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जरुरी जानकारी | आयातित तेलों की लागत से सस्ते दाम पर बिकवाली से बीते सप्ताह तेल तिलहनों में गिरावट

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on Information at LatestLY हिन्दी. देश के बंदरगाह पर आयातित तेलों की लागत से कम दाम पर बिकवाली जारी रहने के बीच देश के तेल-तिलहन बाजारों में सभी खाद्य तेल तिलहनों के दाम हानि दर्शाते बंद हुए।

जरुरी जानकारी | आयातित तेलों की लागत से सस्ते दाम पर बिकवाली से बीते सप्ताह तेल तिलहनों में गिरावट

नयी दिल्ली, 26 नवंबर देश के बंदरगाह पर आयातित तेलों की लागत से कम दाम पर बिकवाली जारी रहने के बीच देश के तेल-तिलहन बाजारों में सभी खाद्य तेल तिलहनों के दाम हानि दर्शाते बंद हुए।

बाजार सूत्रों ने बताया कि बंदरगाहों पर आयातित तेलों का बेपड़ता कारोबार यानी लागत से कम दाम पर बिक्री जारी है। पिछले लगभग तीन महीनों से आयातक बैंकों में अपना ऋण साखपत्र (एलसी) घुमाते रहने की मजबूरी की वजह से आयातित खाद्यतेलों को लागत से 2-3 रुपये किलो कम दाम पर बेच रहे हैं। तीन महीनों से जारी इस बेपड़ता कारोबार की न तो तेल संगठनों ने और न ही सरकार ने कोई खोज खबर ली है।

इस निरंतर घाटे के सौदों के बीच आयातकों की आर्थिक दशा बिगड़ चुकी है। उनके पास इतना भी पैसा नहीं बचा कि वह आयातित खाद्यतेलों का स्टॉक जमा रख सकें और लाभ मिलने पर अपने स्टॉक को खपायें। बैंकों में अपने ऋण साख पत्र (लेटर आफ क्रेडिट या एलसी) को चलाते रहने की मजबूरी की वजह से आयातित तेल सस्ते में ही बंदरगाहों पर बेचा जा रहा है।

उन्होंने कहा कि इसके अलावा सरसों, सोयाबीन, कपास और मूंगफली जैसे तिलहनों की मंडियों में आवक कम हो रही है। मंडियों में तो सरसों, मूंगफली और सूरजमुखी तो न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से भी कम दाम पर बिक रहे हैं। माल होने के बावजूद पेराई का काम बेपड़ता होने यानी पेराई के बाद बेचने में नुकसान होने के कारण लगभग 60-70 प्रतिशत तेल पेराई की छोटी मिलें बंद हो चुकी हैं। बंदरगाहों पर भी साफ्ट तेलों का स्टॉक कम है और पाइपलाईन खाली है। दिसंबर में काफी संख्या में शादियों और जाड़े की मांग होगी। साफ्ट आयल का आयात भी घट रहा है। ऐसे में आने वाली मांग को पूरा करना एक गंभीर चुनौती बन सकता हे।

सूत्रों ने कहा कि जो इंतजाम पहले से किया जाना चाहिये उसकी ओर किसी के द्वारा ध्यान नहीं दिया जा रहा है। अगर नरम तेलों की निकट भविष्य में कोई दिक्कत आती है तो उसकी जवाबदेही किसकी होगी ?

उन्होंने कहा कि सरकार के आंकड़ों से पता चलता है कि पहले के मुकाबले मूंगफली और सूरजमुखी जैसे तिलहनों की बुआई का रकबा कम हुआ है। पिछले साल 24 नवंबर तक मूंगफली की बिजाई 2.7 लाख हेक्टेयर में हुई थी और इस बार मूंगफली के बिजाई का रकबा 1.80 लाख हेक्टेयर ही है।

इसी प्रकार पिछले साल सूरजमुखी 41,000 हेक्टेयर में बोई गई थी लेकिन इस बार इसकी बिजाई का रकबा 37,000 हेक्टेयर ही है। खरीफ मौसम में सूरजमुखी की बिजाई 66 प्रतिशत कम हुई थी और रबी में बिजाई के रकबे में 10 प्रतिशत की कमी आई है।

उन्होंने कहा कि यह परेशानी की बात है क्योंकि बढ़ती आबादी के साथ साल दर साल खाद्यतेलों की मांग भी लगभग 10 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। ऐसे में तिलहन बुवाई का रकबा बढ़ने के बजाय घटना चिंताजनक है। मंडियों में कपास की आवक कम है और इसके खेती के रकबे में भी कमी आई है। ऐसे में कपास का उत्पादन घटा तो कपास मिलें तो रुई आयात कर सकती हैं पर देश की जिनिंग मिलें क्या करेंगी ?

