ताजा खबरें | मायावती: स्कूल शिक्षिका से मुख्यमंत्री बनने तक का सफर
Get latest articles and stories on Latest News at LatestLY. आईएएस अधिकारी बनने की चाहत रखने वाली स्कूली शिक्षिका से चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनने तक मायावती के सफर ने तमाम लोगों, खासकर दलित समुदाय को काफी प्रेरित किया है।
लखनऊ, 10 मार्च आईएएस अधिकारी बनने की चाहत रखने वाली स्कूली शिक्षिका से चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनने तक मायावती के सफर ने तमाम लोगों, खासकर दलित समुदाय को काफी प्रेरित किया है।
लेकिन बहुजन समाज पार्टी की नेता उप्र में एक दशक से सत्ता से बाहर हैं, और इस बार 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को महज एक सीट पर जीत मिली है।
उत्तर प्रदेश के चुनावों के दौरान उनके आलोचकों ने मायावती पर प्रचार के दृश्य से "गायब" होने का आरोप लगाया, जिसका उन्होंने बार-बार खंडन किया और संगठन को मजबूत करने के लिए प्रचार में सक्रिय भागीदारी न होने की बात कही। कुछ लोगों ने यह भी दावा किया कि बसपा सत्तारूढ़ भाजपा की बी-टीम थी।
चुनाव के दौरान भाजपा के वरिष्ठ नेता अमित शाह ने एक टीवी चैनल को दिए साक्षात्कार में उनकी प्रशंसा किए जाने के बाद परिणाम घोषित होने के बाद भाजपा और बसपा के बीच संभावित गठजोड़ की अटकलें लगाईं गयी।
कांशीराम द्वारा 1984 में गठित पार्टी का नेतृत्व करते हुए, मायावती पहली बार 1995 में उप्र की मुख्यमंत्री बनीं। लेकिन उन्हें बड़ी सफलता 2007 में बसपा की "सोशल इंजीनियरिंग" से मिली, जो ब्राह्मणों, दलितों और मुसलमानों को साथ लेकर आया।
दिल्ली में एक बेहद सामान्य पृष्ठभूमि वाले परिवार में 1956 में जन्मी मायावती ने 1975 में दिल्ली विश्वविद्यालय के कालिंदी कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई की और एक शिक्षक की नौकरी की। लेकिन उनका सपना आईएएस ऑफिसर बनने का था।
दिल्ली विश्वविद्यालय के कैंपस लॉ सेंटर में एलएलबी पाठ्यक्रम के लिए नामांकन करने के बाद, वह 1977 में सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रही थी, उसी दौरान कांशी राम से उनकी मुलाकात हुई। कांशी राम उस समय अखिल भारतीय पिछड़ा और अल्पसंख्यक समुदाय कर्मचारी संघ के प्रमुख थे, मायावती की इस मुलाकात ने उनके जीवन की दिशा बदल दी।
राजनीति में शामिल होने के लिए कांशी राम ने उन्हें प्रोत्साहित किया गया, वह जल्द ही कांशी राम द्वारा बनाई गई पार्टी का एक अभिन्न अंग बन गईं।
मायावती 1997 और 2002 में, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बाहरी समर्थन से मुख्यमंत्री बनीं। पहली बार तीन बार उनकी सरकार सत्ता में रही। 2007 में, वह अपने दम पर मुख्यमंत्री बनीं।
मायावती जब वह 2007 में मुख्यमंत्री थी तो उन्होंने अपनी पार्टी के सांसद उमाकांत यादव, जमीन पर अवैध कब्जा के आरोपी, को उनके घर के पास गिरफ्तार करवाया। उनका दावा था कि उनके कार्यकाल के दौरान कई हाई-प्रोफाइल अपराधी और माफिया डॉन सलाखों के पीछे पहुंचे।
बसपा को धन उगाहने के प्रयासों, उनके जन्मदिन समारोह, दलितों के नाम पर जिलों का नामकरण और स्मारकों और स्मारकों को स्थापित करके लखनऊ के परिदृश्य को बदलने के लिए प्रतिद्वंद्वियों के आरोपों का सामना करना पड़ा। प्रतिद्वंद्वियों ने बार-बार भ्रष्टाचार के आरोप लगाए।
2012 में सत्ता से बाहर होने के बाद उनकी पार्टी की हालत लगातार खराब होती गई। 2019 के लोकसभा चुनावों में जब उन्होंने प्रतिद्वंद्वी समाजवादी पार्टी के साथ हाथ मिलाया तो भी हालात नहीं बदले।
आज घोषित चुनाव परिणाम में भले ही मायावती की पार्टी को सिर्फ एक सीट मिली है, लेकिन 66 वर्षीय नेता का उत्तर प्रदेश में मूल दलित आधार अभी भी कायम है और उसका वोट शेयर करीब 13 फीसदी है।
उनकी अनुपस्थिति में इस बार अभियान के शुरुआती चरण के दौरान, जब वह केवल अपने ट्वीट के माध्यम से मतदाताओं से जुड़ीं। चुनाव अभियान की कमान उनके करीबी विश्वासपात्र सतीश चंद्र मिश्रा ने संभाल रखी थी।
इस बारे में पत्रकारों के पूछे जाने पर मायावती ने कहा कि वह पार्टी को मजबूती देने और संगठन के कामों की वजह से ज्यादा प्रचार करने नहीं निकल पायीं। वह पहले चरण के मतदान के कुछ दिन पहले प्रचार को निकली और चुनावी रैलियों में भी भाग लिया लेकिन तब तक शायद देर हो चुकी थी।
मिश्रा को बसपा में उच्च जातियों को शामिल करने का श्रेय दिया जाता है, जिसने उनकी "सोशल इंजीनियरिंग" में मदद की, और वह 2007 में सत्ता पाने में कामयाब रही थी लेकिन 2022 के चुनाव में मायावती का यह फार्मूला कामयाब नहीं हुआ।
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