जरुरी जानकारी | किसानों और उद्योगों के नजरिये से कृषि वानिकी पर पुन: गौर करें: सरकार

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नयी दिल्ली, 15 जून कृषि सचिव संजय अग्रवाल के अनुसार कृषि वानिकी के साथ साथ कृषि वानिकी की पुरानी धारणा पर, जिसका अर्थ केवल इमारती लकड़ी वाले वृक्ष की प्रजातियां हैं, किसानों और उद्योग जगत के दृष्टिकोण से नए सिरे से गौर करने की जरूरत है।

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उन्होंने इस विषय पर एक आन लाइन परिचर्चा का उद्घाटन करते हुए कहा, ‘‘चूंकि इमारती लकड़ी के पेड़ों की परिपक्वता अवधि लंबी होती है, इसलिए इनसे किसानों को प्रतिफल काफी देर से मिलता है। हालांकि, कई ऐसे उभरते क्षेत्र हैं जो किसानों को त्वरित रिटर्न सुनिश्चित करने के साथ-साथ उद्योग जगत की आवश्यकताओं को भी पूरा करेंगे जिनमें औषधीय एवं सुगंधित पौधे, रेशम, लाह, कागज व लुगदी, जैव ईंधनों के उत्पादन के लिए पेड़ जनित तेल बीज या ति‍लहन, इत्‍यादि शामिल हैं।

एक सरकारी विज्ञप्ति के अनुसार अग्रवाल ने संबोधन में कृषि वानिकी के कई उपयोगों पर प्रकाश डाला जिनमें किसानों के लिए अतिरिक्त आय, विशेषकर महिला स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) के लिए आजीविका के साधन के रूप में नर्सरी, हरा चारा, फलीदार प्रजातियों के रोपण कर उर्वरकों की आवश्यकता को कम करना, जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए कार्बन का पृथक्करण (अलग करना), इत्‍यादि शामिल हैं। किसानों का कल्याण सुनिश्चित करने हेतु उन्‍हें अधिकतम पारिश्रमिक सुनिश्चित करने के लिए कृषि क्षेत्र में लागू कि‍ए गए विभिन्न सुधारों के बारे में विस्‍तार से बताया।

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उन्होंने 13 जून को आयोजित वेबिनार में कृषि वानिकी पर बोलते हुए कहा कि प्रधानमंत्री का ‘वोकल फॉर लोकल’ आह्वान कृषि वानिकी के लिए अत्‍यंत प्रासंगिक है।

बयान के अनुसार, कृषि वानिकी कुछ महत्वपूर्ण वस्तुओं में आयात निर्भरता को कम करने के लिए उद्योग जगत को कच्चे माल की आपूर्ति बढ़ाने में अहम योगदान दे सकती है। औषधीय पौधों को बढ़ावा देना ‘आत्‍मनिर्भर भारत’ का एक प्रमुख घटक है और पेड़ आधारित एवं जैविक औषधीय उपज के बीच परस्पर सम्मिश्रण होने की काफी गुंजाइश है।

सचिव ने किसानों को अधिकतम लाभ सुनिश्चित करनके लिए कृषि क्षेत्र में किये गये हालिया सुधारों के बारे में बताया जिसमें 1.63 लाख करोड़ रुपये का परिव्यय, सही मायनों में राष्ट्रीय बाजार स्थापित करने के लिए कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन व सुविधा) अध्यादेश 2020 लाना और अंतर-राज्य व्यापार बाधाओं को दूर करके एवं कृषि उपज की ई-ट्रेडिंग प्रदान करके किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए पसंदीदा बाजार चुनने का विकल्प देना शामिल हैं।

कागज उद्योग को कच्चे माल की आपूर्ति में बाधाओं, जिसकी भरपाई आयात द्वारा की जा रही है, से संबंधित मुद्दों पर चर्चा की गई। गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री उत्पादकता और इस तरह से किसानों को मिलने वाले रिटर्न में वृद्धि करने का मुख्‍य आधार है। प्रस्तुति के दौरान सही किस्मों की प्रतिरूप (क्लोनल) रोपण सामग्री के विशेष महत्व को रेखांकित किया गया, जो उद्योग जगत की आवश्यकता के अनुरूप भी होगा। केंद्रीय रेशम बोर्ड ने उन किसानों की सहायता करने का आश्वासन दिया जो विभिन्‍न रेशम मेजबान प्रजातियों का रोपण करते हैं। दरअसल, ये प्रजातियां औसतन 3-4 साल में ही रिटर्न देना शुरू कर देंगी, इसलिए ये कृषि वानिकी प्रणालियों के लिए आदर्श हैं।

वेबिनार में कहा गया कि गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री उत्पादकता और इस तरह से किसानों को मिलने वाले लाभ में वृद्धि करने का मुख्‍य आधार है। प्रस्तुति के दौरान सही किस्मों की प्रतिरूप (क्लोनल) रोपण सामग्री के विशेष महत्व को रेखांकित किया गया, जो उद्योग जगत की आवश्यकता के अनुरूप भी होगा।

केंद्रीय रेशम बोर्ड ने उन किसानों की सहायता करने का आश्वासन दिया जो विभिन्‍न रेशम मेजबान प्रजातियों का रोपण करते हैं। दरअसल, ये प्रजातियां औसतन 3-4 साल में ही रिटर्न देना शुरू कर देंगी, इसलिए ये कृषि वानिकी प्रणालियों के लिए आदर्श हैं।

वेबिनार में केंद्रीय रेशम बोर्ड के सीईओ रजित रंजन ओखंडियार, राष्ट्रीय औषधीय पौध बोर्ड के सीईओ जेएलएन शास्त्री, भारतीय पेपर्स मैनुफैक्चरर्स एसोसिएशन के महासचिव रोहित पंडित तथा आईटीसी लिमिटेड के पूर्व उपाध्यक्ष एच के कुलकर्णी उपस्थित थे।

भारत वर्ष 2014 में ‘राष्ट्रीय कृषि वानिकी नीति’ तैयार करने वाला दुनिया का पहला देश बन गया। इसके बाद उठाए गए अहम कदम के तहत ‘कृषि वानिकी के लिए उप मिशन’ वर्ष 2015 में शुरू किया गया, ताकि किसानों को फसलों के साथ-साथ वृक्षारोपण के लिए भी प्रोत्साहित करने में राज्यों की सहायता की जा सके।

कृषि जलवायु क्षेत्र-वार कृषि वानिकी मॉडलों को आईसीएआर और आईसीएफआरई सहित विभिन्‍न अनुसंधान संस्थानों द्वारा विकसित किया गया है। यह योजना वर्तमान में देश के 21 राज्यों में लागू की जा रही है।

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