देश की खबरें | सिद्धरमैया ने अखबारी कागज पर कर छूट देने का अनुरोध किया

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने केंद्र सरकार से अखबारी कागज को माल एवं सेवा कर (जीएसटी) के दायरे से बाहर करने का अनुरोध किया है। वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने कहा कि कई नियामकीय नीतियों से प्रिंट मीडिया के संचालन एवं उसकी वित्तीय सेहत पर असर पड़ रहा है।

बेंगलुरू, 27 अप्रैल कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने केंद्र सरकार से अखबारी कागज को माल एवं सेवा कर (जीएसटी) के दायरे से बाहर करने का अनुरोध किया है। वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने कहा कि कई नियामकीय नीतियों से प्रिंट मीडिया के संचालन एवं उसकी वित्तीय सेहत पर असर पड़ रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेजे गये अपने पत्र में सिद्धरमैया ने लिखा, ‘‘मैं आप से अनुरोध करता हूं कि अखबारी कागज पर से जीएसटी को हटा दिया जाये। छपाई वाले कागज की खरीद के समय रजिस्ट्रार ऑफ न्यूजपेपर्स ऑफ इंडिया (आरएनआई) द्वारा पंजीकृत और अपंजीकृत एजेंसियों के बीच अंतर करें और सेल्यूलोज के रेशे से गुणवत्तापूर्ण अखबारी कागज बनाने वाली इकाइयों को सहूलियत प्रदान करें। ’’

सिद्धरमैया के मुताबिक जीएसटी लागू होने से पहले आरएनआई पंजीकृत एजेंसियों के लिए अखबारी कागज पर कर तीन प्रतिशत था और जीएसटी के तहत इसे बढ़ाकर पांच प्रतिशत कर दिया गया था। उन्होंने कहा कि यह अखबारी कागज पर कर में 68 प्रतिशत की बढ़ोतरी है।

पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि अपंजीकृत एजेंसियों के लिए जीएसटी 12 प्रतिशत है। लेकिन खरीद के समय पंजीकृत और अपंजीकृत एजेंसियों के बीच अंतर करने के लिए कोई तंत्र नहीं होने से अपंजीकृत एजेंसियां ​​12 प्रतिशत के बजाय पांच प्रतिशत पर छपाई वाले कागज खरीद रही हैं। इससे पंजीकृत एजेंसियों के लिए कागजात की कमी हो जा रही है।

पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि इस कमी के कारण कागजों की छपाई की लागत भी बढ़ गई है। उन्होंने कहा कि सरकार को पंजीकृत एजेंसियों के लिए जीएसटी दरों को कम करने और पंजीकृत और अपंजीकृत एजेंसियों की पहचान करने के लिए एक अलग तंत्र बनाने पर विचार करना होगा।

कर्नाटक विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सिद्धरमैया ने कहा, ‘‘महामारी से पहले एक टन आयातित छपाई वाले कागज की कीमत 23,000 रुपये थी, जो अब लगभग 55,000 रुपये से 60,000 रुपये तक पहुंच गई है।’’ उन्होंने कहा कि देश में लगभग 56 प्रतिशत कागज का आयात किया गया था और 44 प्रतिशत का निर्माण घरेलू स्तर पर किया गया था।

मौजूदा यूक्रेन-रूस संघर्ष का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि चूंकि अधिकांश आयात रूस और यूरोप से होता है, इसलिए युद्ध के कारण व्यवधान नाटकीय रूप से काफी बढ़ गया है। उन्होंने कहा कि पिछले दो वर्षों में छपाई वाले कागज की लागत दोगुनी हो गई है और जीएसटी में वृद्धि के कारण प्रिंट मीडिया पर अखबारों की छपाई जारी रखने को लेकर आर्थिक बोझ काफी बढ़ गया है।

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