देश की खबरें | शांति के दूत: दलाई लामा 90 वर्ष के हुए

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धर्मशाला (हिमाचल प्रदेश), छह जुलाई ल्हामो धोंडुप की उम्र दो साल भी नहीं हुई थी, जब वह अपना सामान एक बैग में पैक करता था जैसे कि वह किसी लंबी यात्रा पर निकलने वाला हो और कहता था “मैं ल्हासा जा रहा हूं।”

पूर्वोत्तर तिब्बत के छोटे से गांव तकत्सेर में, 1930 के दशक के अंत में विद्वानों के एक समूह के धोंडुप के दरवाजे पर आने तक उनके किसान माता-पिता को यह एक बच्चे के अजीबोगरीब खेल से ज़्यादा कुछ नहीं लगा। बौद्ध भिक्षुओं को कुछ जांच के बाद यह पहचानने में ज़्यादा समय नहीं लगा कि यह बच्चा 13वें दलाई लामा का पुनर्जन्म है।

इसके तुरंत बाद, वह युवा लड़का घर से दूर एक लंबी यात्रा पर निकल पड़ा, जो जीवन भर चली और उसे एक बच्चे से लाखों लोगों के आध्यात्मिक नेता तक ले गई। आज वह 90 वर्ष के 14वें दलाई लामा हैं, जो दुनिया में सबसे ज्यादा पहचाने जाने वाले चेहरों में से एक हैं।

दलाई लामा का जन्म आज ही के दिन 1935 में हुआ था, उस तिब्बत में जो अपने पड़ोसी चीन के खिलाफ अपनी संप्रभुता बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा था और अंततः 1951 में इसे खो बैठा। उनका नाम बाद में तेनजिन ग्यात्सो रखा गया।

हजारों लोग इस छोटे से पर्वतीय शहर में इस दिन को मनाने के लिए एकत्र होते हैं। यह शहर अब निर्वासित तिब्बती सरकार का मुख्यालय है।

दलाई लामा नामक संस्था के 700 वर्षों के इतिहास में संभवतः सबसे लोकप्रिय दलाई लामा ने बौद्ध धर्म के सिद्धांतों को जीवित और समृद्ध बनाए रखा है तथा अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए निरंतर वैचारिक संघर्ष भी जारी रखा है।

धार्मिक सद्भाव, अहिंसा और लोकतंत्र के अलावा, वह एलजीबीटीक्यू अधिकारों, महिला अधिकारों के समर्थक रहे हैं और उन्होंने पर्यावरण समस्याओं के साथ-साथ रोहिंग्या मुसलमानों के लिए भी चिंता व्यक्त की है।

तिब्बती बौद्धों का मानना ​​है कि दलाई लामा, अवलोकितेश्वर या चेनरेज़िग, करुणा के बोधिसत्व और तिब्बत के संरक्षक संत के अवतार हैं।

तेनज़िन ग्यात्सो ने छह साल की उम्र में अपनी मठवासी शिक्षा शुरू की, जो नालंदा परंपरा से ली गई थी और इसमें तर्क, ललित कला, संस्कृत व्याकरण, चिकित्सा और बौद्ध दर्शन का अध्ययन शामिल था। दलाई लामा की वेबसाइट के अनुसार, उन्होंने कविता, नाटक, ज्योतिष, रचना और समानार्थी शब्दों का भी अध्ययन किया।

युवा भिक्षु के लिए यह यात्रा शुरू से ही खतरों से भरी थी। नवंबर 1950 में जब चीनी सैनिकों के ल्हासा की ओर बढ़ने की खबर आई, तो दलाई लामा को पूरी लौकिक शक्ति देने की मांग की गई, जबकि परंपरा के अनुसार उन्हें ऐसा करने की आवश्यकता नहीं थी।

दलाई लामा ने अपनी आत्मकथा ‘‘फ्रीडम इन एग्ज़ाइल’’ में लिखा है, "इस बारे में दो विचारधाराएं थीं: एक विचारधारा में वे लोग थे जो इस संकट में नेतृत्व के लिए मेरी ओर देखते थे; दूसरी विचारधारा में वे लोग थे जो महसूस करते थे कि मैं इस तरह की ज़िम्मेदारी के लिए बहुत छोटा हूं। मैं दूसरे समूह से सहमत था, लेकिन दुर्भाग्य से मुझसे सलाह नहीं ली गई।"

पंद्रह साल की उम्र में तेनजिन ग्यात्सो तिब्बत के शासक बन गए, जो चीन के साथ युद्ध के कगार पर पहुंच चुका था। तिब्बत की आबादी करीब साठ लाख थी। अगला दशक राजनीतिक अशांति का था।

चीन ने 23 मई, 1951 को सत्रह सूत्री समझौते के तहत तिब्बत पर कब्ज़ा कर लिया था, लेकिन उसने दलाई लामा को देश पर आंतरिक रूप से शासन करने की अनुमति दी।

मार्च 1959 में, दलाई लामा के समर्थन में ल्हासा में प्रदर्शन शुरू हो गए और 1951 में चीन द्वारा तिब्बत पर कब्ज़ा करने के फैसले को वापस लेने की मांग की गई। इस परिस्थिति के कारण दलाई लामा को भारत भागना पड़ा, जहां उन्हें जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा राजनीतिक शरण दी गई और बाद में हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में मैक्लॉडगंज से निर्वासित तिब्बती सरकार चलाने की अनुमति दी गई।

