हिमालय पर तेजी से खत्म हो रही है बर्फ, स्नो-ड्रॉट से नदियों और किसानों को खतरा
प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

सर्दियों में हर साल हिमालय के इलाके में पहले से कम बर्फबारी हो रही है. अधिकांश पहाड़ पथरीले हो गए हैं. बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियर भी लगातार सिकुड़ते चले जा रहे हैं. स्नो ड्रॉट से नदियों और किसानों को खतरा है.नवाब कयूम का परिवार पिछले 15 सालों से कश्मीर के गंदरबल में अखरोट की खेती कर रहा है. दिसंबर में इसके पौधे को खेतों में उगाया जाता है. लेकिन कम बर्फ गिरने की वजह से उन्हें अपने पेड़ काटने पड़ रहे हैं. नवाब कयूम कहते हैं, "हमारे अखरोट के पेड़ खराब हो गए हैं. पहले एक पेड़ की उपज से हम 50 से 70 हजार रुपये कमा लिया करते थे. कम बर्फबारी और बारिश के चलते पौधे को पर्याप्त ठंड नहीं मिल रही है. जिससे अच्छी उपज और गुणवत्ता वाले अखरोट नहीं आ रहे."

नवाब कयूम जैसे कई किसान हिमालयी क्षेत्र में कम बर्फबारी का भारी नुकसान झेल रहे हैं. पिछले दो दशकों से हिंदुकुश हिमालय क्षेत्र में हर साल कम बर्फबारी का अनुभव कर रहा है. जबकि तापमान ज्यादा होने के कारण गिरी हुई बर्फ जल्दी पिघल रही है.जलवायु परिवर्तन का असर यहां एक हकीकत है. एकीकृत पर्वतीय विकास अंतरराष्ट्रीय केंद्र (आईसीआईएमओडी) की रिपोर्ट के अनुसार यहां पिछले 23 सालों में बर्फ के टिके रहने की अवधि लगभग 23.6 प्रतिशत कम हो गई है.

विशेषज्ञों के अनुसार जलवायु परिवर्तन, बढ़ता तापमान और कमजोर पश्चिमी विक्षोभ के चलते हिमालय के अधिकतर हिस्से पर 'स्नो-ड्रॉट' जैसी स्थिति पैदा हो गई है. यह पानी की उपलब्धता, मिट्टी की नमी और खेती बारी के लिए गंभीर चिंता का विषय है.

क्या है हिंदुकुश हिमालय क्षेत्र का महत्त्व?

हिंदुकुश हिमालय का इलाका भारत, चीन, नेपाल, भूटान, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, म्यांमार और बांग्लादेश तक फैला हुआ है. यहां गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र जैसी 11 बड़ी नदियां बहती हैं. वसंत के महीने में बर्फ पिघलने से ही इन नदियों को पानी मिलता है. लगभग 17 प्रतिशत आबादी पीने के पानी की जरूरतें पूरी करने के लिए सीधे तौर पर इससे जुड़ी हुई है. इसी पानी का उपयोग सिंचाई और हाइड्रोपावर के लिए भी किया जाता है.

साइंटिफिक रिपोर्ट्स जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण हिंदुकुश हिमालय क्षेत्र के तापमान में वैश्विक औसत से 0.74°C अधिक वृद्धि दर्ज की गई है. साथ ही साल 2003 से 2020 तक हिमालय के अधिकांश हिस्सों में बर्फ से घिरे इलाकों में गिरावटदेखी गई. पहले यहां औसतन 102 दिनों तक बर्फ रहती थी. अब हर दस साल में पांच दिन कम हो रहे हैं. इस अध्ययन को हेमंत सिंह, डॉ.दिव्येश वराडे और डॉ. विवेक गुप्ता की टीम ने किया है.

कम बर्फ और बढ़ते तापमान से घट रही है पैदावार

तापमान बढ़ने से साल 2003 से 2016 के बीच हिमालय में स्नो लाइन ऊपर चली गई. यानी नीचे के इलाकों में गिरने के बजाय, बर्फ अब केवल ज्यादा ठंडे और ऊंची पहाड़ियों पर गिरती है. जिसकी वजह से कृषि भूमि के क्षेत्र में बदलाव आ रहा है और फलों की पैदावार में गिरावट देखी जा रही है.

क्लाइमेट ट्रेंड्स की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि उत्तराखंड में साल 2016-17 से 2022-23 के बीच सेब की खेती का क्षेत्रफल लगभग 25,201 हेक्टेयर से घटकर 11,327 हेक्टेयर रह गया. जबकि सेब और नींबू की उपज में गिरावट देखी गई. सेव की उपज में लगभग 30 प्रतिशत और नींबू की उपज में 58 प्रतिशत की गिरावट आई है.

