ताजा खबरें | अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय से जुड़े छह आश्वासन 12 वर्ष से लंबित, समिति ने ठोस प्रयास करने को कहा

नयी दिल्ली, नौ फरवरी संसद की एक समिति ने अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय से संबंधित अनेक सरकारी आश्वासनों के वर्षों से लंबित होने पर संज्ञान लेते हुए कहा कि इनमें से कुछ आश्वासन संवेदनशील हैं, अत: इनके क्रियान्वयन के लिये ठोस प्रयास किये जाने की जरूरत है।

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सांसद राजेन्द्र अग्रवाल की अध्यक्षता वाली, सरकारी आश्वासनों संबंधी समिति ने ‘अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय से संबंधित लंबित आश्वासनों की समीक्षा’ विषय पर लोकसभा में बृहस्पतिवार को पेश रिपोर्ट में यह बात कही।

रिपोर्ट के अनुसार, समिति ने यह नोट किया है कि समीक्षा के लिये समिति द्वारा लिए गए आश्वासनों में से छह आश्वासन बारह/तेरह वर्ष से अधिक समय से लंबित थे, छह आश्वासन आठ से नौ वर्ष से अधिक समय से लंबित थे, पांच आश्वासन एक से चार वर्ष से लंबित थे।

इसमें कहा गया है कि मंत्रालय का कहना है कि आश्वासनों की निगरानी के लिये नियमित समीक्षा बैठकें होती हैं लेकिन आश्वासनों को पूरा करने में अधिक विलंब होने से समीक्षा एवं निगरानी के संबंध में मंत्रालय की कमियों का पता चलता है।

समिति ने कहा कि उसका मानना है कि जिन आश्वासनों में दूसरे मंत्रालय या विभाग शामिल होते हैं, उन्हें पूरा करने में स्थापित मौजूदा तंत्र अप्रभावी है और इसे बदलने की जरूरत है।

समिति ने कहा कि मंत्रालय से संबंधित कुछ आश्वासन संवेदनशील हैं, इसलिये इनके क्रियान्वयन हेतु ठोस प्रयास किये जाने की जरूरत है।

रिपोर्ट के अनुसार, मौखिक साक्ष्य के दौरान समिति ने अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय से संबंधित 23 आश्वासनों के लंबित होने की ओर प्रतिनिधियों का ध्यान आकृष्ट कराया। इसमें से 15 आश्वासन 15वीं लोकसभा से संबंधित हैं, छह आश्वासन 16वीं लोकसभा के हैं तथा दो आश्वासन 17वीं लोकसभा के हैं।

इसमें कहा गया है कि चूंकि 15वीं लोकसभा के आश्वासन बहुत पुराने थे और 13 वर्षों से अधिक समय से लंबित थे और इनको पूरा करने में अत्यधिक विलंब हुआ था, इसलिये समिति ने आश्वासनों के कार्यान्वयन के लिये मंत्रालय में आश्वासनों की निगरानी और आवधिक समीक्षा प्रक्रिया और प्रणाली की जांच की।

इस पर अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय के सचिव ने कहा, ‘‘ हम लगातार आश्वासनों की समीक्षा करते हैं। अधिकांश लंबित आश्वासन नीतिगत निर्णय से संबंधित हैं। जब भी कोई नीतिगत निर्णय लिया जाता है तब हम संबंधित मंत्रालयों/विभागों के साथ चर्चा करते हैं और उनसे लिखित में राय लेते हैं।’’

उन्होंने समिति को बताया कि विशेष रूप से समान अवसर आयोग जैसे आश्वासन कई वर्षो से लंबित हैं।

सचिव ने कहा ‘‘इसलिये हम समय समय पर विभिन्न मंत्रालयों से राय लेते हैं। कुछ कारणों से या मंत्रालयों में कुछ बिन्दुओं पर पुनर्विचार करने के कारण भी अलग अलग राय प्राप्त हुई है।’’

लंबित आश्वासनों को पूरा करने के लिये मंत्रालय द्वारा अपनायी जा रही रणनीति के बारे में समिति द्वारा पूछने पर मंत्रालय के सचिव ने बताया ‘‘हमारे मंत्रालय से संबंधित मामलों पर हम तत्काल कार्रवाई करते हैं।’’

रिपोर्ट के अनुसार, समिति ने कहा कि वह समझती है कि नीतिगत मामलों या विवादास्पद प्रकृति के मामलों से जुड़े आश्वासनों या ऐसे आश्वासन जिसमें अंतर मंत्रालयी या अंतर विभागीय समन्वय की जरूरत होती है, उनके कार्यान्वयन में अधिक समय लग सकता है। हालांकि संसदीय दायित्वों से जुड़े आश्वासनों को पूरा करने के लिये सतत प्रयास किये जाने की जरूरत है।

समिति ने उम्मीद जताई कि मंत्रालय इस दिशा में ठोस प्रयास करेगा और लंबित आश्वासनों पूरा करने के लिये संबंधित मंत्रालयों/विभागों/संगठनों के साथ अपना समन्वय बढ़ायेगा।

गौरतलब है कि संसदीय कार्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, पिछले वर्ष अगस्त माह तक लोकसभा में सरकार द्वारा दिये गए आश्वासनों में से 1005 और राज्यसभा में 636 आश्वासन लंबित थे।

इस अवधि में निचले सदन में 10 वर्ष से अधिक समय पुराने 38 सरकारी आश्वासन लंबित हैं जबकि पांच वर्ष से अधिक पुराने 146 तथा 3 वर्ष ज्यादा समय से 185 आश्वासन लंबित हैं।

अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय से संबंधित एक महत्वपूर्ण आश्वासन सांसद सुप्रिया सुले और मनोहर तिर्की द्वारा 17 दिसंबर 2009 को समान अवसर आयोग के गठन से संबंधित विधेयक को लेकर पूछे गए प्रश्न के उत्तर से जुड़ा है।

इस प्रश्न के जवाब में तत्कालीन अल्पसंख्यक कार्य मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा था कि समान अवसर आयोग गठित करने का विषय मंत्रालयों/विभागों के साथ अंतर मंत्रालयी विचार विमर्श की प्रक्रिया से गुजरा है। विधि एवं न्याय मंत्रालय के साथ प्रस्तावित विधेयक तैयार किया गया है और प्रस्ताव सरकार के समक्ष विचाराधीन है।

संसदीय परंपरा के तहत सरकारी आश्वासनों संबंधी समिति मंत्रियों द्वारा सभा में समय-समय पर दिए गए आश्वासनों, वादों आदि की जांच करती है और प्रतिवेदन प्रस्तुत करती है कि ऐसे आश्वासनों, वादों आदि को किस सीमा तक कार्यान्वित किया जा सकता है।

सभा में कोई आश्वासन दिए जाने के बाद उसे 3 महीने के अंदर पूरा करना अपेक्षित होता है। भारत सरकार के मंत्रालय या विभाग आश्वासनों को निर्धारित 3 महीने की अवधि के अंदर पूरा करने में असमर्थ रहने की स्थिति में समय विस्तार की मांग कर सकते हैं।

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