देश की खबरें | एनजीटी ने गलत बयान के लिए याचिकाकर्ता पर 25,000 रुपये का जुर्माना लगाया

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नयी दिल्ली, 30 मई राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने एक याचिकाकर्ता को ‘ईमानदारी एवं पारदर्शिता’ के बगैर उसका दरवाजा खटखटाने और ‘‘समय बर्बाद’’ करने के लिए फटकार लगाई है और उस पर 25,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया है।

अधिकरण उस मामले से संबंधित अर्जी पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें याचिकाकर्ता विपिन कुमार सक्सेना पर उत्तर प्रदेश की धसान नदी में रेत खनन का आरोप लगाया गया था।

आरोपों की जांच के लिए अधिकरण द्वारा गठित एक समिति ने पर्यावरण मंजूरी (ईसी) शर्तों के अनुपालन में कुछ खामियों की रिपोर्ट की थी।

सक्सेना ने वर्तमान अर्जी पेश करते हुए कहा कि पर्यावरण मंजूरी बहाल करने की उनकी याचिका को उत्तर प्रदेश राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण (एसईआईएए) द्वारा लंबित रखा गया था और इस पर निर्णय लेने की आवश्यकता थी, क्योंकि उन्होंने निर्धारित शर्तों का पालन किया था।

एनजीटी अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव की पीठ ने 23 मई को दिए गए आदेश में कहा कि सक्सेना ने कहा था कि पर्यावरण मंजूरी रद्द करने और पर्यावरण मंजूरी बहाल करने की अर्जी खारिज करने के आदेश उन्हें नहीं दिए गए हैं।

पीठ में न्यायिक सदस्य न्यायमूर्ति अरुण कुमार त्यागी और विशेषज्ञ सदस्य अफरोज अहमद भी शामिल थे।

पीठ ने एसईआईएए के जवाब का संज्ञान लिया, जिसके अनुसार पर्यावरण मंजूरी रद्द करने की सूचना सक्सेना को स्पीड पोस्ट और ईमेल के जरिये दी गई थी।

अधिकरण ने कहा, ‘‘उपरोक्त तथ्यों से यह साबित होता है कि पर्यावरण मंजूरी रद्द करने का आदेश याचिकाकर्ता (सक्सेना) को दिया गया था और इसे सार्वजनिक पोर्टल पर भी अपलोड किया गया था। इसलिए, याचिकाकर्ता इसकी जानकारी से इनकार नहीं कर सकता।’’

अधिकरण ने कहा कि सक्सेना ने इस साल 29 जनवरी को अपने अतिरिक्त हलफनामे में ‘‘गलत’’ कहा था कि उन्हें 12 दिसंबर, 2024 को ‘पर्यावरण मंजूरी’ रद्द करने का आदेश नहीं मिला है।

अधिकरण ने कहा, ‘‘इस प्रकार, हम पाते हैं कि याचिकाकर्ता ने ईमानदारी एवं पारदर्शिता के साथ अधिकरण का दरवाजा नहीं खटखटाया और अनावश्यक रूप से न केवल एनजीटी का समय बर्बाद किया है, बल्कि प्रतिवादियों (राज्य अधिकारियों) को भी परेशान किया है।’’

न्यायाधिकरण ने कहा, ‘‘इन परिस्थितियों में, इस मूल अर्जी (ओए) को 25,000 रुपये के जुर्माने के साथ खारिज किया जाता है और याचिकाकर्ता को आदेश दिया जाता है कि वह दो सप्ताह के भीतर एसईआईएए (उत्तर प्रदेश) को भुगतान करे।’’

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