सूत्रों ने कहा कि कपड़ा, पाल्ट्री और दवा जैसे क्षेत्रों के संगठन सरकार के समक्ष अपनी मांगे उठाकर उसके लिए दवाब बनाकर अक्सर अपनी मांगें मनवा लेते हैं पर तेल संगठन इस जिम्मेदारी की कसौटी पर खरा नहीं उतरता। बंदरगाहों पर तीन महीने से आयातित तेलों का बेपड़ता कारोबार हो रहा है और तेल संगठनों ने यह बात शायद ही सरकार को बताकर इसके निदान की मांग की हो।

देश में तिलहनों का रकबा घट रहा हो, आयातित तेल बेपड़ता बेचा जा रहा हो, तेल मिलों की बुरी हालत हो, तिलहन किसानों की माल ना खपने और एमएसपी ना मिलने की बेहाली हो, सॉफ्ट आयल का आयात कम हो रहा हो और जाड़े की बढ़ने वाली मांग को कहां से पूरा किया जायेगा, इन सब बातों को सरकार के सामने तेल संगठनों के अलावा किससे उठाये जाने की अपेक्षा की जानी चाहिये ?

उन्होंने कहा कि संभवत: खाद्यतेलों की हालत जब ‘प्याज’ और ‘टमाटर’ वाली (बेइंतहा महंगा) होने पर सभी अचानक नींद से जागें लेकिन आगे ऐसी किसी समस्या की जाबदेही किसकी होगी, इस बात को अभी से तय कर लेना चाहिये।

पिछले सप्ताहांत के मुकाबले बीते सप्ताह सरसों दाने का थोक भाव 100 रुपये घटकर 5,650-5,700 रुपये प्रति क्विंटल पर बंद हुआ। सरसों दादरी तेल का भाव 250 रुपये घटकर 10,500 रुपये प्रति क्विंटल पर बंद हुआ। सरसों पक्की और कच्ची घानी तेल का भाव क्रमश: 40-40 रुपये की हानि दर्शाता क्रमश: 1,785-1,880 रुपये और 1,785-1,895 रुपये टिन (15 किलो) पर बंद हुआ। समीक्षाधीन सप्ताह में सोयाबीन दाने और लूज का भाव क्रमश: 115-115 रुपये की हानि के साथ क्रमश: 5,260-5,310 रुपये प्रति क्विंटल और 5,060-5,110 रुपये प्रति क्विंटल पर बंद हुआ।

इसी तरह सोयाबीन दिल्ली, सोयाबीन इंदौर और सोयाबीन डीगम तेल का भाव क्रमश: 125 रुपये, 125 रुपये और 50 रुपये के नुकसान के साथ क्रमश: 10,400 रुपये और 10,200 रुपये और 8,850 रुपये प्रति क्विंटल पर बंद हुआ।

समीक्षाधीन सप्ताह में मूंगफली तेल-तिलहन के दाम में भी हानि दर्ज हुई। मूंगफली तेल-तिलहन, मूंगफली गुजरात और मूंगफली साल्वेंट रिफाइंड तेल के भाव क्रमश: 50 रुपये, 100 रुपये और 25 रुपये की हानि के साथ क्रमश: 6,600-6,675 रुपये क्विंटल, 15,400 रुपये क्विंटल और 2,290-2,565 रुपये प्रति टिन पर बंद हुए।

समीक्षाधीन सप्ताह के दौरान कच्चे पाम तेल (सीपीओ) का भाव 225 रुपये के नुकसान के साथ 8,250 रुपये, पामोलीन दिल्ली का भाव 150 रुपये के नुकसान के साथ 9,150 रुपये प्रति क्विंटल तथा पामोलीन एक्स कांडला तेल का भाव 100 रुपये के नुकसान के साथ 8,400 रुपये प्रति क्विंटल पर बंद हुआ। गिरावट के आम रुख के अनुरूप समीक्षाधीन सप्ताह में बिनौला तेल का भाव भी 200 रुपये के नुकसान के साथ 8,950 रुपये प्रति क्विंटल पर बंद हुआ।

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(The above story first appeared on LatestLY on Nov 26, 2023 03:44 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).