कार्बन उत्सर्जन का नया रिकॉर्ड, भारत और चीन जिम्मेदार
दुनिया का कार्बन उत्सर्जन इस साल नए रिकॉर्ड पर पहुंच रहा है.
दुनिया का कार्बन उत्सर्जन इस साल नए रिकॉर्ड पर पहुंच रहा है. वैज्ञानिकों का कहना है कि सात साल के भीतर ही 1.5 डिग्री सेल्सियस औसत तापमान की सीमा पार हो सकती है.2023 में कार्बन डाइ ऑक्साइड के उत्सर्जन का स्तर सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच जाएगा. वैज्ञानिकों ने आशंका जताई है कि इससे जलवायु परिवर्तन की रफ्तार और तेज होगी और भीषण मौसम के दौर देखने को मिलेंगे.
दुबई में जारी कॉप28 जलवायु सम्मेलन में 5 दिसंबर को ग्लोबल कार्बन बजट रिपोर्ट जारी की गई. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले साल जो कार्बन उत्सर्जन का स्तर रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गया था, उसमें इस साल बहुत ज्यादा बढ़ोतरी नहीं देखी गई है. इसकी वजह वनों की कटाई में आई कुछ कमी को माना गया है.
2023 में बनेगा नया रिकॉर्ड
2023 में उत्सर्जन का नया रिकॉर्ड बन सकता है क्योंकि जीवाश्म ईंधनों के जलाने से दुनियाभर में 36.8 अरब मीट्रिक टन कार्बन डाइ ऑक्साइड का उत्सर्जन होने का अनुमान है. यह मात्रा पिछले साल से 1.1 फीसदी ज्यादा होगी. इस रिपोर्ट को 90 संस्थानों के वैज्ञानिकों ने तैयार किया है, जिनमें एक्स्टर विश्वविद्यालय शामिल है.
हालांकि उत्सर्जन के आंकड़े में जमीन के इस्तेमाल से होने वाला उत्सर्जन शामिल नहीं है. उसे मिलाकर इस साल कुल उत्सर्जन 40.9 अरब टन हो जाएगा.
वैज्ञानिकों ने चीन और भारत में कोयले, तेल और गैस के उपभोग को वृद्धि के लिए विशेष रूप से जिम्मेदार माना है. चीन ने कोविड-19 के बाद इसी साल अपनी सीमाओं को फिर से खोला और आर्थिक गतिविधियां तेज हुईं. भारत में भी बिजली की मांग बहुत तेज हुई है और अक्षय ऊर्जा स्रोतों की रफ्तार से ज्यादा तेजी से ऊर्जा की मांग बढ़ रही है, इसलिए कोयले का इस्तेमाल भी बढ़ रहा है.
1.5 डिग्री का लक्ष्य
उत्सर्जन में इस तेज रफ्तार वृद्धि के कारण पृथ्वी के तापमान को औद्योगिक क्रांति के स्तर से औसतन 1.5 डिग्री सेल्सियस अधिक पर रोक पाना मुश्किल लग रहा है. रिपोर्ट तैयार करने वाले दल के मुखिया एक्सटर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर पिएरे फ्रीडलिंग्स्टाइन कहते हैं, "अब तो यह अटल दिखाई दे रहा है कि हम पेरिस समझौते में तय किए गए 1.5 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य को पार कर जाएंगे.”
2015 में पेरिस में हुए जलवायु सम्मेलन में पूरी दुनिया के नेताओं ने तय किया था कि इस सदी के आखिर तक धरती के तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा नहीं बढ़ने दिया जाएगा. लेकिन ताजा रिपोर्टें कहती हैं कि यह लक्ष्य अब पूरा नहीं हो पाएगा और 1.5 डिग्री सेल्सियस का स्तर इसी दशक के आखिर तक पार हो सकता है.
वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा बढ़ता है, तो उसके परिणाम विनाशकारी हो सकते हैं. इस कारण समुद्र का जल स्तर बढ़ेगा और कई तटीय शहर डूब जाएंगे. इसके अलावा गर्मी, बाढ़ और कोरल रीफ के विनाश जैसी जानलेवा घटनाएं भी झेलनी होंगी.
फ्रीडलिंग्स्टाइन कहते हैं, "कॉप28 में नेताओं को जीवाश्म ईंधनों के इस्तेमाल में भारी कटौती पर सहमत होना होगा, ताकि उत्सर्जन कम किया जा सके और 2 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य को जिंदा रखा जा सके.”
कुछ देशों में घटा उत्सर्जन
संयुक्त राष्ट्र की जलवायु समिति (IPCC) ने कहा है कि धरती के तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियसपर रोकना है, तो 2030 तक कार्बन उत्सर्जन को 43 फीसदी तक घटना होगा. लेकिन उत्सर्जन का स्तर पिछले कुछ सालों में लगातार बढ़ा है. कोविड महामारी के कारण कुछ समय के लिए इसमें कमी देखी गई थी, लेकिन अब यह कोविड के पहले के स्तर से 1.4 फीसदी ऊपर जा चुका है.
जीवाश्म ईंधन से कार्बन उत्सर्जन के मामले में चीन सबसे ऊपर है. वह कुल उत्सर्जन के 31 फीसदी के लिए जिम्मेदार है. हालांकि ताजा रिपोर्ट कहती है कि अमेरिका और यूरोपीय संघ में उत्सर्जन घट रहा है. इसकी वजह पुराने कोयला संयंत्रों को बंद किया जाना है.
दुनिया के सिर्फ 26 देश ऐसे हैं, जो 28 फीसदी उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार हैं और जहां उत्सर्जन का स्तर गिर रहा है. इनमें से अधिकतर यूरोप में हैं.
वीके/एसएम (रॉयटर्स, एपी, एएफपी)
(The above story first appeared on LatestLY on Dec 05, 2023 02:40 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

