देश की खबरें | जेलर को धमकाने के मामले में मुख्तार अंसारी दोषी करार; सात साल की कैद और जुर्माने की सजा

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने जेलर को जान से मारने की धमकी देने के मामले में पूर्व बाहुबली विधायक मुख्तार अंसारी को बुधवार को दोषी करार देते हुए सात साल कैद और 37 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है।

लखनऊ, 21 सितंबर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने जेलर को जान से मारने की धमकी देने के मामले में पूर्व बाहुबली विधायक मुख्तार अंसारी को बुधवार को दोषी करार देते हुए सात साल कैद और 37 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है।

मुख्तार पहले से ही दूसरे मामलों में जेल में बंद हैं। मुख्तार के खिलाफ करीब साठ मुकदमों का आपराधिक इतिहास रहा है लेकिन यह पहला मौका है जब उसे किसी अदालत ने सजा सुनायी है।

न्यायमूर्ति दिनेश कुमार सिंह की एकल पीठ ने यह आदेश राज्य सरकार की अपील को मंजूर करते हुए पारित किया। अपने फैसले में अदालत ने कहा कि पत्रावली पर मुख्तार के खिलाफ उसे सजा सुनाने के लिए पर्याप्त सबूत मौजूद हैं जिन्हें नकार कर उसे बरी करना अदालत की भूल थी।

अदालत ने कहा कि मुख्तार भयानक अपराधी और माफिया के रूप में कुख्यात हैं। उसके खिलाफ 60 से अधिक जघन्य मुकदमें दर्ज रहे हैं। कोई इस बात से इंकार नहीं करेगा कि खासों-आम पर उसका भय रहता है। यह इस बात से भी स्‍पष्‍ट होता है कि उसके खिलाफ दर्ज अमूमन सभी मुकदमों में वह बरी हो गया क्योंकि अभियेाजन के गवाह सुनवाई के दौरान मुकर जाते थे।

मामले के मुताबिक 2003 में लखनऊ के तत्कालीन जेलर एसके अवस्थी ने आलमबाग थाने में अंसारी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था जिसमें उन्होंने आरोप लगाया था कि जेल में मुख्तार अंसारी से मिलने आए लोगों की तलाशी लेने का आदेश देने पर उन्हें जान से मारने की धमकी दी गई थी।

अवस्थी ने यह भी आरोप लगाया था कि अंसारी ने उनसे गाली गलौज करते हुए उन पर पिस्तौल भी तान दी थी। इस मामले में निचली अदालत ने अंसारी को बरी कर दिया था, जिसके खिलाफ सरकार ने अपील दाखिल की थी।

इस घटना के बाद जेलर अवस्थी ने 28 अप्रैल 2003 को आलमबाग थाने में प्राथमिकी दर्ज करायी। पुलिस के आरोपपत्र दाखिल करने के बावजूद सुनवाई के दौरान गवाही 2013 से ही शुरू हो सकी और उस वक्त तक मामले के अधिकांश गवाह, जोकि जेल के अधिकारी थे, सेवानिवृत्त हो चुके थे। सुनवाई के बाद विशेष एमपी/एमएल अदालत ने 23 दिसंबर, 2020 को साक्ष्य के अभाव में मुख्तार को बरी कर दिया। इस निर्णय को राज्य सरकार ने उच्‍च न्‍यायालय में तत्काल चुनौती दी थी जिस पर बुधवार को फैसला आया और मुख्तार को सजा सुना दी गयी।

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