देश की खबरें | पश्चिमी ‘जंक फूड’ को बढ़ावा देने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भी नियंत्रित करने की जरूरत: मिलिंद देवरा

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नयी दिल्ली, 14 जुलाई सभी सरकारी कैंटीन में खाद्य सामग्री में तेल और चीनी की मात्रा प्रदर्शित करने के स्वास्थ्य मंत्रालय के निर्देश के मद्देनजर, शिवसेना सांसद मिलिंद देवरा ने सोमवार को खाद्य पदार्थों की सभी श्रेणियों में एक समान नियमन की वकालत की ताकि भारतीय खाद्य पदार्थों को "गलत तरीके से निशाना नहीं बनाया जा सके।"

उन्होंने यह भी कहा कि अधीनस्थ विधान संबंधी संसदीय समिति, जिसके वह अध्यक्ष हैं, वर्तमान में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के स्वस्थ राष्ट्र के दृष्टिकोण के अनुरूप भारत में बढ़ते मोटापे की समस्या से निपटने के लिए देश के शीर्ष खाद्य नियामक एफएसएसएआई (भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण) की योजनाओं की समीक्षा कर रही है।

देवरा ने मंत्रालय द्वारा "समोसे और जलेबी में मौजूद सामग्री के बारे में लोगों को जानकारी देने" के कदम का जिक्र करते हुए ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, "ऐसे वक्त जब बहुराष्ट्रीय कंपनियां पश्चिमी जंक फूड का बेरोकटोक विपणन कर रही हैं, हमने सर्वसम्मति से शराब एवं सभी खाद्य श्रेणियों में एक समान नियमन की वकालत की है, ताकि भारतीय खाद्य सामग्री को गलत तरीके से निशाना न बनाया जाए।’’

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने सभी मंत्रालयों, विभागों और स्वायत्त निकायों से आग्रह किया है कि वे समोसा, कचौड़ी, पिज्जा, फ्रेंच फ्राइज़ और वड़ापाव समेत अन्य खाद्य सामग्री में चीनी और तेल की मात्रा का उल्लेख करते हुए "तेल और चीनी बोर्ड" प्रदर्शित करें ताकि स्वस्थ जीवन शैली को बढ़ावा दिया जा सके तथा मोटापे और गैर-संचारी रोगों से निपटा जा सके।

देवरा ने भारतीय हों या विदेशी सभी खाद्य पदार्थों के नियमन पर ज़ोर देते हुए कहा कि मोटापा एक बढ़ती हुई चिंता का विषय है और इसके एक बड़ा सामाजिक और आर्थिक मुद्दा बनने की आशंका है।

उन्होंने "मोटापा विरोधी" अभियान शुरू करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी की भी सराहना की।

केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव पुण्य सलिला श्रीवास्तव ने 21 जून को लिखे पत्र में कहा कि भारत में वयस्कों और बच्चों, दोनों में मोटापे में तेज़ी से वृद्धि देखी जा रही है। उन्होंने कहा कि मोटापा मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग और कुछ कैंसर जैसी गैर-संचारी बीमारियों के जोखिम को काफी बढ़ा देता है। यह मानसिक स्वास्थ्य, गतिशीलता और जीवन की गुणवत्ता को भी प्रभावित करता है, और स्वास्थ्य देखभाल की बढ़ती लागत और उत्पादकता में कमी के माध्यम से भारी आर्थिक बोझ डालता है। इन प्रवृत्तियों को उलटने के लिए शीघ्र रोकथाम और स्वास्थ्य संवर्धन अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

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