नयी दिल्ली, 11 अगस्त भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी)-मद्रास के नेतृत्व में आठ देशों के अनुसंधानकर्ताओं ने जलवायु पर कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों के प्रभाव का पता लगाने के लिए एक अध्ययन किया है, जिसमें यह जानने की कोशिश की गई है कि कैसे बिजली संयंत्रों से निकलने वाले गैसीय उत्सर्जन से बादलों के निर्माण में बदलाव आता है।
अधिकारियों ने कहा कि भारत में कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान किया गया अध्ययन एयरोसोल लक्षणों और बादल निर्माण पर मानव-संबंधित उत्सर्जन में कमी के परिणामों की अंतर्दृष्टि प्रदान करता है, जिससे जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में कोयला आधारित बिजली संयंत्र उत्सर्जन के निहितार्थ की समझ को आगे बढ़ाया जा सकता है।
अध्ययन के निष्कर्ष प्रतिष्ठित पत्रिका ‘क्लाइमेट एंड एटमॉस्फेरिक साइंस’ में प्रकाशित हुए हैं। अनुसंधान टीम में भारत, चीन, अमेरिका, जर्मनी, ब्रिटेन, मेक्सिको, इटली, सऊदी अरब और फिनलैंड के 27 अनुसंधानकर्ता शामिल थे।
अनुसंधानकर्ताओं ने कोविड लॉकडाउन के दौरान चेन्नई से लगभग 200 किलोमीटर दक्षिण में स्थित नेवेली कोयला आधारित बिजली संयंत्र से एयरोसोल वृद्धि और बादल निर्माण से संबंधित अवयवों पर उत्सर्जन के प्रभाव का अध्ययन किया।
यह अध्ययन पीएम 2.5 कणों को नियंत्रित करने से संबंधित नीतियां तैयार करने के लिए महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अंतर्दृष्टि प्रदान कर सकता है।
आईआईटी-मद्रास में वायुमंडलीय विज्ञान केंद्र के समन्वयक सचिन एस गुन्थे ने कहा, ‘‘हमारा अध्ययन अपेक्षाकृत स्वच्छ परिस्थितियों में कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्र से एसओ2 उत्सर्जन के कारण नये कणों के निर्माण और वृद्धि के प्रति बादल बनाने वाले एयरोसोल कणों की संवेदनशीलता की जांच करने का एक दुर्लभ अवसर प्रदान करता है।’’
(यह सिंडिकेटेड न्यूज़ फीड से अनएडिटेड और ऑटो-जेनरेटेड स्टोरी है, ऐसी संभावना है कि लेटेस्टली स्टाफ द्वारा इसमें कोई बदलाव या एडिट नहीं किया गया है)













QuickLY