देश की खबरें | राज्य कोविड से माता-पिता खोने वाले नाबालिगों की रक्षा करें : न्यायालय

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को कहा कि राज्यों को ऐसे बच्चों की “रक्षा” करनी है जिन्होंने कोविड-19 महामारी के दौरान माता-पिता में से किसी एक को या दोनों को खो दिया है। न्यायालय ने यह भी कहा कि उन्हें यह सुनिश्चित करना है कि कम से कम मौजूदा शैक्षणिक सत्र में ऐसे बच्चों की शिक्षा बाधित नहीं हो।

नयी दिल्ली, 26 अगस्त उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को कहा कि राज्यों को ऐसे बच्चों की “रक्षा” करनी है जिन्होंने कोविड-19 महामारी के दौरान माता-पिता में से किसी एक को या दोनों को खो दिया है। न्यायालय ने यह भी कहा कि उन्हें यह सुनिश्चित करना है कि कम से कम मौजूदा शैक्षणिक सत्र में ऐसे बच्चों की शिक्षा बाधित नहीं हो।

न्यायालय ने कहा कि ऐसे बच्चों की पहचान उनकी आवश्यकताओं का पता लगाने के लिए "शुरुआती बिंदु" है और उनका कल्याण सबसे ऊपर है। न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस की पीठ ने कहा, ‘‘भले ही अपने अभिभावकों के बिना 1,000 बच्चे हों, कल्पना करें कि उनके साथ क्या होने वाला है। उन्हें बाल श्रम की ओर धकेला जा सकता है। वे समाज में अवांछित तत्वों के हाथों में जा सकते हैं। हम नहीं जानते कि उनका क्या होगा। ये नाजुक बच्चे हैं। इसलिए, हमें ऐसे बच्चों के लिए बेहद सावधान रहना होगा। ”

पीठ ने कहा कि हो सकता है कि इनमें से अधिकतर बच्चों के पास अपना पालन-पोषण करने का साधन न हो। पीठ ने कहा, "... राज्य को उनकी रक्षा करनी है।’’ पीठ बाल संरक्षण गृहों में कोविड के संक्रमण पर स्वत: संज्ञान लेते हुए एक मामले की सुनवाई कर रही थी।

न्यायालय ने ऐसे बच्चों के राज्य-वार ब्योरे पर गौर किया जो अनाथ हो गए हैं या महामारी के दौरान माता-पिता में से किसी एक की मृत्यु हो गयी। अदालत ने ऐसे बच्चों की पहचान प्रक्रिया की स्थिति भी गौर किया ताकि उन्हें योजनओं का लाभ दिया जा सके।

पीठ ने कहा कि ऐसे बच्चों की देखभाल के लिए राज्यों को सक्रिय कदम उठाने होंगे और यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उनकी उनकी शिक्षा बाधित नहीं हो। पीठ ने कहा कि राज्य निजी स्कूलों से बात कर सकते हैं, जहां ऐसे बच्चे पढ़ रहे हैं ताकि फीस में छूट दी जा सके और उनकी शिक्षा कम से कम इस शैक्षणिक सत्र में जारी रह सके।

पीठ ने कहा कि अगर स्कूल आगे नहीं आ रहे हैं या फीस माफ करने को तैयार नहीं हैं, तो राज्य इस शैक्षणिक वर्ष के लिए ऐसे बच्चों की फीस वहन कर सकते हैं। यह जरूरी है कि जरूरतमंद बच्चों को राज्य सरकारों द्वारा घोषित लाभ मिले।

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