प्रधानमंत्री रिसर्च फेलो हेमंत सिंह आईआईटी जम्मू में बर्फ और ग्लेशियर पर शोध कर रहे हैं. वह समझाते हैं, "भारत में सेब लगभग सितंबर में आता है. लेकिन अब फरवरी और मार्च तक भी बहुत बर्फ देखने को नहीं मिलती. बर्फ गिरने में देरी और पहाड़ियों पर बढ़ते तापमान के चलते सेब के पेड़ को पर्याप्त ठंड और मिट्टी में नमी नहीं मिल पा रही है. इससे फल की गुणवत्ता और उत्पादन प्रभावित हो रहे हैं.”

क्या है पश्चिमी विक्षोभ और कैसे बन रही है सूखे की स्थिति?

सर्दियों में उत्तर भारत, पाकिस्तान,अफगानिस्तान और नेपाल में कम बारिश और बर्फबारी की एक मुख्य वजह पश्चिमी विक्षोभ का कमजोर होना भी है. पश्चिमी विक्षोभ एक तरह की मौसम प्रणाली है. ये ऐसे तूफान हैं जो भूमध्य सागर, काला सागर और कैस्पियन सागर के आसपास के क्षेत्रों में उत्पन्न होते हैं. वहां से तूफान पश्चिमी हवाओं के साथ ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान होते हुए भारत में प्रवेश करते हैं. दिसंबर से फरवरी के बीच पश्चिमी विक्षोभ सबसे ज्यादा सक्रिय होता है. इसकी वजह से सर्दियों में उत्तर भारत में बारिश और पहाड़ों में बर्फ गिरती है.

भारत के मौसम विभाग के मुताबिक पश्चिमी विक्षोभों के कमजोर होने से पिछले साल दिसंबर में उत्तराखंड के सभी 13 जिलों में न के बराबर बर्फ गिरी. गढ़वाल में इस साल जनवरी में बर्फबारी का अभाव देखा गया. ऐसा पिछले 40 सालों में पहली बार हुआ है. कम हिमपात के चलते जटामांसी और कुटकी जैसी महत्वपूर्ण आयुर्वेदिक जड़ीबूटियां विलुप्त हो रही हैं.

आईआईटी मंडी के सिविल एवं पर्यावरण इंजीनियरिंग विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ.विवेक गुप्ता डीडब्ल्यू को बताते हैं, "हिमालय तेजी से गर्म हो रहा है. ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमालय में ऊंचाई पर भी तापमान (एलीवेशन डिपेंडेंट वार्मिंग) बढ़ रहा है. वहीं दूसरी तरफ सर्दियों के दौरान पश्चिमी विक्षोभ न केवल देरी से आ रहे हैं, बल्कि उनकी संख्या भी घट रही है. इन कारणों के संयुक्त प्रभाव से फ्रीजिंग लेवल ऊपर खिसक रहा है. नतीजतन जब सीमित विक्षोभ नमी लाते भी हैं, तो वह बर्फ के बजाय बारिश के रूप में गिरती है. इससे हिमपात का मौसम छोटा होता जा रहा है और हिमालयी क्षेत्रों में स्नो ड्रॉट या ‘बर्फ का सूखा' जैसी स्थिति बन रही है. विशेष रूप से 3,000 से 6,000 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में यह प्रभाव सबसे अधिक देखा गया है."

हेमंत सिंह भी डीडब्ल्यू के साथ अपना अनुभव साझा करते हुए कहते हैं, "मैं पिछले साल हिमाचल प्रदेश में अटल टनल के पास था. एक स्थानीय शख्स ने मुझे बताया कि जनवरी में वहां केवल 10 से 15 सेंटीमीटर बर्फ गिरी. जबकि अटल टनल बनने से 10-15 साल पहले वहां कम से कम 15 मीटर तक बर्फ जमा हो जाती थी. अब नियमित बर्फबारी की जगह जंगल की आग, क्लाउड बर्स्ट और भूस्खलन की घटनाएं बढ़ गई हैं. खेती की जमीन नष्ट हो रही है. याक जैसे जानवरों का प्रजनन पैटर्न बदलने लगा है."

इस संकट से कैसे निपटा जाए?

डॉ. दिव्येश वराडे आईआईटी जम्मू के सिविल इंजीनियरिंग विभाग में जियोमैटिक्स इंजीनियरिंग के असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं. वह कहते हैं कि बर्फ की कमी का नकारात्मक असर कृषि, हाइड्रोपॉवर, नदियों में पानी की मात्रा और स्थानीय समुदायों पर देखने को मिल रहा है. इसलिए जरूरी है कि तुरंत कदम उठाए जाएं.

डॉ. वराडे का कहना है कि सरकार को सैटेलाइट एवं डेटा सिस्टम विकसित करना चाहिए ताकि इस क्षेत्र पर लगातार निगरानी रखी जा सके. भूस्खलन और फ्लड चेतावनी सिस्टम स्थापित करने पर जल्दी विचार करना होगा. साथ ही किसानों को भी कम बर्फ और खेती के लिए कम होते क्षेत्र के लिए तैयार करने की आवश्यकता है.