देश की खबरें | लूटपाट के आरोप में व्यक्ति को बरी करने, नुकसान पहुंचाने के आरोप में दोषी ठहराने का आदेश अनुचित: उच्च न्यायालय

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. दिल्ली उच्च न्यायालय ने सत्र अदालत के एक आदेश को शुक्रवार को ‘‘अनुचित’’ और ‘‘अव्यवहार्य’’ करार दिया जिसमें एक व्यक्ति को हथियार का इस्तेमाल कर लूटपाट के प्रयास के आरोप में बरी कर दिया गया, लेकिन शिकायतकर्ता के घायल होने की बात साबित न होने के बावजूद आरोपी को इस मामले में दोषी ठहरा दिया गया था।

एनडीआरएफ/प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credits: ANI)

नयी दिल्ली, 16 अक्टूबर दिल्ली उच्च न्यायालय ने सत्र अदालत के एक आदेश को शुक्रवार को ‘‘अनुचित’’ और ‘‘अव्यवहार्य’’ करार दिया जिसमें एक व्यक्ति को हथियार का इस्तेमाल कर लूटपाट के प्रयास के आरोप में बरी कर दिया गया, लेकिन शिकायतकर्ता के घायल होने की बात साबित न होने के बावजूद आरोपी को इस मामले में दोषी ठहरा दिया गया था।

न्यायमूर्ति सी हरिशंकर ने कहा कि सुनवाई करने वाले न्यायाधीश की बड़ी जिम्मेदारी होती है और उसे सभी पहलुओं पर विचार करना चाहिए।

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न्यायमूर्ति शंकर ने कहा कि वह यह कहने को विवश हैं कि दोषी ठहराने का आदेश अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा निभाए जाने वाले कर्तव्य के अनुरूप नहीं है।

उच्च न्यायालय ने अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश की निन्दा करते हुए कहा कि संबंधित फैसले में सुनाई गईं चीजें अव्यवहार्य हैं जिसमें आरोपी को भादंसं की धारा 394 के तहत शिकायतकर्ता को लूटपाट करते समय जानबूझकर नुकसान पहुंचाने का दोषी ठहराया गया और चार साल कैद की सजा सुनाई गई।

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अदालत ने यह भी कहा, ‘‘यह प्रथम दृष्टया स्पष्ट है कि मामला आवेदक (दोषी) की सजा निलंबित किए जाने योग्य है।’’

इसने दोषसिद्धि के खिलाफ आरोपी की अपील लंबित रहने तक सजा निलंबित कर दी।

उच्च न्यायालय ने दोषी को राहत प्रदान करते हुए कहा कि अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने एक तरफ तो यह कहा कि शिकायतकर्ता को कथित तौर पर पहुंची चोट की बात साबित नहीं हुई, जिसके लिए उन्होंने इस तथ्य पर भरोसा किया कि अपराध में इस्तेमाल किया गया हथियार बरामद नहीं हुआ, और उसे लूटपाट के प्रयास के आरोप से बरी कर दिया, लेकिन दूसरी तरफ उसे नुकसान पहुंचाने का दोषी ठहरा दिया।

अदालत ने अतिरिक्त लोक अभियोजक संजीव सभरवाल के उस तर्क को भी खारिज कर दिया कि दोषी की सजा को निलंबित नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि वह अन्य अपराधों में भी शामिल था।

इसने कहा, ‘‘यदि दोषसिद्धि का आदेश अपने आप में अव्यवहार्य है तो अदालत सजा निलंबित करने की बात से सिर्फ इस आधार पर इनकार नहीं कर सकती कि आरोपी अन्य मामलों में भी शामिल है।’’

उच्च न्यायालय ने कहा कि अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने एक बार जब यह मान लिया कि आरोपी पर शिकायतकर्ता को चोट पहुंचाने का मामला साबित नहीं हुआ तो फिर भादंसं की धारा 394 के तहत उसकी दोषसिद्ध को व्यवहार्य नहीं माना जा सकता।

आरोपी पर शिकायतकर्ता का बैग छीनने और उसपर गोली चलाने का आरोप था।

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