर कानूनों का परीक्षण नहीं किया जा सकता तथा इन कानूनों की पड़ताल करते समय कानून निर्माताओं को व्यापक छूट देनी चाहिए।
शीर्ष अदालत ने हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के जुलाई 2007 के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें हिमाचल प्रदेश मोटर वाहन कराधान (संशोधन) अधिनियम, 1999 की धारा 3ए(3) को अधिकारातीत माना गया था।
न्यायमूर्ति एस के कौल की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि अदालतों को न्यायिक संयम दिखाना चाहिए और कर कानून में तब तक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए जब तक यह दिखाया और साबित नहीं किया जाता है कि इस तरह के कर कानून स्पष्ट रूप से अन्यायपूर्ण या असंवैधानिक हैं।
शीर्ष अदालत ने कहा कि उच्च न्यायालय की राय थी कि धारा 3ए(3) के तहत लगाया गया कर दंड की प्रकृति का है, जिसके लिए राज्य विधानमंडल के पास कानून बनाने की कोई शक्ति नहीं है।
राजकोषीय कानूनों में हस्तक्षेप की गुंजाइश का उल्लेख करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा, "अब तक यह अच्छी तरह से स्थापित हो गया है कि किसी भी कर कानून में आसानी से हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है।"
पीठ में न्यायमूर्ति अभय एस ओका और न्यायमूर्ति विक्रम नाथ भी शामिल थे।
यह भी संज्ञान लिया गया कि 1999 के संशोधन अधिनियम द्वारा, धारा 3ए (विशेष सड़क उपकर) पेश किया गया था और यह विशेष सड़क कर धारा 3 के तहत लगाए गए कर के अतिरिक्त था।
पीठ ने कहा, "संशोधन अधिनियम 1999 के उद्देश्य और कारणों से, यह स्पष्ट है कि विशेष रोड टैक्स को एक क्षतिपूर्ति उपाय के रूप में पेश किया गया था।"
शीर्ष अदालत ने अपील की अनुमति देते हुए कहा, "हमारी राय में उपरोक्त सभी कारणों के मद्देनजर धारा 3ए(3) की वैधता को गलत तरीके से उच्च न्यायालय द्वारा अधिकारातीत माना गया है। धारा 3ए(3) के तहत लगाया गया कर, नियामक प्रवृत्ति का है, न कि एक दंडात्मक।’’
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