विदेश की खबरें | चंदन की लकड़ी है बेहद महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन, सांस्कृतिक कर्मकांड से दूर रखकर करें इसका संरक्षण
श्रीलंका के प्रधानमंत्री दिनेश गुणवर्धने

लंदन, 16 अप्रैल (द कन्वरसेशन) प्राकृतिक रूप से महत्वपूर्ण किसी स्थान या वस्तु के संरक्षण और सुरक्षा के लिए यह जरूरी है कि लोग इनका सीमित इस्तेमाल करें।

जब प्राकृतिक संसाधन सांस्कृतिक, धार्मिक या आध्यात्मिक कर्मकांड से जुड़ जाते हैं, तो जैविक और सांस्कृतिक विविधता दोनों को ध्यान में रखते हुए उनके संरक्षण की जरूरत होती है।

भारतीय या कहें कि लाल चंदन की लकड़ी (रेड सेंडलवुड) और इससे निकला तेल बेहद कीमती होता है। यह आर्थिक और सांस्कृतिक मूल्यों के लिहाज से महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है।

इस सुगंधित लकड़ी का उपयोग नक्काशी, फर्नीचर और इमारतों में किया जाता है, जबकि इससे निकलने वाले तेल से इत्र, अगरबत्ती और दवाइयां बनती हैं।

‘द कन्वरसेशन वीकली’ के इस एपिसोड में, हम एक रसायनविद, पर्यावरण इतिहासकार और पर्यावरण व समाज के शोधकर्ता से बात करते हैं कि चंदन जैसे प्राकृतिक संसाधनों के स्थायी प्रबंधन के लिए सांस्कृतिक संरक्षण क्यों महत्वपूर्ण है।

डैनी हेत्तियाराच्ची पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया विश्वविद्यालय में एक रसायनविद और सहायक शोधकर्ता हैं।

हेत्तियाराच्ची चंदन की खेती और इसके उपयोगों पर शोध करते हैं। चंदन न केवल एशियाई, अफ्रीकी और मध्य पूर्वी देशों में सांस्कृतिक प्रथाओं में इत्र, अगरबत्ती या दवा के रूप में ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण है, बल्कि इसके गुणों के कारण पश्चिमी देशों में इसकी लोकप्रियता बढ़ी है। पश्चिम में भी इससे बने इत्र की काफी मांग है।

हेत्तियाराच्ची कहते हैं, “इत्र बनाने में चंदन काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पश्चिमी या आधुनिक इत्र शैलियों में बनाए गए कुछ शुरुआती इत्रों में इसका इस्तेमाल मिलता है।”

इज्रा राशको अमेरिका में मोंटक्लेयर स्टेट यूनिवर्सिटी में पर्यावरण और दक्षिण एशियाई इतिहासकार हैं। उनके शोध में ऐतिहासिक पर्यावरण संरक्षण नीतियों पर विचार किया गया है। ये शोध संकटग्रस्त प्राकृतिक और सांस्कृतिक संसाधनों से संबंधित हैं।

राशको चंदन को एक प्राकृतिक संसाधन के रूप में वर्णित करती है जिसे अक्सर विभिन्न राजनीतिक और आर्थिक कारणों से विनियमित किया जाता है।

उन्होंने कहा, “1792 में मैसूर के शासक टीपू सुल्तान ने भारतीय चंदन को एक शाही पेड़ घोषित किया और इसे एक संरक्षित प्रजाति के रूप में नामित किया।”

बाद में, ब्रिटिश औपनिवेशिक ताकतों ने भारतीय चंदन को अपने संरक्षण में रखा, जबकि उन्होंने चीन के साथ व्यापार के लिए पेड़ की कटाई की।

राशको बताती हैं, "प्रारंभिक औपनिवेशिक विश्व इतिहास में चंदन की लकड़ी को एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान मिला क्योंकि चंदन कुछेक वस्तुओं में से एक थी, जिसका इस्तेमाल चीनी लोग सोने और चांदी के व्यापार में करने के इच्छुक थे।”

चंदन की लकड़ी की मांग को पूरा करने के लिए इसकी अत्यधिक कटाई होने के कारण भारत में बहुत कम पेड़ बचे हैं क्योंकि यह एक ‘हेमीपरसिटिक’ पेड़ है और इसकी खेती करना हाल तक चुनौतीपूर्ण रहा है। एक फंगस के कारण भी चंदन की उपलब्धता की खेती जटिल बनी हुई है, जिससे संक्रामक रोग पैदा होते हैं और इसके कारण वनों की कटाई करनी पड़ती है। एक तथ्य यह भी है कि एक पेड़ को तैयार होने में 20 साल तक का समय लग सकता है।

पुनर्जागरण काल ​​से प्रकृति संस्कृति से अलग हो गई, और पूरे औद्योगिक युग में भी ऐसा ही रहा।

ब्रिटेन के एसेक्स विश्वविद्यालय में पर्यावरण एवं समाजशास्त्र के प्रोफेसर जूल्स प्रिटी मानव-पर्यावरण संबंधों का अध्ययन करते हैं।

वह कहते हैं, "प्रकृति और संस्कृति एक ही चीज हैं। वे तब तक मानव इतिहास में हमेशा एक ही चीज रहे हैं जब तक कि कृषि, शहरों, आधुनिक अर्थव्यवस्थाओं आदि के साथ प्रकृति और लोगों (साथ आए) का एक प्रकार का अलगाव नहीं हुआ।”

प्रिटी चंदन की लकड़ी को एक आदर्श उदाहरण के रूप में वर्णित करते है जिसके माध्यम से प्रकृति और संस्कृति के बीच संबंधों का पता लगाया जा सकता है। वह कहते हैं, “बहुत से लोग चंदन को महत्व देते हैं। यह संस्कृतियों में बारीकी से जुड़ा हुआ है और लोगों को लगता है कि यह उनके जीवन का एक केंद्रीय हिस्सा है।”

प्रिटी का मानना ​​है कि चंदन के प्रबंधन से स्थिरता के बारे में सबक सीखा जा सकता है।

उन्होंने कहा, "उदाहरण के लिए, दक्षिण भारत के कई समुदायों के बीच यह एक पवित्र पेड़ है, और इसलिए इसकी देखभाल एक विशेष प्रकार से की जाती है, जो हमें स्थिरता के बारे में नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर देती है।”

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