छह दशक से भी अधिक समय बाद, वह इस आंदोलन का सौम्य चेहरा हैं, एक धार्मिक नेता जो अपने व्यक्तित्व में आध्यात्मिकता और शासन कला के तत्वों को जोड़ता है।

हालांकि, उन्होंने अपने सार्वजनिक संबोधनों में सभी के लिए शांतिपूर्ण अस्तित्व के लिए अपना रुख बनाए रखा। दलाई लामा ने चीन के प्रति भी उदार दृष्टिकोण का सुझाव दिया है।

उन्होंने तिब्बत मुद्दे के समाधान के लिए अहिंसक रणनीति की वकालत की है तथा पूर्ण स्वतंत्रता की मांग करने के बजाय चीनी संविधान के ढांचे के भीतर तिब्बतियों के लिए वास्तविक स्वायत्तता पर जोर दिया है।

मार्च 2008 में, जब तिब्बत के विभिन्न क्षेत्रों में तिब्बतियों के प्रति चीनी सरकार के कथित व्यवहार और उत्पीड़न के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए, तो दलाई लामा ने दुनिया भर के चीनी लोगों से तिब्बत के अंदर क्रूर दमन को समाप्त करने के उनके आह्वान का समर्थन करने की अपील की।

उन्होंने अपनी नवीनतम आत्मकथा "वॉयस फॉर द वॉइसलेस" में लिखा है "तिब्बतियों और चीनियों के बीच बढ़ती दुश्मनी के खतरे से चिंतित होकर, मैंने दुनिया के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले तिब्बतियों को सिनो-तिब्बती मैत्री संघ स्थापित करने का सुझाव दिया। ऐसे संघ एक ही शहर में रहने वाले चीनी लोगों को तिब्बती त्योहारों और समारोहों में आमंत्रित कर सकते हैं और साथ में भोजन कर सकते हैं।’’

दलाई लामा के नेतृत्व में निर्वासित तिब्बतियों ने 2008 में चीन को “तिब्बती लोगों के लिए वास्तविक स्वायत्तता पर ज्ञापन” नामक एक औपचारिक दस्तावेज भी प्रस्तुत किया था।

दलाई लामा ने लिखा, "हमने अलगाव या स्वतंत्रता की मांग न करने, बल्कि चीन के संविधान में स्वायत्तता के सिद्धांतों के अनुरूप वास्तविक स्वायत्तता की मांग के माध्यम से तिब्बती मुद्दे का समाधान करने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।"

वर्षों से दलाई लामा यह कहते रहे हैं कि तिब्बत की स्वायत्तता के वास्तविक होने के लिए इसमें “स्थानीय स्तर पर स्वशासन के अधिकार को, चीन के भीतर शामिल किया जाना आवश्यक है।”

दलाई लामा ने 2017 में फिर से ‘इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स’ द्वारा दिल्ली में आयोजित एक संवादात्मक सत्र में तिब्बती मुद्दे पर अपना दृष्टिकोण दोहराया। तिब्बती आध्यात्मिक नेता ने कहा था, "अतीत बीत चुका है। हमें भविष्य पर ध्यान देना होगा। हम स्वतंत्रता नहीं चाहते हैं... हम चीन के साथ रहना चाहते हैं। हम और अधिक विकास चाहते हैं।"

मई 2011 में, दलाई लामा ने अपने राजनीतिक पद से पूर्ण सेवानिवृत्ति की घोषणा की, जिससे लोकतांत्रिक रूप से नियुक्त नेतृत्व के लिए रास्ता खुला। बौद्ध नेता को 1989 में “अपने लोगों की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के लिए सहिष्णुता और आपसी सम्मान पर आधारित शांतिपूर्ण समाधान की वकालत करने के लिए” नोबेल शांति पुरस्कार मिला।

उन्हें सामुदायिक नेतृत्व के लिए 1959 में रेमन मैगसायसाय पुरस्कार और 2007 में अमेरिकी कांग्रेसनल गोल्ड मेडल से भी सम्मानित किया गया।

अपने उत्तराधिकारी के बारे में अटकलों पर विराम लगाते हुए उन्होंने इस सप्ताह स्पष्ट रूप से कहा कि दलाई लामा की संस्था जारी रहेगी और केवल गादेन फोदरंग ट्रस्ट को ही उनके भावी "पुनर्जन्म" को मान्यता देने का अधिकार होगा। उन्होंने यह भी कहा कि कोई भी अन्य व्यक्ति उनकी उत्तराधिकार योजना में हस्तक्षेप नहीं कर सकता।

दलाई लामा की संस्था से संबंधित मामलों के अवलोकन के लिए 2015 में उनके गादेन फोदरंग ट्रस्ट की स्थापना की गई थी।

चीन ने दलाई लामा की उत्तराधिकार योजना को खारिज करते हुए इस पर जोर दिया कि किसी भी भावी उत्तराधिकारी को उसकी मंजूरी लेनी होगी।

इस तरह, चीन की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी के साथ तिब्बती बौद्ध के दशकों पुराने संघर्ष में एक नया अध्याय जुड़ गया है।

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