देश की खबरें | सामाजिक परिवर्तन में थोड़ा समय लगता है, कानून लाना आसान लेकिन समाज को राजी करना मुश्किल: न्यायालय
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को कहा कि सामाजिक बदलाव लाने में ‘‘थोड़ा समय’’ लगता है और कभी-कभी कानून लाना आसान होता है लेकिन समाज को इसके साथ बदलने के लिए राजी करना मुश्किल होता है। शीर्ष अदालत ने विवाह-विच्छेद से संबंधित मुद्दे पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की।
नयी दिल्ली, 29 सितंबर उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को कहा कि सामाजिक बदलाव लाने में ‘‘थोड़ा समय’’ लगता है और कभी-कभी कानून लाना आसान होता है लेकिन समाज को इसके साथ बदलने के लिए राजी करना मुश्किल होता है। शीर्ष अदालत ने विवाह-विच्छेद से संबंधित मुद्दे पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की।
उच्चतम न्यायालय इस मुद्दे पर सुनवाई कर रहा था कि आपसी सहमति वाले पक्षकारों को पारिवारिक अदालत में भेजे बिना विवाह को भंग करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत शक्तियों के प्रयोग के वास्ते व्यापक मापदंड क्या हो सकते हैं।
संविधान का अनुच्छेद 142 शीर्ष अदालत के आदेशों और उसके समक्ष किसी भी मामले में ‘‘पूर्ण न्याय’’ प्रदान करने के आदेशों को लागू करने से संबंधित है।
न्यायमूर्ति एस. के. कौल की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा, ‘‘सामाजिक परिवर्तन में थोड़ा समय लगता है। कभी-कभी कानून लाना आसान होता है लेकिन कानून के अनुसार समाज को बदलने के लिए राजी करना ज्यादा मुश्किल होता है।’’
इस मामले में न्याय मित्र के रूप में शीर्ष अदालत की सहायता कर रही वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने कहा कि यह दोनों तरह से काम करता है, और कभी-कभी कानून सामाजिक परिवर्तन लाने में पिछड़ जाता है और कभी-कभी कानून इससे आगे होता है।
न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति ए. एस. ओका, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति जे. के. माहेश्वरी की पीठ ने भी इस मामले पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।
दिनभर की बहस के दौरान, जयसिंह ने विवाह कानून (संशोधन) विधेयक, 2010 सहित दो विधेयकों का हवाला दिया।
उन्होंने कहा कि बुधवार को सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल अदालत में मौजूद थे और वह उन्हें यह बताने वाली थीं कि विधेयक था और उन्हें संसद में इस बारे में कुछ करने का अवसर मिला था।
संसद सदस्य सिब्बल संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के दौरान एक केंद्रीय मंत्री थे।
मामले में पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि अदालत को एक ऐसी प्रक्रिया विकसित करने की जरूरत है जो कानून के साथ असंगत न हो।
पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ताओं वी. गिरि, दुष्यंत दवे और मीनाक्षी अरोड़ा सहित अन्य वकीलों की दलीलें भी सुनीं।
दवे, गिरि और अरोड़ा भी मामले में न्याय मित्र के रूप में अदालत की सहायता कर रहे हैं।
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