देश की खबरें | उच्चतम न्यायालय मेइती के लिए एसटी दर्जे से जुड़े उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करेगा

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नयी दिल्ली, सात मई उच्चतम न्यायालय मणिपुर की स्थिति को लेकर दायर कई याचिकाओं पर सोमवार को सुनवायी करेगा। इनमें मेइती समुदाय के लिए अनुसूचित जनजाति (एसटी) दर्जे के मुद्दे पर उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली सत्तारूढ़ भाजपा के एक विधायक की याचिका भी शामिल है।

इसके अलावा, इनमें शामिल एक याचिका में आदिवासी संगठन ने एक जनहित याचिका दायर करके मणिपुर में हुई हालिया हिंसा की घटना की जांच विशेष जांच दल (एसआईटी) से कराने की भी गुहार लगाई है।

प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला की पीठ द्वारा इस मामले की सुनवाई करना निर्धारित है।

गौरतलब है कि मणिपुर में बहुसंख्यक मेइती समुदाय की उसे अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा दिए जाने की मांग के विरोध में ‘ऑल ट्राइबल स्टूडेंट यूनियन मणिपुर’ (एटीएसयूएम) की ओर से बुधवार को आयोजित ‘आदिवासी एकजुटता मार्च’ के दौरान चुराचांदपुर जिले के तोरबंग क्षेत्र में हिंसा भड़की, जो धीरे-धीरे पूरे राज्य में फैल गई थी।

नगा और कुकी सहित अन्य आदिवासी समुदायों की ओर से इस मार्च का आयोजन मणिपुर उच्च न्यायालय द्वारा 27 मार्च को किया गया था। राज्य सरकार को मेइती समुदाय की एसटी दर्जे की मांग पर चार सप्ताह के भीतर केंद्र को एक सिफारिश भेजने का निर्देश देने के बाद यह मार्च आयोजित किया गया था।

मेइती समुदाय को अनुसूचित जनजाति दर्जे पर मणिपुर उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए विभिन्न आदेशों को चुनौती देते हुए भाजपा विधायक एवं पहाड़ी क्षेत्र समिति (एचएसी) के अध्यक्ष डिंगांगलुंग गंगमेई द्वारा अपील दायर की गई है, जिसमें मेइती को एसटी दर्जे पर मणिपुर उच्च न्यायालय द्वारा पारित विभिन्न आदेशों को चुनौती दी गई है। इसमें उच्च न्यायालय के आदेश की आलोचना पर अवमानना नोटिस जारी करना भी शामिल है।

गंगमेई ने अपनी अपील में कहा कि एचएसी ‘‘एक आवश्यक और उचित पक्षकार है और एचएसी को पक्षकार नहीं बनाने के कारण उच्च न्यायालय के समक्ष कार्यवाही प्रभावित हुई’’ और उच्च न्यायालय के आदेश से तनाव उत्पन्न हुआ और इससे दो समुदायों के बीच हिंसा हुई।

इस मुद्दे से संबंधित उच्च न्यायालय द्वारा अवमानना ​​नोटिस सहित विभिन्न आदेशों को चुनौती देने वाले विधायक ने कहा, ‘‘यदि निर्देश दिए भी जाने थे, उन्हें एचएसी को नोटिस दिए बिना और एचएसी को सुने बिना नहीं दिया जाना चाहिए था।’’

अपील में कहा गया है कि उच्च न्यायालय के आदेश से दोनों समुदायों के बीच तनाव पैदा हुआ और पूरे राज्य में हिंसक झड़पें हुईं। उन्होंने कहा, ‘‘इसके परिणामस्वरूप अब तक 19 आदिवासियों की मौत हो चुकी है, इंटरनेट पूरी तरह से बंद है और लोगों को जान जाने का खतरा है।’’

एनजीओ ‘मणिपुर ट्राइबल फोरम’ द्वारा वकील सत्य मित्र के माध्यम से दायर जनहित याचिका में कहा गया है कि मणिपुर में जनजातीय समुदाय पर एक ‘‘प्रभावशाली समूह’’ द्वारा किए गए हमलों से उत्पन्न चरम स्थिति के कारण उसने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत उच्चतम न्यायालय का रुख किया है।

इसने आरोप लगाया, ‘‘इन हमलों को सत्ताधारी पार्टी का पूर्ण समर्थन प्राप्त है... जो प्रभावशाली समूह का समर्थन करती है।’’

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